बिहार की आशा को ब्रिटेन का ‘एशियन बिजनेस वुमेन पुरस्कार’

13 साल की उम्र में जिस लड़की की पढ़ाई छूट हो गई हो, 15 साल की उम्र में शादी हो गई हो और 25 साल की उम्र तक जिसे अंग्रेजी न आती हो, आज उसके नाम ब्रिटेन के सर्वोच्च नागरिक सम्मान सहित पुरस्कारों की पूरी फेहरिस्त हो तो क्या कहेंगे आप? और उस वक्त आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी जब आपको कहा जाय कि वो शख्सियत पिछड़े कहे जाने वाले बिहार की मिट्टी से निकली है? जी हां, मैं बात कर रहा हूं बिहार के सीतामढ़ी की रहने वाली 65 वर्षीया आशा खेमका की जिन्हें शुक्रवार को ब्रिटेन का प्रतिष्ठित ‘एशियन बिजनेस वुमेन पुरस्कार’ दिया गया। इससे पहले 2013 में उन्हें ब्रिटेन के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘डेम कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश अंपायर’ से नवाजा जा चुका है।

आशा खेमका पर आगे चर्चा हो, उससे पहले ये जानें कि वे हैं कौन? ब्रिटेन की नामचीन हस्तियों में शुमार आशा वर्तमान में वहां के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शुमार वेस्ट नॉटिंघमशायर कॉलेज की प्रिंसिपल हैं। उनकी सफलता की कहानी इसलिए बेहद खास है कि शादी के बाद जब वे ब्रिटेन गई थीं, तब उन्हें अंग्रेजी का कोई ज्ञान नहीं था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू कर दी। कुछ कर दिखाने की ऐसी अदम्य लालसा थी उनके भीतर कि अंग्रेजी पर उन्होंने जैसे अधिकार ही कर लिया।

आपको बता दें कि आशा 13 साल की थीं, जब उनकी पढ़ाई छूट गई थी। 15 साल की होते-होते परिवारवालों ने उनकी शादी डॉक्टर शंकर अग्रवाल से कर दी। शादी के बाद घर संभालते वह 25 वर्ष की हो गईं तब उनके पति को ब्रिटेन में नौकरी मिली। तब वो अपने बच्चों के साथ पति के पास ब्रिटेन आ गईं। स्वाभाविक था कि अंग्रेजी का ज्ञान न होने के कारण उनके शुरुआती दिन बहुत कठिन रहे होंगे। पर आशा ने टीवी पर बच्चों के लिए आने वाले शो को देख-देख अंग्रेजी सीखना शुरू किया।

प्रारम्भ में आशा साथी युवा महिलाओं से टूटी-फूटी अंग्रेजी मे बात करतीं, पर घबरातीं नहीं। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई, आत्मविश्वास बढ़ता गया और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। कुछ सालों बाद कैड्रिफ यूनिवर्सिटी से उन्होंने बिजनेस मैनेजमेंट की डिग्री ली और ब्रिटेन के चुनिंदा कॉलेजों में शुमार वेस्ट नॉटिंघमशायर कॉलेज में लेक्चरर बनीं। अब वो इसी कॉलेज की प्रिंसिपल हैं।

आशा खेमका की कहानी आप तक पहुंचाने का उद्देश्य यह है कि अंग्रेजी या किसी भी भाषा या विषय का समुचित ज्ञान न होने के कारण स्वयं को हीन मान लेने वाले प्रेरणा पा सकें, क्योंकि हम और आप इससे इनकार नहीं कर सकते कि न केवल बिहार बल्कि सम्पूर्ण देश में ग्रामीण या कस्बाई इलाके में रहने वाले अधिकांश परिवारों के लड़के-लड़कियां आमतौर पर ऐसी हीनता से ग्रसित होते हैं। जरा सोच कर देखें जब आशा ने उस मुल्क में अपनी ऐसी पहचान बनाई जिसने उसके अपने देश भारत समेत लगभग आधी दुनिया पर कभी राज किया हो, तो आप अपने देश में ऐसा क्यों नहीं कर सकते? क्या आशा की कहानी पढ़ने के बाद आपकी आशा को पंख नहीं लग जाएंगे!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप         

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राष्ट्रपिता गांधी के ताजिंदगी लंगोटी धारण करने का राज !

एक ओर जहां बिहार के क्रांतिकारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा गांधी के चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष पर 16 अप्रैल से 2018 के बिहार दिवस की पूर्व संध्या तक इसे नये-नये कार्यक्रमों के साथ हर माह समारोहपूर्वक उत्सवी माहौल में मनाये जाने का उद्घोष किया गया वहीं दूसरी ओर मधेपुरा के झल्लूबाबू सभागार में अति संवेदनशील एवं डायनेमिक डी.एम. मो.सोहैल (भा.प्र.से.) द्वारा इस दरमियान बारहों महीने में आयोजित किये जाने वाले कार्यक्रमों के नतीजों से समाज के अंतिम व्यक्ति को लाभ पहुंचाने की पुरजोर चर्चाएं कई घंटों तक पदाधिकारियों एवं समाजसेवियों के बीच की जाती रही |

यह भी बता दें कि कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जिलाधिकारी डी.एम. मो.सोहैल ने कहा कि 16 अप्रैल को जिला मुख्यालय से लेकर पंचायत के हर गांव व टोले में सफाई अभियान चलाया जायगा, 17 अप्रैल को प्रातः गांधी पदयात्रा का आयोजन, दिन में गांधी व्याख्यान का आयोजन और शाम में अलग-अलग संस्था द्वारा गांधी के विचारों पर आधारित नाटक प्रस्तुत किया जायेगा |

जिले के सभी प्रखंडों के बीडीओ, सीओ और सभी महिला पदाधिकारियों सहित दोनों अनुमंडल के एसडीएम, डीपीआरओ, डीईओ, डीआईओ, डीडीसी, एसपी, सहित समाजसेवियों को संबोधित करते हुए डीएम मो.सोहैल ने जहां यह कहा कि बिहार की धरती पर बापू के चंपारण सत्याग्रह को सौ साल पूरे होने पर 1 वर्ष तक हर माह अलग-अलग थीम यानी कभी कुष्ट निवारण तो कभी टीवी उन्मूलन, कभी नारी सशक्तिकरण तो कभी नशा मुक्तिकरण…….. आदि पर कार्यक्रम आयोजित होता रहेगा वहीं समाजसेवी साहित्यकार डॉ.मधेपुरी ने कहा कि “अप्रैल 1917 को गांधी को चंपारण की धरती पर स्वागत करने वालों में किसान राजकुमार शुक्ल, डॉ.अनुग्रह नारायण सिंह और वही जे.बी.कृपलानी थे……  जो आजादी के बाद मधेपुरा से प्रथम सांसद चुने गये | यह कहते हुए उन्होंने कहा कि अपने अतीत को जाने बिना ना तो हम अपने भविष्य को गढ़ सकेंगे और ना ही वर्तमान में एक कदम आगे बढ़ सकेंगे | डॉ.मधेपुरी ने विस्तार से बापू को लगी तीन गोलियों की कहानी भी कहीं और विस्तार से गरीब महिला के वस्त्र के अभाव में 7 दिनों से नहीं नहाने की बात कस्तूरबा से सुनकर बापू ने ताजिंदगी लंगोटी धारण करते रहने की ठानी थी तथा शोषण के विरुद्ध निर्भीक होकर अंग्रेजी हुकूमत से लड़ने की भी प्रतिज्ञा ली थी |

जहां अपने अनुभवों को बांटते हुए एसपी विकास कुमार ने बापू की तरह खुद पर प्रयोग कर निरामिष होने, क्रोधमुक्त होने और नशामुक्त होने पर विस्तार से चर्चा की वहीं डीडीसी मिथिलेश कुमार, एडीएम मुर्शिद अहमद, एसडीएम संजय कुमार निराला, सिविल सर्जन डॉ.गदाधर पाण्डेय, डीपीआरओ मो.कयूम अंसारी, शिक्षक वीरेंद्र प्रसाद यादव, श्यामल कुमार सुमित्र सहित मीडिया के तुर्वसु उर्फ बंटी, प्रो.प्रदीप कुमार झा आदि ने भी अपने मूल्यवान विचारों से सदन को अवगत कराया |

अंत में जिलाधिकारी मो.सोहैल ने सदन को जानकारियां दी कि 16 अप्रैल को जिले के सीमा पर गम्हरिया में “चंपारण सत्याग्रह द्वार” का शिलान्यास किया जायेगा और जिले के छोटे-बड़े सभी कार्यालय कक्षों में राष्ट्रपिता गांधी की तस्वीर होगी | उन्होंने यह भी कहा कि सभी प्राथमिक, मध्य और माध्यमिक स्कूलों में प्रार्थना के बाद गांधी जी का भजन गाया जायेगा तथा होने वाली चेतना सभा में गांधी जी की छोटी कहानियों का वाचन होगा और बापू पर कहानियां लिखने के लिए स्कूली बच्चों को प्रेरित भी किया जायेगा | अंत में डी.एम. मो.सोहैल ने कहा कि ‘बापू आपके द्वार’ कार्यक्रम के तहत प्रत्येक पंचायत में दो-दो लोगों की टीम घर-घर जाकर घर के मुखिया का अभिवादन करेंगे और घर के लोगों को बुलाकर गांधी के संदेश साझा करेंगे……| गांधी शैली में सभी कार्यक्रम होंगे……. जहां-जहां गांधी की प्रतिमा है वहां मूर्ति पर माल्यार्पण करने के बाद दरी बिछाकर अन्य कार्यक्रम किये जायेंगे |

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बिहार में शराबबंदी के बाद दहेजबंदी का बिगुल

शराबबंदी की सफलता से उत्साहित बिहार की नीतीश सरकार अब समाज-सुधार का एक और बड़ा अभियान शुरू करने जा रही है। खास बात यह कि इस सुधार की प्रेरणा-स्रोत भी शराबबंदी की तरह महिलाएं हैं और शोषण व पीड़ा से उनकी मुक्ति ही इसका केन्द्रीय उद्देश्य है। जी हां, इस बार सरकार जिस कुरीति के विरुद्ध बिगुल फूंकने जा रही है, वो है सदियों से हमारे समाज को डंसती आ रही दहेज की प्रथा। इसी के साथ बालविवाह के खिलाफ भी लड़ाई तेज होगी। शुक्रवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने समाज कल्याण विभाग के कामकाज की समीक्षा बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे बाल विवाह और दहेज प्रथा के विरुद्ध बड़े जागरूकता अभियान की योजना बनाएं।

गौरतलब है कि पिछले सोमवार को महिलाओं के लिए विशेष रूप से आयोजित लोक संवाद कार्यक्रम में एक युवती ने मुख्यमंत्री को यह परामर्श दिया था कि वह शराबबंदी की तरह ही दहेजबंदी का अभियान चलाएं। वहीं एक युवती ने बालविवाह को लेकर सलाह दी थी कि ऐसा कानून बनना चाहिए कि जब तक लड़की की पढ़ाई पूरी न हो जाए तब तक उनकी शादी नहीं हो। इस संदर्भ में मुख्यमंत्री ने कहा कि यह महत्वपूर्ण बात है कि अब महिलाएं इन मुद्दों को लेकर मुखर हैं। उन्होंने दहेज और बालविवाह के विरुद्ध चलाए जाने वाले अभियान को कारगर और प्रभावी बनाने के लिए निर्देश दिया कि प्रस्तावित कैंपेन में समाज कल्याण विभाग स्वास्थ्य, शिक्षा और ग्रामीण विकास विभाग को भी साथ ले।

इस बैठक में नीतीश कुमार ने ‘मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना’ के सभी अवयवों की समीक्षा करने को कहा। उन्होंने कहा कि यह बात सामने आनी चाहिए कि इन योजनाओं से कितने लोगों को लाभ हुआ है। मुख्यमंत्री ने कन्या सुरक्षा योजना की बात भी कही। इसके अतिरिक्त बालविवाह प्रतिरोध अधिनियम 2006, सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना के फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन, फूड सेफ्टी एंड न्यट्रिएंट, आंगनबाड़ी संचालन, आंगनबाड़ी भवन निर्माण, मुख्यमंत्री भिक्षावृत्ति निवारण योजना, शताब्दी कुष्ठ कल्याण योजना, पुनर्वास गृह, बसेरा, वृद्धा आश्रम निर्माण एवं नि:शक्तजन विवाह प्रोत्साहन अनुदान योजना पर भी चर्चा की गई। समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा, समाज कल्याण विभाग की प्रधान सचिव वंदना किनी एवं महिला विकास निगम की प्रबंध निदेशक एन विजयलक्ष्मी इस महत्वपूर्ण बैठक का हिस्सा रहीं।

 

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तो नीतीश सरकार लालू परिवार से जुड़े मामले की जांच कराएगी!

पटना के चिडियाघर (संजय गांधी जैविक उद्यान) में बिना टेंडर के 90 लाख की मिट्टी भराई का मामला तूल पकड़ चुका है। मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह ने मामले की जांच के लिए संबंधित फाइल तलब की है। कहा जा रहा है कि आरोप की जांच के लिए राज्य सरकार कमेटी बना सकती है। ऐसे में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, हालांकि उन्होंने आरोप को निराधार बताते हुए सरकार से स्वयं जांच कराने का आग्रह किया था।

गौरतलब है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने आरजेडी सुप्रीमो के दोनों मंत्री बेटों पर पटना के एक निर्माणाधीन मॉल की मिट्टी पटना के चिड़ियाघर को ‘अवैध’ तरीके से बेचने का आरोप लगाया था। बताया जाता है कि उक्त मॉल बिहार का सबसे बड़ा मॉल है और जिस कंपनी द्वारा यह मॉल बनाया जा रहा है उसमें लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव, छोटे बेटे तेजस्वी यादव और एक बेटी चंदा यादव डायरेक्टर हैं।

आरजेडी सुप्रीमो ने इस पूरे मामले को सिरे से नकार दिया है। उन्होंने उल्टा यह दावा किया कि मिट्टी बेचना तो दूर उनका परिवार चिड़ियाघर को गाय का गोबर तक मुफ्त में देता है। उनके बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने तो सख्त अंदाज में सुशील मोदी पर मानहानि का मुकदमा दर्ज करने की बात कही है। ध्यान रहे कि तेज प्रताप नीतीश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री के साथ-साथ वन एवं पर्यावरण मंत्री भी हैं। यह मामला इसी विभाग का है।

उधर संजय गांधी जैविक उद्यान के निदेशक नंद किशोर ने कहा कि वन विभाग में ठेके पर काम कराने की कोई प्रथा नहीं है। विभाग के कर्मचारियों के माध्यम से ही काम कराया जाता है। उन्होंने कहा कि चिड़ियाघर में मिट्टी की आवश्यकता थी, इसलिए यह काम एमएस इंटरप्राइजेज को दिया गया। वह कहां से मिट्टी ला रही है, इसकी जानकारी वन एवं पर्यावरण विभाग को नहीं है। उन्होंने दावा किया कि इस काम में नियमों का उल्लंघन नहीं किया गया है।

बहरहाल, इस पूरे मामले पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चुप हैं। अब जबकि मुख्य सचिव ने मामले की फाइल तलब की है, ये कयास लगाए जा रहे हैं कि अपने दामन को पाक-साफ बताने के लिए सरकार संभवत: इसकी जांच करा सकती है। अगर ऐसा होता है तो आने वाले दिनों में राज्य की सियासत और गरमाएगी, इसमें कोई दो राय नहीं।

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तुलसी पब्लिक के राहुल राज बने हैंडरायटिंग ओलंपियाड के बिहार चैंपियन

तुलसी पब्लिक स्कूल के वर्ग 4 का 11 वर्षीय राहुल राज  को“अंग्रेजी हैंडराइटिंग ओलंपियाड- 2016-17” के ग्रुप-सी में सूबे बिहार में प्रथम स्थान आया | सोचिए तो सही, संकल्प और जुनून से किस कदर लैस होगा यह बालक राहुल जिसके पिताश्री पंकज कुमार टी.ई.टी. शिक्षक के रूप में पुरैनी प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय, खैरो में मात्र 21 दिनों तक ही छात्रों को पढ़ाने के बाद दुनिया को अलविदा कह दिया |

यूँ तो बचपन से ही राहुल का टैलेंट अपना प्रभाव चारों ओर तेजी से बिखेरने लगा था | उसकी प्रतिभा और लगन को देखकर ही टी.पी.एस.  के निदेशक श्यामल कुमार सुमित्र ने विद्यालय द्वारा उसे गोद लेने का एलान भी कर दिया और तब से राहुल के पठन-पाठन की पूरी जिम्मेदारी स्कूल की हो गई है | सचमुच, हर किसी की मेहनत उसे मंजिल तक पहुंचा ही देती है बशर्ते वह राहुल की तरह निरंतर कोशिश को रफ्तार देते रहने की ठान ले |

यह भी बता दें कि बच्चों के पठन-पाठन की सामग्रियों के निर्माता के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त “क्लासमेट कम्पनी” द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर वर्ग-1 से 12 तक 3 ग्रुपों (A-12 से 9 तक) (B-8 से 5 तक) एवं (C-4 से 1 तक) के लिए “इंग्लिश हैंडराइटिंग ओलंपियाड” का आयोजन किया गया जिसमें राज्य स्तर पर छात्र-छात्राओं का चयन हुआ उनमें तीन कोसी के ही लाल हैं- ग्रुप-सी. में प्रथम रैंक पर राहुल राज (मधेपुरा) एवं द्वितीय पर मो.नूरानी (सहरसा) तथा ग्रुप-बी में प्रथम रैंक पर नेहा कुमारी | शेष तीन में दो भागलपुर एवं एक छपरा ले गया |

इस ओलंपियाड के कोसी जोन संयोजक श्री संजय कुमार ठाकुर ने बताया कि राष्ट्रीय स्तर पर 23 अप्रैल को मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में इस हैंडराइटिंग ओलंपियाड के ग्रैंड फिनाले का भव्य आयोजन होगा जहां पहुंचने के लिए सभी सफल प्रतियोगी को स्थान व रूट बता दिया गया है | उन्होंने यह भी कहा कि नेशनल स्तर पर सफल होने वाले प्रतिभागी को वहीं आयोजित भव्य समारोह में पुरस्कार व प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया जायेगा |

मधेपुरा अबतक द्वारा जब राहुल राज से यह पूछा गया कि आगे वह क्या बनना चाहता है- वैज्ञानिक, कलाकार या और…….. कुछ, के जवाब में राहुल ने कहा ‘IAS कम्पीट कर डीएम’ ! भला क्यों नहीं मधेपुरा के डायनेमिक डीएम मो.सोहैल की देशभक्ति व सेवाभाव बड़ों को ही नहीं बल्कि मधेपुरा के बच्चों को भी सजीव ढंग से प्रभावित किया है |

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पटना महावीर मंदिर में क्यों हैं एक साथ दो हनुमानजी ?

आप बिहार के हैं और राजधानी पटना न आए हों सामान्यतया ऐसा नहीं हो सकता और पटना आने पर स्टेशन स्थित प्रसिद्ध महावीर मंदिर आपने न देखा हो ये भी मुमकिन नहीं। आपने जरूर सुना या पढ़ा होगा कि इस मंदिर की गिनती उत्तर भारत के गिने-चुने मंदिरों में होती है। लेकिन सच यह है कि देश भर के चुनिंदा मंदिरों की सूची बनाई जाए जहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती हो और चढ़ावों का अंबार लगता हो, तब भी पटना का हनुमान जी का ये मंदिर तिरुपति के बालाजी मंदिर, शिर्डी के सांई बाबा मंदिर और जम्मू के वैष्णो देवी मंदिर आदि के साथ शीर्ष के कुछ मंदिरों में शुमार किया जाएगा। रामनवमी के दिन तो इस मंदिर में श्रद्धालुओं की लाईन कई किलोमीटर तक लगी होती है। एक अनुमान के मुताबिक इस दिन राम के इस अप्रतिम भक्त के दर्शन के लिए तीन से चार लाख श्रद्धालु जुटते हैं।

Patna Mahavir Mandir
Patna Mahavir Mandir

तो चलिए रामनवमी के पावन अवसर पर इस मंदिर की विशेषताओं से रूबरू होते हैं। सबसे पहली और अहं बात यह कि यहां आकर शीश नवाने वाले किसी भक्त ने आज तक ये नहीं कहा कि उसकी मनोकामना पूरी नहीं हुई। इस मंदिर की स्थापना 1730 ई. में स्वामी बालानंद ने की थी। तब यह मंदिर बैलगाड़ी से चंदे में एक-एक ईंट एकत्र कर बना था। साल 1900 तक यह मंदिर रामानंद संप्रदाय के अधीन रहा। उसके बाद 1948 तक इस पर गोसांई संन्यासियों का कब्जा रहा। साल 1948 में पटना हाईकोर्ट ने इसे सार्वजनिक मंदिर घोषित कर दिया। उसके बाद आचार्य किशोर कुणाल के प्रयास से साल  1983 से 1985 के बीच वर्तमान मंदिर का निर्माण शुरू हुआ और आज इस मंदिर का भव्य स्वरूप सबके सामने है।

इस मंदिर का मुख्य द्वार उत्तर दिशा की ओर है और मंदिर में हनुमानजी समेत सारे देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं, परन्तु गर्भगृह में बजरंग बली की मूर्ति है और कमाल की बात यह कि एक नहीं एक साथ दो मूर्तियां हैं – हनुमानजी की युग्म मूर्तियां। आप याद करें, जब भी आप इस मंदिर गए होंगे, फूलवाले ने आपको दो माला दी होगी ताकि हनुमानजी की दोनों मूर्तियों पर माला चढ़ सके। कभी आपने सोचा कि यहां एक साथ दो मूर्तियां क्यों हैं? देश भर में हनुमानजी के हजारों मंदिर हैं लेकिन कहीं आपने ऐसा नहीं देखा होगा। चलिए, आज हम बताते हैं। दरअसल यहां हनुमानजी की दो मूर्तियां दो अलग आशय से रखी गई हैं। कहा जाता है कि दो मूर्तियों में एक मूर्ति अच्छे लोगों के कार्य पूर्ण करती है और दूसरी बुरे लोगों की बुराई दूर करती है। एक तरह से भक्तों के शीघ्र कल्याण के लिए स्वयं को ही दो हिस्सों में बांट लिया हनुमानजी ने। है न कमाल की बात!

अब बात हनुमानजी के प्रिय भोग लड्डू की। आपको आश्चर्य होगा कि 1930 तक यहां लड्डू की एक भी दुकान न थी और आज आलम यह है कि प्रतिदिन औसतन 25 हजार किलो लड्डू की बिक्री केवल एक दुकान से होती है जो मंदिर परिसर में मंदिर प्रशासन द्वारा ही चलाई जाती है। यहां तिरुपति के कारीगर खास तौर पर नैवेद्यम लड्डू तैयार करते हैं। इसके अतिरिक्त अगल-बगल दर्जनों अन्य दुकानें भी हैं जिनमें बेसन और मोतीचूर के कई किस्म के लड्डू आप खरीद सकते हैं।

सच ही कहा गया है – हरि अनंत हरि कथा अनंता। अभी इस मंदिर से जुड़ी कई ऐसी बाते हैं जो आपको चकित करेंगी। फिलहाल चलते-चलते बस एक बात और। इस मंदिर के दूसरे तल पर आप कांच का एक बड़ा बरतन देखेंगे, जिसमें रामसेतु का पत्थर रखा हुआ है। आप उस समय दांतो तले ऊंगली दबा लेंगे जब देखेंगे कि 15 किलो वजन वाला यह पत्थर कितने आराम से पानी में तैरता रहता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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प्रणब मुखर्जी पूरा करेंगे बिहार के लिए डॉ. कलाम का सपना

बिहार के लिए बड़े सौभाग्य सौभाग्य की बात है कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति मिसाईलमैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने यहां के प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के पुनरुत्थान के लिए जो किया, कुछ वैसा ही वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी विक्रमशिला विश्वविद्यालय के लिए करने जा रहे हैं। आठवीं-नौवीं सदी के इस गौरवशाली विश्वविद्यालय का भग्नावशेष देखने भागलपुर के कहलगांव अंतीचक पहुंचे महामहिम ने कहा कि विक्रमशिला में ऊंचा से ऊंचा स्तरीय विश्वविद्यालय बनना चाहिए। ऐसी धरोहर को केवल म्यूजियम का शो पीस बनाने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बात करेंगे।

President Pranab Mukherjee Visiting Vikramshila University Ruins
President Pranab Mukherjee Visiting Vikramshila University Ruins

विक्रमशिला के भग्नावशेषों का मुआयना कर अभिभूत दिख रहे राष्ट्रपति ने कहा कि एक जमाना था जब राजा और आमलोग बड़े-बड़े विश्वविद्यालय स्थापित करते थे। तीसरी सदी से तक्षशिला, चौथी सदी से नालंदा और आठवीं-नवीं सदी से विक्रमशिला विश्वविद्यालय ने लोगों का मार्गदर्शन किया। शिक्षा, शोध और तंत्र को प्रोत्साहन दिया। यहां पढ़ने के लिए चीन, यूनान और मिस्र से छात्र, शिक्षक व शोधकर्ता आते थे। उन्होंने बताया कि जब वे कॉलेज और विश्वविद्यालय में पढ़ते थे उस समय से उनके मन में इन धरोहरों को देखने की इच्छा थी। विदेश मंत्री के रूप में जब वे पाकिस्तान गए थे तो उन्हें तक्षशिला को देखने का मौका मिला था। वहीं पर विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में नालंदा के पुनरुत्थान का प्रस्ताव सिंगापुर और चीन से आया, जिसे भारत सरकार ने मंजूर किया और नालंदा एक बार फिर जी उठा। अब विक्रमशिला की बारी है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2015 में लोकसभा में विक्रमशिला में केन्द्रीय विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा की थी और इसके लिए चार-पांच सौ करोड़ रुपए भी मंजूर किए थे। तेज धूप में विक्रमशिला भग्वानवेष परिसर के बाहर खड़े हजारों लोगों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने इस बात का उल्लेख किया और इसके गौरव को वापस हासिल करने का भरोसा दिलाया।

अब आप ही बताएं, बिहार के लिए डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के सपनों को पूरा होने और यहां के गौरवशाली अतीत को एक बार फिर करवट लेने से भला कौन रोकेगा! जब देश के प्रथम नागरिक स्वयं इसकी घोषणा कर रहे हों और इस घोषणा को अमलीजामा पहनाने के लिए केन्द्र में नरेन्द्र मोदी और राज्य में नीतीश कुमार जैसे सजग-सक्षम-सक्रिय प्रहरी हों!

चलते-चलते बता दें कि इस मौके पर बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद, केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूड़ी, गोड्डा (झारखंड) के सांसद निशिकांत दूबे, बिहार के जल संसाधन मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री शहनवाज हुसैन भी उपस्थित थे। इसके बाद भागलपुर से लौटकर दिल्ली जाने के क्रम में राज्यपाल रामनाथ कोविंद और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महामहिम को पटना हवाई अड्डे पर विदाई दी।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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आतंकवाद से अधिक खतरनाक है प्यार !

अगर कहा जाय कि प्यार आतंकवाद से अधिक खतरनाक होता है, तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? आप चौंकेंगे, हंसेंगे या सवाल करने वाले के मानसिक संतुलन को संदेह से देखेंगे? आप कुछ सोचें या करें उससे पहले बीते 15 सालों के सरकारी आंकड़ों पर नज़र दौड़ाएं, जो चीख-चीख कर बता रहे हैं कि भारत में आतंकवाद से ज्यादा जानें प्यार के चलते गई हैं।

जिन आंकड़ों की बात हम कर रहे हैं, वे साल 2001 से 2015 की अवधि के हैं। इन 15 सालों में आतंकवादी घटनाओं में जहां 20,000 लोगों की जानें गईं, वहां इसी अवधि में प्यार से जुड़े मामलों में 38,585 हत्या और गैर इरादतन हत्या जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम दिया गया। यही नहीं, इसी दौरान प्यार में हारने और इससे जुड़ी अन्य वजहों से करीब 79,189 लोगों ने मौत को गले लगा लिया। इस अवधि में 2.6 लाख अपहरण के केस भी दर्ज किए गए, जिनमें महिला के अपहरण की मुख्य वजह उससे शादी रचाने का इरादा था।

आंकड़ों के मुताबिक इन 15 सालों में प्रतिदिन 7 हत्याओं, 14 आत्महत्याओं और 47 अपहरण के मामलों का जिम्मेदार था प्यार। प्यार को लेकर परिजनों का अस्वीकार, एकतरफा प्यार और जबरन शादी जैसे कारण इसमें शामिल हैं। दूसरी ओर इसी दौरान आतंकवादी घटनाओं में जिन 20,000 लोगों की मौत हुई, उनमें सुरक्षा बल और आम नागरिक दोनों शामिल हैं।

आंकड़े बताते हैं कि आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश प्यार के मकसद से की गई हत्याओं के मामलों में सबसे आगे हैं। इन सभी राज्यों में इस अवधि में 3,000 से ज्यादा हत्याएं प्रेम-प्रसंगों के चलते हुईं। वहीं, प्यार में की गई आत्महत्या के मामलों में पश्चिम बंगाल शीर्ष पर है, जबकि राज्य के 2012 के आंकड़े नहीं मिल सके हैं। आपको हैरत होगी कि सांस्कृतिक रूप से अत्यन्त समृद्ध इस राज्य में बीते 14 सालों में 15,000 खुदकुशी के मामलों की वजह प्रेम-संबंध थे। इन 15 सालों में प्यार में जान देने वालों में दूसरे पायदान पर तमिलनाडु है, जहां प्रेम प्रसंगों के चलते 9,405 लोगों ने मौत को गले लगा लिया। इसके बाद असम, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और मध्य प्रदेश का नंबर आता है। इन सभी राज्यों में 5,000 से अधिक लोगों ने प्यार में जान दे दी।

सच तो यह है कि प्यार जिस अहसास का नाम है उससे अधिक कोमल, उससे अधिक निश्चल, उससे अधिक पवित्र और उससे अधिक महान इस संसार में कुछ भी नहीं। सबसे अधिक कविताएं इसी प्यार पर बनीं, सबसे अधिक कहानियां इसी प्यार को लेकर रची गईं, सबसे अधिक मूर्तियां इसी प्यार को लेकर गढी गईं, सबसे अधिक चित्र इसी प्यार को लेकर उकेरे गए, नृत्य और अभिनय की अधिकांश भंगिमाएं इसी प्यार की ऋणी हैं, हर सृजन के मूल में यही प्यार है और सोच कर देखिए, ऊपर दिए गए आंकड़े भी इसी प्यार के हैं! ये कैसा विरोधाभास है? क्या इस विरोधाभास के रहते हम मनुष्य कहलाने के अधिकारी हैं?

जरा अपने भीकर झांककर देखें। आखिर क्या है प्यार के इस हश्र का कारण? जनाब कारण कहीं बाहर नहीं, हमारे ही भीतर है। हमारे ही अहं और अविवेक का परिणाम है ये। इक्कीसवीं सदी में भी हम पुरुषवादी व सामंती सोच से ऊपर नहीं उठ सके हैं। हम अब भी वोट से लेकर बेटी तक जाति देखकर ही देते हैं। हमारी ये व्यवस्था किसी और ने नहीं, हमने ही बनाई हैं और सच यह है कि हम ही उसे तोड़ भी पाएंगे। और जब तक ऐसा नहीं होगा, ऐसे आंकड़े हमारे सामने आते रहेंगे और हम मुंह छिपाते रहेंगे।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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दिल्ली में बिहारी दंगल

बिहार में भले ही जेडीयू, आरेजडी और कांग्रेस मिलकर सरकार चला रही हैं लेकिन ‘इंद्रप्रस्थ’ की कुर्सी के लिए तीनों पार्टियां एक-दूसरे से जोर-आजमाइश करती नज़र आएंगी। जी हां, दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) चुनाव में इन तीनों दलों के दिग्गज हाथ आजमाने जा रहे हैं। जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार और आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव जहां बिहार में महागठबंधन की सहयोगी कांग्रेस से अलग ताल ठोकने की तैयारी में हैं, वहीं लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान भी जोर-आजमाइश में जुटे हुए हैं। उधर प्रदेश भाजपा के नेता अपनी पार्टी के चुनाव प्रचार में जाने को कमर कस चुके हैं वो अलग। एक अनुमान के मुताबिक, दिल्ली की करीब 1 करोड़ 90 लाख की आबादी में लगभग 40 लाख बिहार और पूर्वांचल के मतदाता हैं, जिन्हें बिहार के सारे नेता अपने-अपने दलों की ओर खींचना चाहते हैं।

वैसे जेडीयू की बात करें तो वह पूरी तैयारी के बाद भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी नहीं उतार सकी थी, लेकिन एमसीडी चुनाव में बिहार से बाहर निकलने का मौका वह अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहती। पार्टी प्रवक्ता नीरज कुमार की मानें तो जेडीयू एमसीडी चुनाव में लगभग सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। इसके मद्देनजर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पार्टी के पक्ष में मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए 9 अप्रैल को उत्तरी और दक्षिणी दिल्ली में दो रैलियां करने जा रहे हैं। नीतीश कुमार द्वारा दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग करना या अभी हाल ही में जेडीयू का भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठाना भी एमसीडी चुनाव के मद्देनज़र मतदाताओं को अपनी ओर लाने का प्रयास माना जा रहा है।
इधर आरजेडी नेता मृत्युंजय तिवारी ने भी कहा है कि उनकी पार्टी एमसीडी चुनाव में भाग्य आजमाएगी। उन्होंने कहा कि इस चुनाव में प्रचार के लिए पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और राज्य के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव सहित बिहार के कई नेता दिल्ली जाएंगे।

एमसीडी चुनाव को लेकर बिहार महागठबंधन की तरह एनडीए में भी बिखराव देखा जा रहा है। भाजपा के साथ सीटों को लेकर कोई समझौता न होने के कारण लोजपा अकेले ही चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुकी है। लोजपा संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष चिराग पासवान कहते हैं कि पार्टी नगर निगम चुनाव के लिए भाजपा के साथ गठबंधन करना चाहती थी लेकिन यह नहीं हो सका। उन्होंने कहा, ‘हमें लगता है कि हमारा प्रदेश संगठन चुनाव लड़ने के लिए मजबूत है इसलिए हमने अधिकतम सीटों पर दिल्ली नगर निगम चुनाव लड़ने का फैसला किया है।’
ये तो हुई जेडीयू, आरजेडी और लोजपा की बात। अब जरा भाजपा की भी चर्चा कर लें। भाजपा इन चुनावों को ध्यान में रख बिहार और पूर्वांचल के मतदाताओं को लुभाने के लिए पहले ही दिल्ली की कमान मनोज तिवारी को सौंप चुकी है, जो बिहार से आते हैं। वैसे बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेता नंदकिशोर यादव बताते हैं कि एमसीडी चुनाव के प्रचार के लिए बिहार के कई नेता भी दिल्ली जाने की तैयारी कर चुके हैं।

बहरहाल, दिल्ली के इस बिहारी दंगल का परिणाम क्या होता है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन आप, भाजपा और कांग्रेस के स्पष्ट त्रिकोण में बिहार के दिग्गजों के हाथ कुछ लगेगा, इसकी उम्मीद कम ही है।

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कांग्रेस के मुस्लिम नेता ने की भागवत को राष्ट्रपति बनाने की वकालत!

इसे ‘वक्त’ का तकाजा कहें या राजनीति की विडंबना..! कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व रेल मंत्री सी.के. जाफर शरीफ ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी लिखकर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को राष्ट्रपति बनाने की वकालत की है। उन्होंने कहा है कि संघप्रमुख भागवत की राष्ट्रभक्ति और संविधान के प्रति निष्ठा पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता है।

29 मार्च को लिखे अपने पत्र में शरीफ ने कहा, मैं व्यक्तिगत तौर पर महसूस करता हूं कि देश के राष्ट्रपति के तौर पर मोहन भागवत के नाम पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। भागवत के नाम का विरोध करके किसी को इस मुद्दा नहीं बनाना चाहिए क्योंकि संघ प्रमुख ऐसे देशभक्त हैं जो लोकतंत्र के प्रति वफादार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हर मुश्किल समय में राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी को अच्छे से निभाता आया है।

गौरतलब है कि बीते दिनों शिवसेना सांसद संजय राउत ने भी भागवत के नाम की वकालत की थी। राउत ने कहा था कि देश को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए संघ प्रमुख भागवत राष्ट्रपति पद के लिए अच्छी पसंद होंगे। राष्ट्रपति का पद देश में सर्वोच्च पद है। इस पद पर साफ छवि वाले किसी व्यक्ति को बैठना चाहिए। हालांकि, राउत ने कहा था कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के फैसले के बाद ही पार्टी भागवत के नाम पर सहमति दर्ज कराएगी।

बहरहाल, शिवसेना अगर भागवत की वकालत करे तो बात समझ में आती है, लेकिन सी.के. जाफर शरीफ का इस तरह का पत्र लिखना समझ के परे है। कहने की जरूरत नहीं कि उनका प्रस्ताव कांग्रेस की सोच और संस्कृति के एकदम उलट है। वैसे फौरी तौर पर शरीफ के इस कदम की दो व्याख्या हो सकती है – पहली यह कि वे कांग्रेस से ‘असंतुष्ट’ हैं और भाजपा से ‘कुछ’ पाने’ की चाहत रखते हैं और (एक प्रश्नचिह्न के साथ) दूसरी यह कि भाजपा और संघ को लेकर मुस्लिमों की राय बदल रही है या बदल सकती है और शरीफ का मोदी को पत्र लिखना उसी का अक्श है?

वैसे चलते-चलते बता दें कि संघप्रमुख खुद इस तरह की खबरों का खंडन करते हुए कह चुके हैं कि वह राष्ट्रपति नहीं बनना चाहते हैं। उन्होंने तो यहां तक कह दिया है कि अगर उनके सामने ऐसा प्रस्ताव आता भी है तो वह उसे स्वीकार नहीं करेंगे।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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