पृष्ठ : मधेपुरा अबतक

इक्कीसवीं सदी में भी तुम नौवीं पास क्यों रह गए तेजस्वी..? 

इक्कीसवीं सदी में भी तुम नौवीं पास क्यों रह गए तेजस्वी..? जो वैसी सुविधाओं में पला हो जिनकी कल्पना तक सबके बस की बात नहीं… राज्य से लेकर केन्द्र तक जिसके परिवार की तूती बोलती हो… जिसके घर में पिता ही नहीं माँ के भी मुख्यमंत्री होने का बिरला संयोग हो… जिसमें एक बड़ी राजनीतिक पार्टी अपना भविष्य देख रही हो… जिसे आज के युवा-सपनों का प्रतीक बनाकर लाखों लोगों के बीच मंच पर खड़ा किया जा रहा हो, वो केवल नौवीं पास होकर रह जाय, तो सवाल उठेंगे ही। यहाँ बात लालू प्रसाद यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव की हो रही है जिनकी सम्पत्ति तो करोड़ों में है लेकिन जाने किस मजबूरी में वो नौवीं पास हैं केवल..!

कम पढ़ा होना गुनाह नहीं। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जब कम पढ़े-लिखे और यहाँ तक कि अनपढ़ लोगों ने भी इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया है। अनपढ़ होने के बावजूद अकबर बादशाह हुए और कागज ना छूने के बावजूद कबीर ने घर-घर में जगह बनाई। लेकिन उनके साथ क्या परिस्थितियां रहीं और उनके सामने कैसी चुनौतियां थीं, ये भी इतिहास में दर्ज है। आज हम इक्कीसवीं सदी में हैं और ग्वोवलाइजेशन के दौर में दुनिया जहाँ छोटी हुई है वहीं जीवन और जटिल हो गया है। ऐसे में तेजस्वी जैसे युवा का केवल नौवीं पास होना हैरान करता है।

आरजेडी सुप्रीमो ने इस बार अपने दोनों बेटों को चुनाव-मैदान में उतारा है। छोटे बेटे तेजस्वी राघोपुर से भाग्य आजमा रहे हैं जहाँ से लालू और राबड़ी दो-दो बार एमएलए रह चुके हैं। शनिवार, 3 अक्टूबर को उन्होंने अपना नामांकन भरा। नामांकन-पत्र के साथ दायर हलफनामे के अनुसार वे दिल्ली के जाने-माने स्कूल डीपीएस से केवल नौवीं पास हैं और पेशे से समाजसेवी और व्यवसायी हैं। मैट्रिक करने में वो भले ही सफल ना हो पाए हों लेकिन ‘व्यवसाय’ में उन्होंने जरूर सफलता पाई है। 2014-15 के सालाना आयकर रिटर्न में उनकी आमदनी 5 लाख से ज्यादा बताई गई है और उनकी कुल सम्पत्ति है 1 करोड़ 40 लाख रुपये। हलफनामे के अनुसार अलग-अलग बैंकों में तेजस्वी के सात अकाउंट हैं और उन्होंने कई कम्पनियों में निवेश कर रखा है। उनके पास दस तोले सोने की ज्वेलरी और 1 लाख बीस हजार नकद हैं। 34 लाख रुपये का बैंक लोन भी है उनके ऊपर।

दुनिया जानती है कि तेजस्वी के पिता लालू प्रसाद यादव अत्यन्त साधारण परिवार से आते हैं। उनका बचपन संघर्षों में बीता। मुख्यमंत्री होने तक वो अपने बड़े भाई के चपरासी क्वार्टर में रहे और उनके ज्यादातर बच्चे वहीं हुए। तमाम विपरीत परिस्थितियों और छात्र-जीवन में ही राजनीति में कूद पड़ने के बावजूद वो ना केवल पटना यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में एमए हैं बल्कि एलएलबी की डिग्री भी है उनके पास। रेलमंत्री के रूप में उनके सफल प्रयोगों के बाद बड़ी-बड़ी जगहों से उन्हें मैनेजमेंट के छात्रों को ‘पढ़ाने’ के बुलावे आए और बाकायदा जाकर उन्होंने ‘पढ़ाया’ भी। ऐसे में उनकी अगली पीढ़ी से उनके आगे नहीं तो उनके बराबर या कम-से-कम उनके आसपास होने की उम्मीद तो होगी ही।

एक तर्क हो सकता है कि तेजस्वी क्रिकेटर रहे हैं और इस कारण पढ़ाई पर कम ध्यान दे पाए। अगर उन्होंने क्रिकेट में ही करियर बनाया होता तो ये तर्क स्वीकार सहज स्वीकार्य होता। आज 12वीं पास तेन्दुलकर से भला कौन पूछेगा कि उन्होंने आगे की पढ़ाई क्यों नहीं की। लेकिन जब क्रिकेट में तेजस्वी का करियर नहीं बना और राजनीति में भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा हो अब तक, ऐसा नहीं कहा जा सकता, तब घर का ऐसा कौन-सा भार था उनके ऊपर कि वे पढ़ाई की जगह तथाकथित ‘व्यवसाय’ में लग गए और पिता लालू या माँ राबड़ी ने उन्हें डाँटा नहीं..?

अक्सर किसी का पढ़ना, कम पढ़ना या ना पढ़ना सामाजिक स्थितियों पर निर्भर करता है। शिक्षा या ज्ञान के स्तर के अनुपात में ही कोई समाज ऊँचा उठता है और जब आप समाज के सबसे ऊँचे पायदान पर हों तब पढ़ना बहुत हद तक आपकी सामाजिक जिम्मेदारी हो जाती है क्योंकि तब आप हजारों-लाखों के ‘रोल मॉडल’ हो जाते हैं। इसीलिए ये सवाल उठेगा भी और गूँजेगा भी कि इक्कीसवीं सदी में भी तुम नौवीं पास क्यों रह गए तेजस्वी..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


3 अक्टूबर 2015 से होने वाली प्री.पी-एच.डी. की परीक्षा स्थगित

प्री.पी-एच.डी. हेतु हिन्दी, उर्दू, गणित सहित कुल 19 विषयों में 2011-2012 की 3 अक्टूबर 2015 से होने वाली परीक्षा अपरिहार्य कारणवश स्थगित कर दी गयी है |

आगे परीक्षा नियंत्रक डॉ.नवीन कुमार ने मधेपुरा अबतक को बताया कि कुलपति डॉ.विनोद कुमार के निदेशानुसार इस परीक्षा के प्रारंभ किये जाने की अब नई तिथि 23 नवम्बर 2015 से होगी तथा परीक्षा का प्रोग्राम सम्बन्धित विभागाध्यक्ष से प्राप्त किया जा सकता है | उन्होंने बताया कि इन परीक्षाओं का आयोजन विभागाध्यक्षों के अधीन होगा तथा जो छात्र फार्म नहीं भर सके हैं वे विलम्ब शुल्क के साथ 10 अक्टूबर तक परीक्षा प्रपत्र भर सकते हैं  |

सम्बंधित खबरें


तुलसी पब्लिक स्कूल में मनी गाँधी जयन्ती

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जयन्ती के अवसर पर तुलसी पब्लिक स्कूल द्वारा भव्य समारोह का आयोजन कर अभयानंद मैथेमेटिक्स आलम्पियाड-2015 में शरीक हुए जिले के 60 पब्लिक स्कूल के लगभग तीन हजार प्रतिभागी छात्रों में से 96 से 100 फीसदी अंक प्राप्त कर सर्वाधिक गोल्ड मैडल जीतनेवाले इसी स्कूल के 28 छात्रों को मधेपुरा के प्रखर शिक्षाविद एवं समाजसेवी डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी द्वारा पुरस्कृत किया गया | निदेशक श्यामल कुमार सुमित्र द्वारा यह जानकारी दी गई कि सौ फीसदी अंक लाने वाले वर्ग दो के ललन एवं सुजल तथा वर्ग चार के सुमन एवं सोनू के भविष्य निर्माण की दिशा में  जिले के प्रथम एस.पी. रहे अभयानन्द ने कुछ विशेष मदद की बातें कही हैं |

Dr.Madhepuri bestowing rewards to the winners of Abhayanand Mathematics Olympiad 2015.
Dr.Madhepuri bestowing rewards to the winners of Abhayanand Mathematics Olympiad 2015.

छात्रों को पुरस्कृत करने के बाद अपने संबोधन में डॉ. मधेपुरी ने कहा कि भगवान् बुद्ध एवं ईसा मसीह के बाद यदि संसार के मनावजाति को कोई महामानव सर्वाधिक प्रभावित किया है तो वह हैं हमारे पूज्य बापू महात्मा गाँधी एवं उनके द्वारा विश्व को दिया गया सत्य-अहिंसा और शांति का संदेश | गांधीयन विचार पर विस्तार से बोलने के बाद अन्त में उन्होंने कहा कि आज ही के दिन ‘जय जवान जय किसान’ के उद्घोषक प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन है | आज देश उन्हें भी नमन करता है |

समारोह की अद्यक्षता निदेशक श्यामल कुमार सुमित्र ने किया | इस अवसर पर शिक्षक विभीषण कुमार, वरुण कुमार, मनोज कुमार एवं निर्मल कुमार सहित रेणु कुमारी, रोजी-मनीषा, रिया, मन्नू जी, गजाला प्रवीण, प्रियंका कुमारी आदि उपस्थित थी | तुलसी पब्लिक स्कूल के प्राचार्य डॉ.हरिनंदन यादव ने विचार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया |

सम्बंधित खबरें


महात्मा गांधी और नोबेल पुरस्कार का सच

1964 में मार्टिन लूथर किंग जूनियर (अमेरिका), 1980 में अडोल्फो पेरेस एस्कुइवेल (अर्जेंटीना), 1989 में दलाई लामा (तिब्बत), 1991 में आंग सान सू की (बर्मा), 1993 में नेल्सन मंडेला (दक्षिण अफ्रीका), 2007 में अल गोर (अमेरिका) और 2009 में बराक ओबामा (अमेरिका) नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजे गए। एक ही पुरस्कार से सम्मानित होने के अलावे भी इन सबमें एक समानता है और वो ये कि इन सभी को महात्मा गांधी के जीवन, उनके व्यक्तित्व और उनके विचारों ने प्रभावित किया था। क्या आपके मन में ये सवाल नहीं उठता कि इन सबके जिस ‘संघर्ष’ ने इन्हें नोबेल पुरस्कार तक पहुँचाया उस संघर्ष को ‘आकार’ देनेवाले गांधीजी को ही नोबेल नहीं मिला..? आगे चलकर 2014 में शांति का नोबेल भारत के कैलाश सत्यार्थी को मिला और उनके प्रशस्ति-पत्र में बाकायदा ये लिखा गया कि वे गांधी के मार्ग पर चले। कितने आश्चर्य की बात है कि जिस ‘गांधी’ के नाम के बिना एक नोबेल विजेता का ‘प्रशस्ति-पत्र’ पूरा नहीं होता उसी गांधी को नोबेल से वंचित रखा गया। इसे नोबेल की ‘भूल’ नहीं उसका ‘अपराध’ कहा जाना चाहिए।

हालांकि नोबेल कमिटी ने ये ‘अपराधबोध’ व्यक्त भी किया लेकिन गांधी की मृत्यु के 58 साल बाद। 2006 में दिए अपने सार्वजनिक वक्तव्य में नोबेल कमिटी ने कहा – “The greatest omission in our 106 year history is undoubtedly that Mahatma Gandhi never received the Nobel Peace prize. Gandhi could do without the Nobel Peace prize, whether Nobel committee can do without Gandhi is the question. (हमारे 106 साल के इतिहास में सबसे बड़ी चूक महात्मा गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया जाना है। गांधी तो बिना नोबेल पुरस्कार के रह सकते थे, पर बड़ा प्रश्न यह है कि क्या नोबेल शांति पुरस्कार कमिटी गांधी को बिना यह पुरस्कार प्रदान किए सहज है ?)”

नोबेल की ये ‘स्वीकारोक्ति’ गलत नहीं है। पूरी दुनिया जानती और मानती है कि महात्मा गांधी आधुनिक युग में अहिंसा और शांति के सबसे बड़े प्रतीक हैं। इतने बड़े कि गौतम बुद्ध और ईसा मसीह के बाद मानव-जाति पर ऐसा व्यापक प्रभाव अब तक नहीं देखा गया है। ऐसे गांधी को भला नोबेल की क्या जरूरत..? हाँ, उन्हें पाकर नोबेल का सम्मान जरूर और बढ़ जाता। लेकिन इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि दुनिया में किसी व्यक्ति को मिलने वाला यह सबसे बड़ा सम्मान है। ऐसे में ये प्रश्न उठना अत्यन्त स्वाभाविक है कि आखिर गांधीजी को क्यों नहीं… और वो भी एक बार नहीं, दो बार नहीं, पूरे पाँच बार नामांकित होने के बावजूद..!

जी हाँ, गांधीजी को नोबेल के लिए पूरे पाँच बार नामंकित किया गया था। 1937, 1938 और 1939 में लगातार तीन साल और इसके बाद भारत की स्वतंत्रता और विभाजन के वर्ष 1947 में उनका नामांकन हुआ। पाँचवीं बार उन्हें 1948 में नामांकित किया गया लेकिन नामांकन के महज चार दिनों के बाद उनकी हत्या हो गई।

बहुत दिनों तक माना गया कि गांधीजी को नोबेल देकर सम्भवत: नोबेल कमिटी अंग्रेजी साम्राज्य का ‘कोपभाजन’ नहीं बनना चाहती थी। लेकिन तत्कालीन दस्तावेजों से अब यह सत्य सामने आ चुका है कि नोबेल कमिटी पर ब्रिटिश सरकार की ओर से ऐसा कोई दबाव नहीं था। प्रश्न उठता है कि फिर उन्हें नोबेल देने के मार्ग में क्या कठिनाई थी..?

नोबेल पुरस्कार के लिए पहली बार गांधीजी का नाम नॉर्वे के एक सांसद ने सुझाया था लेकिन पुरस्कार देते समय उन्हें नज़रअंदाज कर दिया गया। नोबेल कमिटी के एक सलाहकार जैकब वारमुलर ने तब टिप्पणी की थी कि गांधी एक अच्छे, आदर्श और तपस्वी व्यक्ति हैं और सम्मान के योग्य हैं लेकिन ‘सुसंगत’ रूप से शांतिवादी नहीं हैं। जैकब के अनुसार गांधीजी को पता रहा होगा कि उनके कुछ अहिंसक आन्दोलन हिंसा और आतंक में बदल जाएंगे। ये बात उन्होंने 1920-1921 में गांधीजी द्वारा चलाए गए असहयोग आन्दोलन के संदर्भ में कही थी जब उत्तेजित भीड़ ने चौरीचौरा में एक पुलिस थाने को जला दिया था और कई पुलिसकर्मी मारे गए थे। करोड़ों की आबादी, सदियों का शोषण और एक भी ‘चौरीचौरा’ ना हो, ये कैसी अपेक्षा थी जैकब की..? ये गांधी ही थे कि भारत जैसे संवेदनशील और स्वाभिमानी देश में ‘चौरीचौरा’ की सैकड़ों-हजारों पुनरावृत्ति नहीं हुई।

 खैर, जैकब की अगली टिप्पणी भी कम दिलचस्प नहीं थी कि गांधीजी की राष्ट्रीयता भारतीय संदर्भों तक सीमित रही। यहाँ तक कि दक्षिण अफ्रीका में उनका आन्दोलन भी भारतीय लोगों तक सीमित रहा। उन्होंने कालों के लिए कुछ नहीं किया जो भारतीयों से भी बदतर ज़िन्दगी गुजार रहे थे। कैसी विडम्बना है कि आगे चलकर मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला और बराक ओबामा इस पुरस्कार से नवाजे गए और ये तीनों ना केवल ‘काले’ थे बल्कि गांधी को अपना आदर्श और पथ-प्रदर्शक मानते थे।

1947 में नोबेल के लिए कुल छह लोग नामांकित थे और उनमें एक नाम गांधीजी का था। लेकिन भारत-विभाजन के बाद अखबारों में छपे गांधीजी के कुछ (तथाकथित) ‘विवादास्पद’ बयानों को आधार बनाकर यह पुरस्कार उनकी जगह मानवाधिकार आन्दोलन ‘क्वेकर (Quakers)’ (जिसका प्रतिनिधित्व फ्रेंड्स सर्विस काउंसिल, लंदन और अमेरिकन फ्रेंड्स सर्विस कमिटी, फिलाडेल्फिया नाम की दो संस्था कर रही थी) को दे दिया गया।

1948 में खुद क्वेकर ने शांति के नोबेल के लिए गांधीजी का नाम प्रस्तावित किया। लेकिन इसे दु:संयोग की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा कि नामांकन की आखिरी तारीख के महज दो दिन पूर्व गांधीजी की हत्या हो गई। इस समय तक नोबेल कमिटी को गांधीजी के पक्ष में पाँच संस्तुतियां मिल चुकी थीं। लेकिन तब समस्या यह थी कि उस समय तक मरणोपरांत किसी को नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जाता था। हालांकि ये कानूनी गुंजाइश थी कि विशेष स्थिति में मरणोपरांत भी यह पुरस्कार दिया जा सकता है। लेकिन यहाँ भी एक समस्या थी कि पुरस्कार की रकम आखिर किसे दी जाय क्योंकि गांधीजी का कोई संगठन या ट्रस्ट नहीं था। यहाँ तक कि उनकी कोई जायदाद भी नहीं थी और ना ही इस संबंध में उन्होंने कोई वसीयत ही छोड़ी थी। हालांकि यह इतनी बड़ी समस्या नहीं थी कि इसे सुलझाया ही नहीं जा सके। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि ‘इतिहास’ रचने के लिए जो ‘इच्छाशक्ति’ होनी चाहिए थी वो नोबेल कमिटी के पास थी ही नहीं। अंतत: 1948 में ये पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया और नोबेल कमिटी ने कहा कि इसके लिए कोई ‘योग्य जीवित उम्मीदवार’ नहीं है। ‘योग्य जीवित उम्मीदवार’ ना होने की बात सीधे तौर पर गांधीजी के ना रहने से जुड़ी हुई थी, इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं है।

अगर 1948 में गांधीजी की हत्या नहीं हुई होती तो ये पुरस्कार उन्हें मिल गया होता और नोबेल पर वो ‘दाग’ लगता ही नहीं जिसे ‘भूल’ या ‘चूक’ की किसी ‘स्वीकारोक्ति’ से कभी मिटाया नहीं जा सकता।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


राष्ट्रकवि दिनकर-जयन्ती एवं कवि-गोष्ठी आयोजित

भू.ना.मंडल वि.वि.के हिन्दी स्नातकोत्तर विभाग में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की 83वीं जयन्ती विभागाध्यक्ष डॉ. विनय कुमार चौधरी की अध्यक्षता में सादगीपूर्वक मनाई गई | इस अवसर पर डॉ. चौधरी ने दिनकर की विभिन्न कृतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उत्तर छायावाद के अग्रणी राष्ट्रकवि दिनकर भारतीय संस्कृति की अभिव्यक्ति ही नहीं बल्कि ओज, उमंग एवं उत्साह के प्रखर कवि रहे हैं |

मंडल वि.वि. के कुलानुशासक व कवि डॉ.विश्वनाथ विवेका ने कहा कि राष्ट्रकवि दिनकर ने जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त शोषण, आर्थिक विषमता एवं सामंतवादी प्रवृतियों की तीखी आलोचना की है, वहीँ दूसरी ओर राष्ट्रगौरव गीत गाते हुए विदेशी दासता से मुक्ति दिलाने का आकुल आह्वान भी किया है | उन्होंने यह भी कहा कि दिनकर दलित क्रांति के सधे हुए कवि हैं |

इस अवसर पर डॉ. वीणा कुमारी एवं डॉ. ओम प्रकाश ने दिनकर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की चर्चा की और उर्वशी को उनकी कालजयी रचना कहा |

मंच संचालन करते हुए डॉ.सिद्धेश्वर काश्यप ने दिनकर को त्याग और वलिदान का प्रेरक कवि कहा |

दूसरे सत्र में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें डॉ.विश्वनाथ विवेका, डॉ. सिद्धेश्वर काश्यप, सियाराम यादव मयंक, डॉ अलोक कुमार आदि ने कविताओं का पाठ किया | सुधि श्रोताओं के रूप में कृषण मुरारी, राजेश कुमार, विभीषण कुमार, पंकज कुमार, अन्नु कुमारी, शिल्की शिखा, बुलबुल, प्रियंका प्रीति, सुनील, संजू, राजकिशोर, विकाश आदि की उपस्थिति अंत तक रही | धन्यवाद् ज्ञापन डॉ.चौधरी ने किया |

सम्बंधित खबरें


कोसी में हो गया कांग्रेस का बंटाधार रसिया !

मधेपुरा; सहरसा, मधेपुरा और सुपौल जिले के इलाके को कोसी का इलाका कहा जाता है | यही वह इलाका है जहाँ आज की तारीख में विधानसभा के कुल 13 क्षेत्रों में से एक भी सीट कांग्रेस को नसीब नहीं हुई जबकि आज़ादी के बाद के वर्षों-वर्षों तक केवल और केवल कांग्रेस का ही सिक्का सम्पूर्ण कोसी में चलता रहा |

प्रखर कांग्रेसियों में आलमनगर के विद्याकर कवि, संविधानसभा के सदस्य रहे चतरा के कमलेश्वरी प्रसाद यादव, डॉ. रमेन्द्र कुमार यादव रवि, मधेपुरा के प्रथम विधि मंत्री शिवनंदन प्रसाद मंडल, बी.पी.मंडल, भोली प्रसाद मंडल, बलुआ के रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र, डॉ.जगन्नाथ मिश्र, अमरेन्द्र मिश्र, सहरसा के लहटन चौधरी, चन्द्रकिशोर पाठक आदि-आदि को आज भी कांग्रेसी खेमे के लोग याद करते हुए नाम लेते हैं |

बहरहाल कोसी के दो संसदीय क्षेत्रों में से एक तो आज भी कांग्रेसी सांसद रंजीत रंजन के कब्जे में है | बावजूद इसके जदयू, राजद व कांग्रेस महागठबंधन के 13 सीटों में एक भी सीट कांग्रेस के खाते में नहीं ! क्या अंग्रेजों के अशुभ व अन्धविश्वासी 13 वाली संख्या अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद कांग्रेसियों के ही अन्दर जगह बना ली है ? कहीं इसीलिए तो कांग्रेस के आलाकमानों को तेरह के फेर में पड़ना उचित नहीं लगा | कोसी में एक भी सीट पर कांग्रेसी प्रत्याशी होने से सम्पूर्ण कोसी क्षेत्र के सभी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को महागठबंधन-धर्म निभाने के साथ-साथ पार्टी-धर्म निभाने का भी एक मौका अवश्य मिलता |

अब तो स्थिति ऐसी बन गई है कि कोसी में महागठबंधन के प्रचार में लालू-नीतीश के साथ सोनिया गाँधी यहाँ जब-जब आएगी तो केवल और केवल औरों के लिए ही नाचने आएगी | यदि एक भी सीट कांग्रेस के लिए ली गई होती तो लोग यही कहते –

तोरा बियाह में हम नटुआ !
हमरा बियाह में तू नटुआ !!

बजाय इसके, अब कोसी में केवल यही पंक्तियाँ हर जुबान पर होगी –

कोसी में हो गया कांग्रेस का बंटाधार रसिया !
चाहे नाचे राहुल-सोनिया बारम्बार रसिया !!

सम्बंधित खबरें


मोदी के सामने चेहरा नीतीश का, पर मुकाबले में लालू

महागठबंधन ने 243 में से 242 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। 23 सितम्बर को जदयू, राजद और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्षों की मौजूदगी में नीतीश कुमार ने महागठबंधन की सूची जारी की। इस मामले में महागठबंधन ने निश्चित रूप से एनडीए की तुलना में अधिक ‘समझदारी’ और ‘एकजुटता’ का परिचय दिया। इन तीनों दलों का तालमेल सीट बांटने और सूची जारी करने में ही नहीं उम्मीदवारों के चयन में भी दिखा। महागठबंधन के उम्मीवारों की सूची से एक बात साफ हो गई कि ‘इंजीनियरिंग’ की डिग्री भले ही नीतीश के पास हो लेकिन इसमें ‘सोशल इंजीनियरिंग’ लालू की चली है। केवल यही नहीं, सीट-दर-सीट विश्लेषण करें तो ये भी स्पष्ट हो जाएगा कि नरेन्द्र मोदी के सामने चेहरा भले ही नीतीश का हो पर मुकाबले में लालू हैं।

आप निश्चित तौर पर जानना चाहेंगे कि ऊपर कही गई बात का आधार क्या है..? इस ‘आधार’ को जानने के लिए हमें उस ‘आधार’ तक पहुँचना होगा जिसके बूते महागठबंधन बिहार के महासमर को जीतने उतरा है। मजे की बात तो ये है कि महागठबंधन की सूची पर निगाह डालते ही हम उस ‘आधार’ तक पहुँच जाएंगे और वो भी बिना मशक्कत के। आप भले ही अचरज करें लेकिन सच ये है कि लालू के ‘आधार’ को ही महागठबंधन ने अपना ‘आधार’ बनाया है। जी हाँ, 242 उम्मीदवारों में 64 यादव और 33 मुसलमान उम्मीदवारों का होना महज संयोग नहीं है। 64 यादव उम्मीदवारों में 48 लालू के, 14 नीतीश के और 2 कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। मुस्लिम उम्मीदवारों की बात करें तो राजद के 16, जदयू के 7 और कांग्रेस के 10 उम्मीदवार मैदान में हैं। इस तरह ‘माय’ समीकरण के तहत महागठबंधन ने 64 + 33 = 97 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं जो कुल उम्मीदवारों का 40% है।

ये तो हुई यादव और मुस्लिम उम्मीदवारों की बात। अब महागठबंधन के 242 उम्मीदवारों का विश्लेषण कुछ अलग तरह से करें। ये जानना दिलचस्प होगा कि इन 242 उम्मीदवारों में 164 यानि 68% उम्मीदवार पिछड़े, अति पिछड़े तथा मुस्लिम हैं। सवर्ण तथा एससी-एसटी उम्मीदवारों की बात करें तो उन्हें 16-16% हिस्सेदारी मिली है। कुल मिलाकर, ये कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि नीतीश और कांग्रेस ने लालू की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ को ही फॉलो किया है।

महागठबंधन के उम्मीदवारों को एक और कोण से देखने के बाद इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाएगा कि मोदी से असली टक्कर लालू ले रहे हैं। 2010 में नीतीश के विजय-रथ पर भाजपा भी सवार थी और उसे 91 सीटें मिली थीं। इस बार भाजपा के कब्जे वाली इन 91 सीटों में से 41 पर नीतीश और कांग्रेस के उम्मीदवार भाजपा के सामने होंगे जबकि शेष 50 सीटों पर अकेले लालू के उम्मीदवार भाजपा से लोहा ले रहे होंगे। इन सीटों पर राजद दूसरे नंबर पर था। लालू को भरोसा है कि पिछली बार जेडीयू-भाजपा साथ थी तब उनकी पार्टी दूसरे नंबर पर थी। इस बार जेडीयू और राजद साथ हैं तो इसका सीधा फायदा उन्हें मिलेगा। देखा जाय तो लालू के इस ‘विश्वास’ को नकारना बहुत मुश्किल है। एनडीए के मार्ग में जितनी कठिनाई नीतीश के ‘सुशासन’ को लेकर है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल लालू खड़ी कर रहे हैं, यादव-मुस्लिम के साथ-साथ पिछड़ों में भी अपनी पैठ के कारण।

वैसे भी महागठबंधन के अस्तित्व में आने के बाद से लेकर अब तक एनडीए के हमले का केन्द्र-बिन्दु लालू रहे हैं। भाजपा के घोषित उम्मीदवारों की सूची में 26 यादवों की मौजूदगी भी इसी तथ्य की पुष्टि करती है। भाजपा और उसके साथी दलों ने लालू पर जितना निशाना साधा है उतना ही लालू का ‘वोटबैंक’ उनके लिए एकजुट हुआ है, ऐसा राजद खेमा मानता है। खैर, लालू का वोटबैंक उनके लिए कितना एकजुट रहेगा ये तो 8 नवंबर को मतगणना के बाद ही पता चलेगा लेकिन फिलहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि बिहार के इस महामुकाबले में अगर नरेन्द्र मोदी पिछड़ते हैं और ताज फिर नीतीश के सिर होता है तो ऐसा ‘किंगमेकर’ कहलाना पसंद करने वाले लालू प्रसाद यादव के कारण ही होगा, वरना नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


आदमी !

दिन में सूरज की रौशनी

रात में बिजली की चकाचौंध

आखिर अँधेरा………..!

जाए तो जाए किधर ?

सिमटकर दुबक गया अँधेरा

आदमी के अन्दर |

और

आहिस्ता….! आहिस्ता…..!!

दीमक बनकर

शख्सियत व इन्सानियत को

निगलता जा रहा है

आदमी !

अब आदमी नहीं…….

बस ! लाश बनता जा रहा है |

डॉ.मधेपुरी

सम्बंधित खबरें


याद किये गये साहित्यकार श्रीकान्त वर्मा

बिहार प्रदेश श्रीकान्त वर्मा साहित्य समिति के संस्थापक संतोष सिन्हा द्वारा श्री वर्मा की 85वीं जयन्ती कौशिकी भवन मधेपुरा के अम्बिका सभागार में धूमधाम से मनाई गई | साथ में मधेपुरा के जनसेवी नवल किशोर को भी याद किया गया और साहित्यकारों द्वारा इनकी तस्वीरों पर पुष्पांजलि अर्पित की गई |

इस अवसर पर कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संरक्षक व पूर्व सांसद डॉ.रमेन्द्र कुमार यादव रवि, कार्यकारी अद्यक्ष व पूर्व प्राचार्य प्रो.श्यामल किशोर यादव एवं सम्मलेन के सचिव डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी सरीखे साहित्यकार त्रय को सम्मानित किया गया |

सर्वप्रथम सचिव डॉ.मधेपुरी ने मंच संचालन करते हुए समारोह को सम्बोधित किया और कहा कि मध्यप्रदेश में जन्मे श्रीकान्त वर्मा जैसे साहित्यकार, कथाकार, कवि व पत्रकार को बिहार के मधेपुरा में साहित्यकारों द्वारा याद किया जाना सम्पूर्ण भारत में एकता एवं समन्वय का संदेश प्रेषित करता है | ख्यातिप्राप्त चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन के अभिन्न मित्र रहे श्रीकान्त वर्मा चिड़िया की तरह कभी मंदिर के त्रिशूल पर तो कभी मस्जिद के गुंबद पर निर्भीक होकर फुदकते रहे और देश की बेहतरीन सेवा करते रहे तभी तो उनके निधनोपरांत उनकी धर्मपत्नी श्रीमती वीणा वर्मा को भी राज्यसभा सदस्य बनाया गया |

आगे मंडल वि.वि. के संस्थापक कुलपति एवं दर्जनों पुस्तकों के रचनाकार डॉ.रवि द्वारा श्रीकान्त वर्मा के साहित्यिक अवदानों की चर्चाएँ की गई तथा उनके साथ-साथ नब्बे के दशक में राज्यसभा सदस्या रहीं श्रीमती वीणा वर्मा (धर्मपत्नी श्रीकान्त वर्मा) के कई रोचक संस्मरणों को भी उद्धृत किया गया | उन्होंने प्रो.मणिभूषण वर्मा की रचना “धूएँ के देश में” का लोकार्पण किया और विस्तार से काव्य-संग्रह की मीमांसा प्रस्तुत की | अंत में प्राचार्य श्यामल किशोर द्वारा अपने अध्यक्षीय भाषण में श्रीकांत वर्मा की अदभुत पत्रकारिता , अद्वितीय सम्पादकीय क्षमता तथा काव्य-ग्रंथों एव कथा-संग्रहों सहित अन्य साहित्यिक उपलब्धियों का विस्तार से वर्णन किया गया |

Honourable Guests and Students attending function at Ambika Sabhagar .
Honourable Guests and Students attending function at Ambika Sabhagar .

दूसरे सत्र में श्रीकान्त वर्मा एवं नवल किशोर की स्मृति में एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमे रचनाकार राजू भैया, रघुनाथ प्र.यादव, उल्लास मुखर्जी, सियाराम यादव मयंक, संतोष सिन्हा, सियाशरण भारती, कृषणदेव यादव, आशीष कुमार, प्रो.मणिभूषण वर्मा, डॉ. मधेपुरी ने अपनी-अपनी एक-एक प्रतिनिधि कविता का पाठ किया | सुधि श्रोता के रूप में महामहिम राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित वैधराज शम्भु शरण भारतीय, सुकवि अभय कुमार एवं समाजसेवी प्रवीन कुमार उर्फ़ पारोजी आदि मुख्यरूप से उपस्थित रहे | धन्यवाद ज्ञापन तुलसी पब्लिक स्कूल के निदेशक श्यामल कुमार सुमित्र ने किया |

सम्बंधित खबरें


एक नहीं पाँच सर्वे का सार, ‘घिर’ गए नीतीश कुमार

इस बार के चुनाव में नीतीश कुमार ने अपने पॉलिटिकल करियर का सबसे बड़ा दांव खेला है। बीजेपी से संबंध तोड़ने और मांझी को मुख्यमंत्री बनाने से भी बड़ा दांव है लालू और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाना। लालू से अलग होकर समता पार्टी की नींव रखना उनके लिए सबसे बड़ा (और सबसे पॉजिटिव भी) टर्निंग प्वाइंट था। जेपी के घोषित ‘चेले’ होने के कारण कांग्रेस-विरोध भी समझ में आता था। लेकिन अपनी जिन ‘भूलों’ की भरपाई के लिए इन्होंने फिर से लालू (और साथ में कांग्रेस) से संबंध जोड़ा है, वो कहीं और बड़ी भूल ना साबित हो जाए। कम-से-कम अब तक आए पाँच सर्वे, जिनमें देश के चार बड़े चैनल/एजेंसियों के साथ-साथ बीजेपी का आंतरिक सर्वे भी शामिल है, का सार तो यही है।

2010 में जेडीयू ने 141 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और 115 सीटों पर उसे जीत मिली थी। तब बीजेपी के साथ गठबंधन था नीतीश का। दूसरी ओर लालू के राजद का गठबंधन रामविलास पासवान की लोजपा से था। तब लालू ने 168 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और केवल 22 पर उन्हें जीत मिली थी। कांग्रेस 2010 में एकमात्र ऐसी पार्टी थी जिसने सारी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे जीत मिली थी मात्र 4 सीटों पर। अब इस बार का समीकरण देखिए। इस बार ये तीनों एक साथ हैं और इनका सीट शेयर इस तरह है – जेडीयू 101 + राजद 101 + कांग्रेस 41 = 243 सीटें। यानि पिछले चुनाव में 115 सीटें जीतने वाली जेडीयू इस बार लड़ ही रही है 100 सीटों पर। कहने का मतलब ये है कि अगर 100 की 100 सीटें भी जीत जाय जेडीयू तब भी 15 सीटों का तो सीधा नुकसान हो ही रहा है नीतीश को। पर नीतीश ने इतनी ही ‘कुर्बानी’ दी होती तो एक बात थी। महागठबंधन के लिए उन्होंने अपनी 25 जीती हुई सीटें राजद को और 10 जीती हुई सीटें कांग्रेस को दी हैं। यानि 35 सीटिंग विधायकों की बलि नीतीश को चढ़ानी पड़ी और बदले में मिली राजद की केवल एक सीट। महागठबंधन को नीतीश भले ही वक्त की ‘जरूरत’ और उनकी पार्टी ‘मास्टर स्ट्रोक’ कह ले लेकिन वास्तव में ये ‘कमजोर’ और ‘हताश’ हो चुके नीतीश का ‘अक्श’ मात्र है।

अब एक नज़र अब तक के सर्वे पर डालें। सबसे पहले 9 सितंबर को इंडिया टीवी/सी वोटर्स का सर्वे आया। इस सर्वे के मुताबिक एनडीए को 94-110 सीटें, महागठबंधन को 116-132 सीटें और अन्य को 13-21 सीटें मिलनी चाहिएं। अगले ही दिन यानि 10 सितंबर को आए इंडिया टीवी/सिसरो के सर्वे में एनडीए को 120-130 सीटें, महागठबंधन को 102-103 सीटें और अन्य को 10-14 सीटें दी गई थीं। इसके बाद 15 सितंबर को एबीपी न्यूज/नीलसन का सर्वे सामने आया जिसमें एनडीए को 118, महागठबंधन को 122 और अन्य को 3 सीटें मिलने का अनुमान है। यहाँ तक मुकाबला कांटे का दिखता है। पहले सर्वे में महागठबंधन को बढ़त मिली थी, दूसरे में एनडीए को और तीसरे में दोनों लगभग बराबरी पर थे। कहानी में मोड़ इसके बाद हुए सर्वेक्षणों से आया।

18 सितंबर को आए जी न्यूज के सर्वे के मुताबिक 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में एनडीए को 140 सीटें मिलने जा रही हैं जबकि महागठबंधन महज 70 सीटों पर सिमट सकता है। शेष 33 सीटों पर कड़ा मुकाबला है। इस सर्वे के मुताबिक 50.8 फीसदी मतदाता भगवा रंग में रंगे हैं और नीतीश-लालू के साथ 42.5 प्रतिशत मतदाता ही हैं।

बीजेपी के आंतरिक सर्वे के अनुसार भी वो ‘आसानी’ से बहुमत हासिल करती दिख रही है। बीजेपी के अपने आकलन के मुताबिक एनडीए को 160 से 170 सीटें मिलनी चाहिएं। इस सर्वे के अनुसार महागठबंधन महज 70 सीटों पर सिमट रहा है और इन 70 सीटों में भी ज्यादातर सीटें लालू की होने जा रही हैं। इसका अर्थ ये है कि नीतीश कुमार हर तरह से ‘घिर’ गए हैं। यहाँ यह बताना जरूरी है कि बीजेपी ने इससे पहले भी आंतरिक सर्वे कराए थे जिनमें एनडीए पिछड़ा हुआ था। बीजेपी के अपने ‘ग्राफ’ के मुताबिक भी ज्यों-ज्यों चुनाव नजदीक आता गया है, त्यों-त्यों बीजेपी बढ़त बनाने में सफल हुई है।

देखा जाय तो बीजेपी को बढ़त मिलने के कारण भी स्पष्ट हैं। मुलायम सिंह ने महागठबंधन से नाता तोड़कर और अब ‘थर्ड फ्रंट’ को आकार देकर बीजेपी को स्पष्ट तौर पर फायदा पहुँचाया है। इस थर्ड फ्रंट में पप्पू यादव के शामिल होने तथा तारिक अनवर को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में सामने लाने से भी महागठबंधन को नुकसान होगा। मांझी महादलितों के वोट में सेंध लगा ही चुके थे और अब ओवैसी ने सीमांचल में चहलकदमी कर महागठबंधन की ही चिन्ता बढ़ाई है। वामदलों को भी थोड़ा-बहुत जो मिलेगा, महागठबंधन के हिस्से का ही। इसीलिए सारे सर्वे को किनारे भी कर दें तो भी एनडीए बेहतर स्थिति में तो है ही।

जिस तरह रंगों से रंग निकलते चले जाते हैं और उनकी गिनती सम्भव नहीं, वैसे ही राजनीति में एक समीकरण से कितने समीकरण जुड़े होते हैं और उन समीकरणों से कितने नए समीकरण बन जाएंगे इसका आकलन पूरी तरह सम्भव नहीं। लेकिन इन पंक्तियों के लिखने तक बिहार में मुकाबला कांटे का  है और इस कांटे के मुकाबले में बढ़त फिलहाल एनडीए को है यानि उसकी राह के ‘कांटे’ दूर होते दिख रहे हैं। यहाँ तक कि नीतीश के साथी लालू और कांग्रेस के हिस्से में भी ‘कांटे’ अपेक्षाकृत कम हैं लेकिन नीतीश हर तरह से ‘कांटों’ में घिरे दिख रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें