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मधेपुरा विधान सभा के लिए अन्तिम दिन सात और नामांकन

मधेपुरा विधान सभा (क्षेत्र सं. 73) के लिए आज नामांकन के अन्तिम दिन 15 अक्टूबर को सात नामांकन भरे गए। निर्वाची पदाधिकारी सह अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार निराला ने मधेपुरा अबतक को बताया कि महागठबंधन की ओर से खड़े राजद प्रत्याशी प्रो. चन्द्रशेखर ने आज भी दो सेट में नामांकन के पर्चे दाखिल किए। ज्ञातव्य है कि प्रो. चन्द्रशेखर ने कल यानि 14 अक्टूबर को भी दो सेट में नामांकन दाखिल किया था।

आज 15 अक्टूबर को सात नए उम्मीदवारों ने भी नामांकन भरा। इनमें जन अधिकार पार्टी से डॉ. अशोक कुमार, बहुजन मुक्ति पार्टी से मनीष कुमार, भारतीय जनक्रांति दल (डेमो.) से कामेश्वर यादव तथा हिन्द कांग्रेस पार्टी से विनोद कुमार शामिल हैं। इन चारों के अतिरिक्त तीन निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी आज पर्चे दाखिल किए। इनके नाम हैं – मो. अल्लाउद्दीन, मो. अली एवं सुरेश यादव।

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मधेपुरा विधान सभा के लिए नामांकन ने पकड़ी रफ्तार

पाँचवें चरण के नोटिफिकेशन के पाँचवें और नवरात्रि के प्रथम दिन यानि 13 अक्टूबर से मधेपुरा विधान सभा (क्षेत्र सं. 73) के लिए नामांकन कार्य में रफ्तार आई है। इस दिन महादलित व दलित परिवार के दो प्रत्याशियों ने नामांकन का पर्चा दाखिल किया। इनमें एक हैं पूर्व मंत्री नवल किशोर भारती के पुत्र ओम प्रकाश भारती जिन्होंने मानववादी जनता पार्टी से नामांकन का पर्चा भरा है और दूसरे प्रत्याशी हैं कपिलदेव पासवान जिन्होंने बहुजन समाज पार्टी से नामांकन का पर्चा दाखिल किया है। ये दोनों ही इंटर पास हैं। बड़े-से-बड़े दलित नेता भी जहाँ ‘सुरक्षित’ क्षेत्र की तलाश में दूरियां नापते कहीं से कहीं चले जाते हैं, वहाँ इन दोनों का ‘सामान्य’ क्षेत्र से किस्मत आजमाना सचमुच बड़ी बात है। इन दोनों ने शायद “मंगल मुखी सदा सुखी” सोच कर नामांकन के लिए मंगलवार का दिन चुना। अब ये कितने ‘सुखी’ हो पाएंगे ये तो 8 नवंबर यानि मतगणना के दिन ही पता चल पाएगा।

नवरात्रि के दूसरे दिन यानि 14 अक्टूबर, बुधवार को उन दो प्रत्याशियों ने नामांकन के पर्चे दाखिल किए जिनके बीच इस चर्चित सीट के लिए सीधा मुकाबला तय माना जा रहा है। ये दोनों हैं मधेपुरा के निवर्तमान विधायक और महागठबंधन के उम्मीदवार प्रो. चन्द्रशेखर तथा नगर परिषद् के निवर्तमान मुख्य पार्षद् और एनडीए प्रत्याशी डॉ. विजय कुमार विमल। अपने नामांकन से ‘असर’ पैदा करने में इन दोनों ने कोई ‘कसर’ नहीं छोड़ी लेकिन जनता के दरबार में किसकी फरियाद सुनी जाती है और बुधवार किसके लिए जीत का द्वार खोलता है, ये देखने की बात होगी।

निर्वाची पदाधिकारी सह अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार निराला से मधेपुरा अबतक को मिली जानकारी के अनुसार 14 अक्टूबर को इन दोनों के अलावे एक निर्दलीय ज्योति मंडल एवं चार अन्य प्रत्याशी जो कि अमान्यताप्राप्त दलों से ताल्लुक रखते हैं, ने भी नामांकन के पर्चे भरे हैं। इनके नाम हैं – मो. ताहिर, दिनेश यादव उर्फ फौजी, कमल कुमार एवं विजेन्द्र यादव।

बता दें कि पाँचवें चरण के लिए नामांकन की अंतिम तिथि 15 अक्टूबर है। स्क्रूटनी के लिए 16 अक्टूबर का दिन निश्चित है तथा 19 अक्टूबर तक नाम वापस लिए जा सकते हैं। मतदान 5 नवंबर को होना है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार चुनाव के पहले चरण में 57 प्रतिशत मतदान : कौन खुश, कौन परेशान..?

बिहार में पहले चरण का चुनाव सम्पन्न हुआ। 10 जिलों की 49 सीटों पर कल हुए मतदान में 57 प्रतिशत वोट डाले गए। 2010 की तुलना में ये 6 प्रतिशत ज्यादा है। सबसे ज्यादा मतदान खगड़िया में 61 प्रतिशत और सबसे कम नवादा में 53 प्रतिशत रहा। वोट के मामले में महिलाएं पुरुषों से आगे रहीं। पुरुषों के 54.5 प्रतिशत मतदान के मुकाबले महिलाओं के मतदान का प्रतिशत 59.5 रहा।

सभी 49 सीटों पर महागठबंधन और एनडीए के बीच सीधा मुकाबला है। महागठबंधन की बात करें तो इनमें से जेडीयू 24, राजद 17 और कांग्रेस 8 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। एनडीए की ओर से भाजपा के 27, लोजपा के 13, रालोसपा के 6 और हम के 3 उम्मीदवार मैदान में हैं।

पिछले चुनाव की तुलना में मतदान में हुए 6 प्रतिशत इजाफे को एनडीए ‘परिवर्तन की बयार’ कह रहा है तो महागठबंधन इसे नीतीश का ‘मेहनताना’ बता रहा है। दोनों दावों में कौन सही है, ये तो खैर आने वाला वक्त बताएगा लेकिन वोटों में ऐसा इजाफा भी नहीं हुआ कि उसे ‘एंटी इन्कम्बेंसी’ कह दिया जाय। खास तौर पर तब जबकि मुकाबला सीधा हो और थोड़ा भी ‘त्रिकोण’ बनने की स्थिति में पलड़ा किसी भी तरफ झुक जाने की गुंजाइश बन रही हो। हाँ, अगले चरणों में मतदान प्रतिशत और बढ़ता है तो उसे महागठबंधन के लिए खतरे की घंटी जरूर मान सकते हैं क्योंकि वर्तमान ‘समीकरण’ को देखते हुए ऐसा होना ‘एंटी इन्कम्बेंसी’ या ‘मोदी फैक्टर’ का असर माना जाएगा। कुल मिलाकर कल के आंकड़ों से ना तो एनडीए पूरी तरह ‘आश्वस्त’ हो सकता है, ना ही महागठबंधन के लिए ‘हताश’ हो जाने की स्थिति है।

बहरहाल, कल जिन 10 जिलों में चुनाव हुए, वे हैं समस्तीपुर, बेगुसराय, खगड़िया, भागलपुर, बांका, मुंगेर, लखीसराय, शेखपुरा, नवादा और जमुई। इन 10 जिलों की 49 सीटों के लिए कुल 583 उम्मीदवार मैदान में थे जिनमें 54 महिला उम्मीदवार भी शामिल हैं। इस चरण में मतदान केन्द्रों की कुल संख्या 13 हजार 212 और मतदाताओं की कुल संख्या एक करोड़ 35 लाख 72 हजार 339 थी।

पहले दौर में जिन उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला होना है उनमें समस्तीपुर जिले की सरायरंजन सीट से चुनाव लड़ रहे जेडीयू विधायक दल के नेता और जल संसाधन मंत्री विजय चौधरी प्रमुख हैं। उनका मुकाबला भाजपा के रंजीत निर्गुणी से है। जहाँ विजय चौधरी की गिनती राज्य के बड़े नेताओं में होती है वहीं निर्गुणी अभी जिला परिषद् के सदस्य हैं केवल। इस दौर के एक अन्य प्रमुख उम्मीदवार हम के प्रदेश अध्यक्ष शकुनी चौधरी हैं जो तारापुर से चुनाव लड़ रहे हैं। शकुनी का मुकाबला जेडीयू के मेवालाल चौधरी से है जो कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वीसी रह चुके हैं।

कहलगांव से कांग्रेस विधायक दल के नेता सदानंद सिंह और अलौली से लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस भी इसी चरण में चुनाव मैदान में हैं। सदानंद सिंह का मुकाबला लोजपा के नीरज मंडल से है और पारस का मुकाबला राजद के चंदन राम से। ये दोनों अपनी-अपनी पार्टी के कद्दावर नेता हैं और इनकी जीत-हार से क्रमश: कांग्रेस और लोजपा की साख पर असर पड़ना तय है।

पहले दौर के अन्य महत्वपूर्ण उम्मीदवारों में नीतीश सरकार में मंत्री रहीं और इस बार भाजपा से किस्मत आजमा रहीं रेणु कुशवाहा (समस्तीपुर), जेडीयू सरकार के मंत्री दामोदर राउत (झाझा), युवा राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक मेहता (उजियारपुर) और राजद सांसद जय प्रकाश यादव के भाई विजय प्रकाश (जमुई) शामिल हैं।

राज्य के तीन नेताओं की अगली पीढ़ी की किस्मत भी कल इवीएम में बंद हो गई। भागलपुर से सांसद अश्विनी चौबे के बेटे अर्जित शाश्वत (भाजपा), जेडीयू के पूर्व मंत्री और वर्तमान में हम के नेता नरेन्द्र सिंह के बेटे अजय प्रताप (भाजपा) और कल्याणपुर से लोजपा सांसद रामचन्द्र पासवान के बेटे प्रिंस राज (लोजपा) चुनाव मैदान में हैं। अब इन पिता-पुत्रों की धड़कनें 8 नवंबर तक तेज रहेंगी।

 मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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स्वेतलाना एलेक्सिएविच ने बढ़ाया साहित्य, नोबेल और नारी का दायरा

इतिहास केवल समय के बहाव और उस पर अंकित तारीखों में नहीं होता, इतिहास मानव-मन के भीतर हिलोड़ें लेती भावनाओं का भी हो सकता है। अगर भीतर के इस इतिहास को आकार लेते देखना हो तो एक बार स्वेतलाना एलेक्सिएविच को जरूर पढ़ें जिन्हें 2015 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला है। स्वेतलाना साहित्य का नोबेल पानेवाली चौदहवीं महिला और पहली पत्रकार हैं। उन्हें यह सम्मान भावनाओं के इतिहास को संकलित करने वाली उनकी खोजी किताबों के लिए दिया गया है जिनमें पूर्व सोवियत संघ के लोगों के जीवन को उन्होंने गजब की बारीकी से उकेरा है। आज जबकि पत्रकारिता ‘सेंशेसन’ में खोती जा रही है, स्वेतलाना हमें बहुत शिद्दत से बताती हैं कि उसे कैसे सृजन से नया आयाम दिया जा सकता है।

दुनिया के इस सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए इस साल 198 लोगों को नामांकित किया गया था लेकिन चुना गया 67 साल की स्वेतलाना एलेक्सिएविच को। स्वेतलाना के नाम की घोषणा करते हुए नोबेल कमिटी ने तीन चीजों को खास तौर से रेखांकित किया। स्वेतलाना को भीड़ से अलग करने वाली  वे तीन चीजें हैं – ‘विविधता से भरा लेखन’, ‘पीड़ा का स्मारक’ और ‘हमारे समय में साहस’। प्रत्यक्षदर्शियों की जुबान से कहानी कहने में महारत रखने वाली स्वेतलाना की कृतियां ‘वॉयसेस ऑफ यूटोपिया’ कही जाती हैं। स्वीडिश अकादमी, स्टॉकहोम की सचिव सैरा डैनियुस ने बिल्कुल सही चिह्नित किया है कि उनके लेखन में ‘ऐतिहासिक घटनाएं नहीं’ बल्कि ‘भावनाओं का इतिहास’ है।

स्वेतलाना का जन्म 31 मई, 1948 को यूक्रेन के शहर स्तानिस्लाव में हुआ। उन्होंने यूक्रेन, फ्रांस और बेलारूस में लम्बा समय बिताया। उनके पिता बेलारूस के थे और माँ यूक्रेन की। 1962 में स्वेतलाना अपने माता-पिता के साथ बेलारूस आ गईं और यहीं पर अपनी पढ़ाई पूरी की। इस नोबेल पुरस्कार विजेता ने एक स्थानीय अखबार में रिपोर्टिंग करने के लिए स्कूल की पढाई छोड़ दी थी। खैर, स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पत्रकार व शिक्षिका के रूप में कार्य किया। इसी दौरान उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध, सोवियत-अफगान युद्ध, सोवियत संघ के पतन और चेरनोबिल आपदा जैसे विषयों पर लिखा। 1985 में उनकी पहली किताब ‘वॉर्स अनवुमेनली फेस’ आई जिसकी अब तक 20 लाख प्रतियां बिक चुकी हैं। खोजी प्रकृति की स्वेतलाना ने इस किताब के लिए द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लेने वाली सैकड़ों महिलाओं का इंटरव्यू लिया था।

विषय-चयन और पूर्वतैयारी की बात करें तो स्वेतलाना एलेक्सिएविच सधी हुई पत्रकार हैं और जब वो ‘ट्रीटमेंट’ और विश्लेषण पर आती हैं तो करुणा से ओतप्रोत साहित्यकार दिखेंगी। यूक्रेन के चेरनोबिल परमाणु संयंत्र में 1986 में हुए हादसे पर लिखी गई उनकी बहुचर्चित किताब ‘वॉयसेस ऑफ चेरनोबिल’ इसका लाजवाब उदाहरण है। उनकी एक और किताब है ‘सेकैंड हैंड टाइम’ जिसमें वो बड़ी संवेदना के साथ पड़ताल करते दिखेंगी कि सोवियत संघ के विघटन के बाद सोवियतकालीन पीढ़ियों ने खुद को नई दुनिया में कैसे ढाला। ‘जिंकी ब्वॉयज’, ‘द लास्ट विटनेसेज : द बुक ऑफ अनचाइल्डलाइक स्टोरीज’ तथा ‘एनचांटेड विथ डेथ’ उनकी अन्य कृतियां हैं।

स्वेतलाना की रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। कई अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें मिल चुके हैं। उनकी स्वीकार्यता आज दुनिया भर में है लेकिन ये तथ्य हैरान करता है कि रूसी भाषा में लिखी उनकी कुछ किताबें ‘विवादों’ का शिकार होकर उनके अपने ही देश में प्रकाशित नहीं हो पाईं। कारण जो भी हो, अभिव्यक्ति पर इस तरह की ‘बंदिश’ बताती है कि आज भले ही चाँद के बाद मंगल पर भी दस्तक दे दी हो हमने, पर सच ये है कि धरती पर रहना भी हम ठीक से नहीं सीख पाए अब तक। स्वेतलाना एलेक्सिएविच, सलमान रश्दी या तसलीमा नसरीन जैसों का महत्व इस कारण भी है कि वे हमें इस बात की याद दिलाते रहते हैं।

साहित्य में पत्रकारिता की इतनी प्रांजल और संवेदनशील उपस्थिति स्वेतलाना से पहले नहीं थी, स्वेतलाना से पहले किसी पत्रकार को साहित्य का नोबेल नहीं मिला था और लेखकीय प्रतिबद्धता के लिए किसी नारी के ऐसे संघर्ष का उदाहरण भी कदाचित् नहीं दिखता। कहने की जरूरत नहीं कि स्वेतलाना एलेक्सिएविच ने अकेले अपने दम पर साहित्य, नोबेल और नारी तीनों का दायरा एक साथ बढ़ाया है।

चलते-चलते

अगर आप जानने को उत्सुक हैं कि स्वेतलाना एलेक्सिएविच से पहले किन तेरह महिलाओं को साहित्य का नोबेल मिला तो ये रही पूरी सूची – 1909 में सेल्मा ओटालिया लोविसा लाजरोफ (स्वीडन), 1926 में ग्रेजिया डेलेड्डा (इटली), 1928 में सिगरिड उंडसेट (नॉर्वे), 1938 में पर्ल एस. बक (अमेरिका), 1945 में गेब्रिएला मिस्त्राल (चिली), 1966 में नेली साक्स (स्वीडन-जर्मनी), 1991 में नेडिन गोर्डिमर (दक्षिण अफ्रीका), 1993 में टोनी मॉरिसन (अमेरिका), 1996 में विस्लावा सिम्बोर्सका (पोलैंड), 2004 में एल्फ्रीड जेलिनेक (ऑस्ट्रिया), 2007 में डोरिस लेसिंग (इंग्लैंड), 2009 में हर्टा म्यूलर (जर्मनी-रूमानिया), 2013 में एलिस मुनरो (कनाडा) और 2015 में स्वेतलाना एलेक्सिएविच (बेलारूस)।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मधेपुरा विधानसभा क्षेत्र में नामांकन की गति धीमी

मधेपुरा विधानसभा क्षेत्र-73 के निर्वाचन पदाधिकारी सह अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार निराला ने मधेपुरा अबतक से कहा कि मधेपुरा नगर परिषद् के मुख्य पार्षद डॉ.विशाल कुमार बबलू ने विशाल कुमार नाम से स्वतंत्र अभ्यर्थी के रूप में पहला नामांकन दाखिल कर चुनावी संग्राम में उतरने का बिगुल फूंका है | उन्होंने यह भी कहा कि तीन दिनों में दो नामांकन के पर्चे ही भरे गये हैं | दूसरा नामांकन सी.पी.आई.(एम.) पार्टी उम्मीदवार के रूप में पार्टी के वर्तमान जिला अद्यक्ष गणेश मानव द्वारा दिया गया है |

अन्त में उन्होंने यही कहा कि अगले चार दिनों में यानी 15अक्टूबर तक नामांकन के पर्चे भरने की गति में बढ़ोतरी से इन्कार नहीं किया जा सकता |

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राजनीति का ‘मुखौटा युग’ और बिहार चुनाव

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी / जिसको भी देखना हो कई बार देखना – निदा फ़ाज़ली ने ये पंक्तियां आज के आदमी के लिए कही हैं पर ये आज के समाज और पूरे समय के लिए भी उतनी ही मौजू हैं और सबसे अधिक मौजू हैं आज की राजनीति के लिए। आज राजनीति ऐसी हो चुकी है कि आप जो चेहरा लेकर सुबह निकलते हैं, शाम उसी चेहरे के साथ वापस नहीं आते। आपके कितने चेहरे हैं और कितने हो सकते हैं ये स्वयं आप भी नहीं जान रहे होते। ये स्थिति सचमुच बहुत खतरनाक है। आज हम मुखौटों के युग में रह रहे हैं और मुखौटे ही हमारा चेहरा हैं। बस जरूरत के अनुसार आप अपना मुखौटा बदलते रहिए, गिनने की क्या जरूरत है कि आपके भीतर आदमी दस-बीस हैं या उससे भी ज्यादा।

बहरहाल, मुद्दे पर आते हैं और बिहार चलते हैं जहाँ ‘मुखौटों’ के लिए सबसे माकूल मौसम चल रहा है अभी। कहने की जरूरत नहीं कि मुखौटों की फसल चुनाव के मौसम में लहलहाने लगती है। क्या पार्टी, क्या नेता, क्या कार्यकर्ता सभी ताबड़तोड़ मुखौटा उपजाते दिख जाएंगे आपको। पर मजे की बात तो ये है कि मुखौटों की भीड़ में सबसे बड़ा मुखौटा ये होता है कि मैं तो बिना मुखौटे के खड़ा हूँ, आप तो बस सामनेवाले को पकड़िए जिसने फलां मुखौटा पहना हुआ है।

अगर कहा जाय कि बिहार में असली लड़ाई ‘मुखौटे’ को लेकर है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इधर महागठबंधन शोर मचा रहा है कि भाजपा पार्टी नहीं, आरएसएस का मुखौटा है केवल तो उधर एनडीए चिल्ला-चिल्ला कर बोल रहा है कि नीतीश तो मुखौटा हैं केवल, पीछे लालू का जंगलराज पार्ट-2 है। अब ये जनता पर है कि वो किसके मुखौटे को उतारेगी। जिसका मुखौटा उतरेगा वो मैदान से बाहर।

लालू लम्बे समय से भाजपा पर संघ का मुखौटा होने का आरोप लगाते रहे हैं। और अब भाजपा से रिश्ता टूटने के बाद नीतीश भी उनके सुर में सुर मिलाने लगे हैं। संघप्रमुख मोहन भागवत ने बीच चुनाव में आरक्षण की ‘समीक्षा’ की बात कहकर इन दोनों को और ताल ठोकने का मौका दे दिया। अब दोनों ललकार कर कह रहे हैं कि हिम्मत है तो आरक्षण खत्म करके दिखाएं। वे लोगों को समझा रहे हैं कि भाजपा आरएसएस का राजनीतिक संगठन है, जो आरएसएस का विचार है वही भाजपा का विचार है। भाजपा अगर बिहार में सत्ता में आई तो आरक्षण खत्म कर देगी। शुरू में भाजपा इस मुद्दे पर बैकफुट पर जाते दिखी लेकिन जल्द ही उसके सारे नेता ये विश्वास दिलाने में जुट गए कि भाजपा भी आरक्षण का समर्थन करती है और इसमें कोई बदलाव नहीं होगा। भाजपा ने एक तरफ ‘डैमेज कंट्रोल’ तो दूसरी तरफ हमला तेज करने की नीति बनाई। अमित शाह गरजकर कहने लगे कि नीतीश के मुखौटे के पीछे लालू का ‘जंगलराज’ खड़ा है। नीतीश विकास की बात कर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। बोलते-बोलते वो यहाँ तक बोल गए कि अब नीतीश के लिए बिहार में कोई जगह नहीं है। साथ में ये भी कि 8 नवंबर यानि मतगणना के दिन वो अपना इस्तीफा तैयार रखें। अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के नक्शेकदम पर सुशील मोदी समेत बिहार के बाकी नेता भी अपने-अपने तरीके से मुखौटे की बात दोहराते हैं। और इस तरह, ‘मंच’ हो कोई भी, दोनों गठबंधन बस ‘मुखौटे’ का गीत गाते हैं।

कहने की जरूरत नहीं कि मुखौटे की माया बहुत बड़ी है। इस माया से सर्वथा मुक्त होना सम्भव भी नहीं। चुनाव में चाहे जो जीते, राज तो कोई ‘मुखौटा’ ही करेगा। मुखौटे का ही ‘राज’ और मुखौटे का ही ‘धर्म’। (पत्रकार से पॉलिटिशियन बने आशुतोष ने अपनी किताब का नाम ‘मुखौटे का राजधर्म’ बहुत सोचकर रखा होगा..!) लेकिन अपने-अपने मुखौटे पर इतराते नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकबारगी ये भी सोच लेना चाहिए कि जिस जनता के बीच वो मुखौटा पहने घूम रहे हैं वो भी मुखौटे में हो सकती है और जिस दिन जनता मुखौटा पहन लेगी वो कहीं के नहीं रहेंगे। फिर तो करोड़ों मुखौटे मिलकर उनके चेहरे पर एक पर एक चढ़े मुखौटों को उतारेंगे जैसे प्याज को उघेरते हैं परत-दर-परत।

 मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पाँचवें चरण के चुनाव के लिए कोसी एवं सीमांचल के मधेपुरा सहित 37 सीटों पर 8 अक्टूबर से नामांकन शुरू

कोसी के तीन जिले मधेपुरा, सहरसा, सुपौल तथा सीमांचल के चार जिले पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज और अररिया यानी इन सातो जिलों के 37 सीटों पर विधानसभा चुनाव-2015 के लिए अधिसूचना जारी कर दी गई है | प्रत्येक सीट के लिए 8 अक्टूबर से 15 अक्टूबर तक रविवार सहित छुट्टी के दिनों को छोडकर प्रतिकार्य दिवस 11 बजे पूर्वाह्न से 3 बजे अपराह्न तक नामांकन होगा तथा 16 अक्टूबर को स्क्रूटनी होगी | नाम वापसी की अंतिम तिथि 19 अक्टूबर होगी | इन सभी 37 सीटों पर मतदान 5 नवम्बर (गुरूवार) के दिन सवेरे 7 बजे से शाम 5 बजे तक होगा | और 8 नवम्बर को होगा जनतंत्र के नायकों के भाग्य का फैसला यानी सवेरे 8 बजे से मतगणना का कार्यारम्भ होगा |

चुनाव आयोग ने कहा है कि निर्भीक होकर सभी मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करें | याद रहे- पहली बार इ.वी.एम. में रहेंगे उम्मीदवारों के फोटो, सभी बूथों पर रहेंगे अर्धसैनिक बल और हेलीकाप्टर से होगी बूथों की निगरानी |

S.D.M. Madhepura, Sanjay Kumar Nirala
Returning Officer cum S.D.M. Madhepura, Sanjay Kumar Nirala ready to receive nomination papers

मधेपुरा विधानसभा- 73 के रिटर्निंग आफिसर सह अनुमंडल पदाधिकारी श्री निराला ने मधेपुरा अबतक को बताया कि हमारे सभी मतदाता जागरूक होकर मतदान करेंगे एवं सभी अभ्यर्थी आचारसंहिता का पालन करेंगे | उन्होंने बताया कि नामांकन के प्रथम दिन एक भी अभ्यर्थी अपना पर्चा दाखिल नहीं किया है | मौके पर एक वृद्ध नागरिक ने कहा कि कदाचित् सभी अभ्यर्थी लोकनायक जयप्रकाश नारायण की पुण्यतिथि (8 अक्टूबर) पर उन्हें याद करने एवं शोकोदगार व्यक्त करने में लगे होने के कारण ही नहीं आये होंगे |

बिहार के कुल 243 सीटों में से अंतिम यानी पांचवें चरण में जिन 37 सीटों पर 5 नवम्बर को मतदान होना है उनमें 7 सुरक्षित क्षेत्र हैं- सिंहेश्वर, सोनवर्षा, त्रिवेणीगंज, बनमनखी, कोढा, मनिहारी और रानीगंज |

शेष 30 सामान्य सीटें हैं- मधेपुरा, बिहारीगंज, आलमनगर, सहरसा, सिमरी बख्तियारपुर, महिषी, सुपौल, निर्मली, पिपरा, छातापुर, पूर्णिया, कसबा, रुपौली, धमदाहा, आमोर, बायसी, कटिहार, कदवा, बलरामपुर, प्राणपुर, बरारी, किशनगंज, कोचाधामन, बहादुरगंज, ठाकुरगंज, अररिया, सिकटी, जोकीहाट, फारविसगंज, नरपतगंज |

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बड़ी गहरी मोदी की मार, ‘थाली’ के बदले लिया बिहार

लगता है दिल्ली भेजे गए लाखों डीएनए सैंपल नीतीश के काम नहीं आ रहे। बिहार की जनता नीतीश के ‘स्वाभिमान’ के मुकाबले ‘छीनी गई थाली’ को लेकर प्रधामनंत्री मोदी की ‘शिकायत’ को ज्यादा तरजीह दे रही है शायद। इतनी ज्यादा कि अब थाली के बदले मोदी को पूरा बिहार मिलने जा रहा है। जी हाँ, ताजा सर्वे की मानें तो बिहार में एनडीए की सरकार बन रही है और वो भी दो तिहाई बहुमत से। जी न्यूज ने बीते 29 और 30 सितंबर को बिहार की सभी 243 सीटों पर ‘जनता का मूड’ जानने के लिए सर्वे किया। सर्वे का नाम भी ‘जनता का मूड’ ही था। इस सर्वे के अनुसार भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को स्पष्ट रूप से 147 सीटें मिलती दिख रही हैं, जबकि जदयू, राजद और कांग्रेस का महागठबंधन मात्र 64 सीटों पर सिमट रहा है। शेष 32 सीटों पर कांटे का मुकाबला है। इन सीटों पर पलड़ा किसी ओर झुक सकता है। बता दें कि इससे पहले जी न्यूज का सर्वे 18 सितंबर को आया था जिसमें एनडीए को 140 सीटें दिखाई गई थीं और महागठबंधन को 70 सीटें दी गई थीं।

12 अक्टूबर को 10 जिलों की 49 सीटों पर होने जा रहे पहले चरण के चुनाव की बात करें तो एनडीए को 53.8 प्रतिशत, महागठबंधन को 40.2 प्रतिशत और अन्य को 6 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है। सर्वे में एक दिलचस्प अनुमान नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को लेकर है। एनडीए को सबसे अधिक फायदा इन्हीं क्षेत्रों में होने जा रहा है। खास तौर से आरा से सीतामढ़ी तक पड़ने वाले इलाके में एनडीए को 54.6 प्रतिशत, जबकि महागठबंधन को 39.7 प्रतिशत वोट मिलने की सम्भावना बताई गई है।

सितम्बर के आखिरी हफ्ते में ही ‘लोकनीति सीएसडीएस’ ने भी सर्वे किया। सीएसडीएस सर्वे भी एनडीए की स्पष्ट बढ़त बता रहा है। इस सर्वे के मुताबिक एनडीए 42 प्रतिशत वोट हासिल करता दिख रहा है। नीतीश-लालू-कांग्रेस के महागठबंधन को 38 प्रतिशत वोट मिलने के आसार हैं और वो एनडीए से 4 प्रतिशत पीछे है। 4 प्रतिशत का ये अन्तर सीटों के बड़े अन्तर का कारण बन सकता है। हालांकि सर्वे के मुताबिक नीतीश कुमार अभी भी बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं और ग्रामीण इलाकों में महागठबंधन को अधिक वोट भी मिल रहे हैं लेकिन कुल मिलाकर बाजी एनडीए मार ले जा रहा है।

अब तक हुए सारे सर्वे पर गौर करें तो हम पाएंगे कि पहले बढ़त महागठबंधन को हासिल थी। बिहार में लोगों की आम राय थी कि केन्द्र के लिए मोदी और बिहार के लिए नीतीश ठीक हैं। लेकिन चुनाव ज्यों-ज्यों परवान चढ़ रहा है, त्यों-त्यों नरेन्द्र मोदी बिहार में भी अपनी जगह बनाते और फैलाते जा रहे हैं। इसे एक अन्य सर्वे के उदाहरण से समझें। एबीपी न्यूज/नीलसन के अब तक तीन सर्वे आए हैं। पहला सर्वे 24 जुलाई को आया था जिसमें महागठबंधन को 129 और एनडीए को 112 सीटें मिली थीं। 15 सितंबर को आए उनके दूसरे सर्वे में कांटे की टक्कर थी जिसमें महागठबंधन के हिस्से में 122 और एनडीए के हिस्से में 118 सीटें आई थीं। लेकिन 7 अक्टूबर तक आते-आते परिदृश्य बदल गया। उनके तीसरे सर्वे में एनडीए को 128 सीटें मिल रही हैं और महागठबंधन को 112 सीटें। अन्य के खाते में 3 सीटें गई हैं। यानि एनडीए की सरकार पूर्ण बहुमत से बन रही है। वोटों के प्रतिशत की बात करें तो एनडीए को 42, महागठबंधन को 40 और अन्य को 18 प्रतिशत वोट मिल रहे हैं।

कह सकते हैं कि सर्वे सम्भावनाओं का खेल है और आँख मूंदकर किसी सर्वे पर ऐतबार नहीं करना चाहिए। फिर भी राजनीति में अगर आप रुचि रखते हों और चुनाव परिणाम को लेकर आपके भीतर उत्सुकता हो तो एक बार आप बारी-बारी से बिहार के चार मुख्य दलों जदयू, राजद, कांग्रेस और भाजपा के पटना स्थित पार्टी कार्यालय जाएं। इन कार्यालयों का नजारा देख आप स्वयं किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहेंगे। पहले तीन दलों के कार्यालय में आपको  थोड़े विश्वास, थोड़ी आशंका के साथ ‘परीक्षा ठीक से गुजर जाय’ वाला भाव दिखेगा लेकिन भाजपा के कार्यालय की चहल-पहल देख आपको लगेगा कि वहाँ ‘अच्छे दिन’ की प्रतीक्षा हो रही है।

बिहार के चार कोने में चार परिवर्तन रैली के बाद चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की योजना एक के बाद एक कई रैलियों की है। उनका अभियान जितना आक्रामक दिख रहा है उतना ही व्यवस्थित भी। मोदी के कद का प्रधानमंत्री लगभग हर जिले में खुद पहुँच रहा हो तो ये सचमुच एक बड़ी बात है। हालांकि देखा जाय तो पोस्टर से लेकर प्रचार तक नीतीश कुमार कहीं भाजपा से पीछे नहीं हैं। लेकिन उन्हें कदम-कदम पर जिस तरह लालू और उनके तथाकथित ‘जंगलराज’ को डिफेंड करना पड़ रहा है उसे उनके ‘हार्डकोर’ समर्थक भी पूरी तरह पचा नहीं पा रहे हैं। नीतीश की ‘विकासपुरुष’ वाली छवि अब भी कायम है, लोगों ने उन्हें बिल्कुल भुला दिया हो ऐसी बात भी नहीं, ‘मांझी’ समेत बाकी परेशानियों का हल भी नीतीश शायद निकाल लें लेकिन दो विपरीत हो चुके ‘ध्रुव’ जिन परिस्थितियों में और जिस तरह साथ आए हैं वो उनके कार्यकर्ताओं और महागठबंधन के नाम पर ‘कुर्बान’ हुए नेताओं को ‘सहज’ नहीं होने दे रहा है। ऊपर से लालू कभी खुद को ‘नक्सली’ कहकर, कभी ‘गौमांस’ पर बयान देकर तो कभी अपने बड़े बेटे के छोटे और छोटे के बड़े हो जाने को लेकर रोज नई मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं सो अलग।

एक समय नरेन्द्र मोदी समेत अन्य भाजपा नेताओं को भोज पर आमंत्रित कर नीतीश ने अचानक वो कार्यक्रम स्थगित कर दिया था। हालांकि अब जाकर नीतीश इसके मूल में सुशील मोदी को बता रहे हैं लेकिन अगर ये सच भी हो तो बताने में शायद देर कर दी है उन्होंने। अब तो वो बीच रणभूमि में हैं और सर्वे अगर सच साबित हुए तो इसका मतलब ये होगा कि नरेन्द्र मोदी उनसे ‘छीनी गई थाली’ के बदले पूरा बिहार लेने जा रहे हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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तमोठ परसा गाँव के प्रवीण कुमार उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु यूरोपीय देश हंगरी के लिए उड़ान भरे….!

जिले के मुरलीगंज प्रखंड का एक गाँव है तमोठ परसा | उसी गाँव में शिक्षा एवं स्वास्थ्य से जुड़ा एक परिवार का मुखिया है- बद्री प्रसाद एवं मूलवती देवी | इसी दम्पति के ज्येष्ठ पुत्र पन्ना लाल पटेल, जो सम्प्रति सिंहेश्वर में टाउन लैब चलाते हैं, के बेटे हैं- प्रवीण कुमार |

ग्रामीण पृष्ठ भूमि से पढाई शुरू करने वाले प्रवीण सैनिक स्कूल रीवा(मध्य प्रदेश) से हायर सेकेंडरी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता है | वाटर मैनेजमेंट एंड एनवैरामेन्टल साइंस में पुर्तगाल वि.वि. से बी.टेक. करने के बाद रक्षा विभाग एवं इनकम टैक्स विभाग की नौकरियों को भी तिलांजलि दे देता है | फिर उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु पी.जी. में एडमिशन लेने का मन बनाने लगता है | इसी क्रम में यूरोपीय देश हंगरी के पंचवर्षीय पी.जी.कोर्स वाले एनवायरामेन्टल सायंस, एग्रीकल्चरल मैनेजमेंट एंड इंजीनियरिंग के लिए अपना स्थान सुरक्षित करा लेता है |

Praveen Kumar with his Parents at Patna Airport while leaving for Hungry .
Praveen Kumar with his Parents at Patna Airport while leaving for Hungary .

ज्ञातव्य हो कि सम्पूर्ण भारत के मेधावी छात्रों द्वारा विभिन्न विषयों में भिन्न-भिन्न यूरोपीय देशों के लिए 115 चयनित छात्रों की सूची में एक स्थान पाना आसान बात नहीं | तभी तो कहा जाता है कि प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती और कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती | प्रवीण अपनी राह तलाशने में प्रवीण निकला | उसे पढाई का सम्पूर्ण खर्च हंगरी सरकार देगी और प्रत्येक वर्ष भारत आकर एक बार अपनी माँ मनोरमा, चाचाश्री बुद्धा डेंटल कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर(वायो केमिस्ट्री) शैलेन्द्र कुमार, वायोकेम सुपौल के रविन्द्र कुमार तथा मधेपुरा हाली क्रास स्कूल के सचिव गजेन्द्र कुमार एवं चाचीश्री प्राचार्या वन्दना कुमारी सहित एन.आई.टी. पटना के नरेश कुमार आदि से मिलने हेतु आने-जाने का हवाई खर्च भारत सरकार के यू.जी.सी. द्वारा दी जायेगी |

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वोट को हथियार बनावें एवं वोट के वैल्यु को समझें

वोट के वैल्यु को गंभीरतापूर्वक चिन्तन करना और आपका वैल्युएबल वोट आपके क्षेत्र के जनप्रतिनिधि बनने के लिए खड़े हुए किस प्रत्याशी को मिले – इस पर गंभीर होकर सोचना सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय है | प्रत्येक मतदाता के वोट में वह शक्ति है जो देश और प्रदेश की दिशा और दशा को बदल सकती है |

आज जरुरत इस बात की है कि प्रत्येक वोटर अपने वोट के वैल्यु को महसूसें तथा हर प्रकार के चुनाव में अपने-अपने मताधिकार का प्रयोग करें और याद रखें –

चुनाव के दिन रखें यह ध्यान !
जलपान से पूर्व करें मतदान !!
सभी करें अपना मतदान !!!
सभी मतदाता चुनाव केन्द्र तक चलकर जाएँ | इतनी कम दूरी तक चलना ही आपके भविष्य के सुखमय संसार को लम्बी दूरी तक ले जाएगा वरना अगले पाँच वर्षों तक असुविधाओं एवं अभावों में ही जीना होगा, रहना होगा तथा हर पल जलना होगा |
वोट के वैल्यु के बाबत जब मधेपुरा अबतक ने डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी से प्रतिक्रिया लेना चाहा तो डॉ. मधेपुरी कुछ देर के लिए मौन हो गये | फिर विश्व के महान समाजवादी चिन्तक डॉ.लोहिया के हमसफर समाजवादी मनीषी भूपेन्द्र नारायण मंडल का नाम लेते हुए उन्होंने कहा कि बंगाल के नक्श्ली आन्दोलन के समय जब कुछ समाजवादियों ने उनसे यह पूछा था कि आप अपने लोगों को हिंसक क्रांति में भाग लेने के लिए क्यों नहीं कहते हैं– के जवाब में उन्होंने यही कहा था – हाँ ! आजकल प्राय: लोग हिंसक क्रांति की बातें करने आते हैं, परन्तु उन्हें पता नहीं कि हमारे लोग हिंसक क्रांति में भाग नहीं ले सकते | जो गरीब अपने वोट का निर्भीकतापूर्वक प्रयोग नहीं कर सकता, वह भला हथियार का प्रयोग कैसे करेगा ? उसका सबसे बड़ा हथियार तो उसका वोट है | उसका सही इस्तेमाल करना अगर वह सीख गया होता तो अधिकांश समस्याओं का अबतक निदान भी हो गया होता |

और हमारे समाज, देश और प्रदेश को अबतक भरपूर ओज एवं तेज़ मिल गया होता, पौरुष एवं पुरुषार्थ हासिल हो गया होता | आज देश की राजनीति का स्वरुप ही कुछ और होता | व्यक्तिगत जीवन जीने वाले लीडर की जगह सार्वजनिक जीवन जीनेवाले की पूछ बढ़ गई होती- जो अंतिम व्यक्ति को ध्यान में रखकर कानून बनाता …….! अभी भी समय है, वोट अवश्य डालें, वोट को हथियार बनावें तथा वोट के वैल्यु को अंतर्मन की गहराई से महसूसने की कोशिश करें |

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