चारा घोटाला मामले में सजा काट रहे आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को झारखंड हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। उनकी जमानत याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। गौरतलब है कि पिछले सप्ताह लगभग दो घंटे तक चली सुनवाई के दौरान लालू के वकील कपिल सिब्बल ने उनकी बीमारियों और उम्र का हवाला देते हुए जमानत की अपील की थी जिसका सीबीआई के वकील ने विरोध किया था।
लालू प्रसाद यादव की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि देवघर, चाईबासा एवं दुमका कोषागार से अवैध निकासी मामले में उन्हें इससे पहले भी जमानत दी जा चुकी है, इसलिए उन्हें फिर से जमानत की सुविधा प्रदान की जाए। कपिल सिब्बल ने लालू प्रसाद यादव की बीमारियों से संबंधित सर्टिफिकेट भी पेश किए और कोर्ट को बताया कि लालू प्लेटलेट्स की कमी, ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, हृदय, किडनी और डिप्रेशन समेत कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। लेकिन कोर्ट ने तमाम दलीलों को दरकिनार करते हुए आरजेडी सुप्रीमो की जमानत अर्जी खारिज कर दी।
गौरतलब है कि लालू प्रसाद यादव चारा घोटाला के देवघर ट्रेजरी केस में 23 दिसंबर 2017 को दोषी करार देने के बाद से जेल में हैं। इस दौरान उनकी तबीयत बिगड़ गई जिसके बाद उन्हें पहले रिम्स और फिर दिल्ली एम्स में भर्ती किया गया। कोर्ट ने उन्हें इलाज के लिए छह सप्ताह की जमानत दी थी। इसके बाद उन्हें 30 अगस्त को सरेंडर करने का निर्देश दिया गया था।
बहरहाल, लालू प्रसाद यादव को जमानत नहीं मिलने से आरजेडी खेमे में निराशा का माहौल है। उनके बाहर आने से न केवल पार्टी को मजबूती मिलती बल्कि महागठबंधन के प्रयासों को भी बल मिलता। उनकी अनुपस्थिति में तेजस्वी पार्टी की नैया कैसे पार लगाते हैं, यह देखने की बात होगी।
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पासवान को हवाई अड्डे पर नहीं मिला वीआईपी प्रोटोकॉल !
हवाई अड्डे पर वीआईपी प्रोटोकॉल खत्म होने को लेकर आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और फिल्म अभिनेता व सांसद शत्रुघ्न सिन्हा की चर्चा अभी थमी भी न थी कि अब लोजपा प्रमुख और केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान को मिलने वाली वीआईपी प्रोटोकॉल की सुविधा समाप्त कर दिए जाने की खबर सामने आई है। दरअसल पासवान सोमवार को पूर्व केन्द्रीय मंत्री कैप्टन जयनारायण निषाद के श्राद्ध कार्यक्रम में शामिल होने आए थे और उसी दिन शाम की फ्लाइट से दिल्ली के लिए रवाना हुए थे। दिल्ली के लिए रवाना होने के दौरान उन्हें आम यात्री वाले गेट से हवाई अड्डे के भीतर दाखिल होते देखा गया।
गौरतलब है कि वीआईपी प्रोटोकॉल की सुविधा जिन वीआईपी लोगों को प्राप्त होती है, उनके हवाई अड्डे से निकलने का रास्ता आम यात्रियों से अलग होता है और उनके लिए वीआईपी लॉन्ज होता है जहां वे ठहरते हैं और विश्राम करते हैं। उन जगहों पर आम यात्री नहीं जा सकते हैं।
इस बाबत पूछे जाने पर पटना के जयप्रकाश नारायण हवाई अड्डे के निदेशक का कहना है कि वीआईपी प्रोटोकॉल की सुविधा उपलब्ध कराने और उसे समाप्त करने में पटना हवाई अड्डे की कोई भूमिका नहीं है। इस सबंध में ब्यूरो ऑफ सिविल एवियेशन सिक्यूरिटी सुझाव भेजता है। उन्होंने कहा कि पासवान के वीआईपी प्रोटोकॉल के नवीकरण को लेकर हमें कोई नया आदेश नहीं मिला है। उधर लोजपा प्रमुख का कहना है कि वीआईपी प्रोटोकॉल समाप्त नहीं हुआ है और ये जल्द ही बहाल हो जाएगा।
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200 वर्ष पूर्व बनी पटना की पेंटिंग लंदन संग्रहालय की जान
विश्व का सबसे बड़ा म्यूजियम (संग्रहालय) लंदन में है जिसका नाम है- ‘द विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम’। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान पटना के कई कलाकारों की पेंटिंग्स भी लगाई गई है उस म्यूजियम में।
बता दें कि पटना में मुहर्रम के दृश्य पर पटना के ही हिन्दू चित्रकार सेवक राम द्वारा बनाई गई पेंटिंग आज भी उस लंदन संग्रहालय की जान है। दो सौ ग्यारह साल पहले बनी मुहर्रम पर निकाले गये ताजिया जुलूस की पेंटिंग इतनी खूबसूरत है कि वह आज लंदन स्थित विश्व के सबसे बड़े डेकोरेटिव आर्ट्स एंड डिजाइन संग्रहालय ‘द विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम’ की जान बनी हुई है। मौके पर संसार के समस्त मुस्लिम देशों में बिहार की राजधानी पटना के उस हिन्दू कलाकार सेवकराम के मुहर्रम पर बनी पेंटिंग की जमकर चर्चाएं होती रहती हैं।
यह भी जानिए कि पटना में पटना सिटी स्थित दीवान मुहल्ला, लोदी कटरा और मच्छरहट्टा मुहल्ले में इस विद्या के माहिर कलाकार 18वीं शताब्दी के आरंभिक काल में हुआ करते थे। इसका विस्तार पटना, दानापुर व आरा तक था। शिवा लाल शिवा लाल की पेंटिंग्स भी ताजिए को लेकर चर्चित रही है।
आज के दिनों में जिस तरह ताजिये बनते हैं वही अंदाज 1807 में भी था। तब के इस पेंटिंग में बच्चों की मौजूदगी एवं सफेद कपड़े पहने बड़े लोगों की संख्या भी सर्वाधिक देखी जाती रही है।
चलते-चलते यह भी बता दें कि 17वीं शताब्दी में स्थापित लंदन स्थित विक्टोरिया म्यूजियम में तीस लाख से भी अधिक प्रदर्श हैं जो मुख्य रूप से डेकोरेटिव आर्ट्स व डिजाइन से संबंधित हैं। पहले ताजिये के जुलूस में हिन्दुओं की सहभागिता सर्वाधिक हुआ करती जिसमें कमी होती दिखने लगी है। तब के दिनों में राजा की सहभागिता भी हाथी पर चढ़कर ताजिए के पहलाम वाले जुलूस में देखी जाती थी….।
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संसार में सबसे अधिक महिला पायलट भारत में
इधर भारत की महिलाओं में जोश व जुनून इस कदर बढ़ता जा रहा है कि शिक्षा जगत से लेकर आकाश तक उसने अपना आधिपत्य जमा रखा है। स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक सर्वाधिक गोल्ड मेडल महिलाओं के गले में शोभने लगी है।
यह भी बता दें कि बाहरहाल संसार में सबसे अधिक महिला पायलट भारत में है। आप जानकर हैरत में पड़ जाएंगे कि यहां हर आठवीं फ्लाइट की कमान महिला के हाथ में ही होती है। देश के 10,000 पायलटों में 1200 महिलाएं विमान उड़ाने से फ्लाइट सुपरवाइज करने तक हर स्तर पर काम कर रही है।
एक समय था जब भारत में महिला को जहाज उड़ाते देखने के लिए महिला दिवस का इंतजार करना पड़ता था। विगत कुछ ही वर्षों में स्थिति में तेजी से परिवर्तन हुआ है। तभी तो आज भारत में 1200 महिला कमर्शियल पायलट कार्यरत है जो विश्व में सर्वाधिक है।
मुंबई एवं दिल्ली जैसे बड़े-बड़े एयरपोर्ट की बात तो छोड़िये….. पटना जैसे छोटे एयरपोर्ट पर भी हर दिन आती-जाती हवाई जहाज उड़ाती महिला पायलट दिख ही जाती है। कई बार तो पूरी की पूरी फ्लाइट क्रू में महिलायें ही होती हैं।
यह भी जानिए कि इंडिगो एयरलाइंस की कैप्टन स्वाति साहनी महीने में चार-पांच बार महिला फ्लाइंग क्रू के साथ हवाई जहाज उड़ाती है और कहती है कि बिना पुरुष सहयोगी के हम ऐसा काम कर रहे हैं…. अच्छा लगता है। वह यह भी बताती है कि देश की सबसे बड़ी विमान कम्पनी “इंडिगो एयरलाइन” में 2013 में जहाँ 69 महिला पायलट थी वह 5 वर्षों में बढ़कर 300 के पार हो गई है।
इस अवधि में स्पाइसजेट, गो एयरवेज और जेट एयरवेज में महिला पायलटों की संख्या में प्रत्येक वर्ष 25 से 35 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है। बावजूद इसके फ्लाइट ऑपरेशन के उच्च पदों पर भी तैनात हो रही हैं महिलाएं।
चलते-चलते यह भी जान लीजिए कि बिहार के मधुबनी जिले के छोटे से गांव उमरी की बेटी अद्विका का वायुसेना में पायलट के पद पर चयन हुआ है। वह बिहार की दूसरी महिला पायलट होगी….. फिलहाल हैदराबाद के डूंडीगल में ट्रेनिंग ले रही है….. फिर उड़ायेगी लड़ाकू विमान……।
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साल 2018 में बेरोजगार हुए 1.10 करोड़ भारतीय !
भारत की 65 प्रतिशत आबादी युवाओं की है। कहने की जरूरत नहीं कि देश का भविष्य तय करने में इस आबादी की सबसे अहम भूमिका है। ऐसे में सोच कर देखिए कि अगर यही आबादी बेरोजगारी से बेहाल हो तो हमारी दशा और दिशा क्या होगी? विडंबना तो यह है कि इधर हाल के वर्षों में जबकि अधिक से अधिक युवाओं को रोजगार मिलने की उम्मीद थी, साल 2018 में करीब 1.10 करोड़ भारतीयों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा, जिनमें से अधिकांश की उम्र 40 साल से नीचे थी।
जी हाँ, रोजगार के मामले में युवाओं के लिए पिछला साल खासा बुरा रहा। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इकोनॉमी (CMIE) की रिपोर्ट के अनुसार कमजोर समूहों से संबंधित व्यक्तियों को 2018 में नौकरी के नुकसान से सबसे ज्यादा प्रभावित होना पड़ा। इस रिपोर्ट की मानें तो देश में बेरोजगारों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। बकौल CMIE दिसंबर 2017 में जहां नौकरी कर रहे लोगों की संख्या 4.79 करोड़ थी वो दिंसबर 2018 में घटकर 3.97 करोड़ रह गई।
उपर्युक्त रिपोर्ट से पता चलता है कि शहरी और ग्रामीण दोनों तरह के तबके को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है पर ग्रामीण क्षेत्र और खासकर कृषि से जुड़े लोगों की स्थिति अधिक बुरी रही। रिपोर्ट की मानें तो ग्रामीण भारत में 91 लाख लोगों की नौकरी गई जबकि शहरी भारत में 18 लाख लोगों की नौकरी चली गई। इस रिपोर्ट की एक बेहद चौंकाने वाली बात यह भी रही कि नौकरी से हाथ धोने वाले 1.10 करोड़ लोगों में महिलाओं की संख्या 88 लाख रही और पुरुषों की 22 लाख।
इस रिपोर्ट के हवाले से चलते-चलते यह भी बता दें कि भारत में साल 2018 में बेरोजगारी की दर 7.4 प्रतिशत थी। अगर भयावह तरीके से बढ़ रही इस बेरोजगारी पर समय रहते काबू ना पाया गया तो महाशक्ति बनने का भारत का सपना पूरा होना नामुमकिन होगा।
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क्या लालू को जमानत मिलेगी?
बहुचर्चित चारा घोटाले में दोषी पाए गए आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की जमानत याचिका पर झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई है। शुक्रवार को कोर्ट ने इस मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। अब लालू को जमानत के लिए लगभग एक सप्ताह का इंतजार करना पड़ेगा।
गौरतलब है कि लालू प्रसाद यादव का स्वास्थ्य इन दिनों ठीक नहीं है। किडनी, हृदय-रोग और डायबिटिज समेत 11 बीमारियों के चलते वे रांची स्थित रिम्स (राजेन्द्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) में भर्ती हैं। बेहतर इलाज के लिए उन्होंने देवघर, दुमका और चाईबासा मामले में जमानत के लिए अर्जी दी थी। कोर्ट में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने उनकी तरफ से पक्ष रखा। लगभग डेढ़ घंटा चली बहस के दौरान सिब्बल ने लालू की जमानत की अवधि और आयु का जिक्र किया। इसके बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया।
बता दें कि इससे पहले 21 दिसंबर 2018 को सीबीआई के आग्रह पर लालू की जमानत याचिका पर सुनवाई टल गई थी। कोर्ट ने तब सुनवाई के लिए 4 जनवरी की तारीख तय की थी, पर सीबीआई ने जमानत पर विरोध जताया था। इधर लालू परिवार समेत पूरा आरजेडी खेमा आशान्वित है कि लालू जल्द ही जमानत पर बाहर आ जाएंगे।
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शादी में समाजवाद की एक अनूठी परम्परा
भारत विविधताओं का देश है। विविध जातियों एवं भिन्न-भिन्न धर्मों के लोग…… अद्भुत परंपराएं….. न जाने कितने प्रकार की विचित्रताओं से भरा है यह भारत देश हमारा।
बता दें कि भारत का एक राज्य है छत्तीसगढ़- जहाँ के सुदूर वनांचल जशपुर जिले में बसी उरांव जनजाति में विवाह की एक अनूठी परंपरा है। यूँ तो संपूर्ण संसार में शादी और श्राद्ध के सैकड़ों तरीके हैं जिनमें एक अद्भुत तरीके वाली शादी यह भी है-
छत्तीसगढ़ के उरांव जनजाति में विवाह के समय दूल्हा और दुल्हन दोनों एक-दूसरे की मांग में सिंदूर भरते हैं जिसमें दंपति को वैवाहिक रिश्तों में बराबरी का एहसास होता है…… जिसे लोग शादी में समाजवाद की संज्ञा देने लगे हैं।
यह भी बता दें कि शादी का रस्म इस तरह पूरा किया जाता है- शादी के दौरान घर के आसपास स्थित बगीचे में दूल्हा आमंत्रण का इंतजार करता है और जब दुल्हन के रिश्तेदार दूल्हे को कंधे पर बैठाकर मंडप में लाते हैं तो यह रश्म पूरी की जाती है जिसमें दुल्हन के भाई की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। वह बहन की अंगुली पकड़ता है और दुल्हन उसके सहारे दूल्हे को बिना देखे यानी पीछे की ओर हाथ करके सिंदूर भरती है। यदि दुल्हन का कोई भाई नहीं तो यह रस्म बहन पूरा करती है।
यह भी जानिए कि दूल्हा-दुल्हन दोनों तीन-तीन बार एक-दूसरे की मांग पर सिंदूर भरते हैं। ऐसा करते समय पंच के रूप में गांव के पांच वरिष्ठ सदस्य चादर से एक घेरा बनाते हैं। जिसमें बतौर गवाह कुछ खास रिश्तेदार बार-बार आवाज देते हैं कि एक बार और अच्छे से एक दूसरे को देख लो….. फिर सिंदूर भरना।
चलते-चलते यह भी बता दें कि हाल ही में उच्च शिक्षा प्राप्त कर विवाह बंधन में बंधे मोना प्रधान और विनय निकुंज ने बताया कि यह परंपरा उनके लिए महत्वपूर्ण है और बराबरी का रिश्ता होने का एहसास भी उन्हें होता है। इसमें अतिमहत्वपूर्ण बात यह भी है कि दूल्हा और दुल्हन दोनों साथ में सिंदूर खरीदने जाते हैं।
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मधेपुरा सीट के लिए शरद ढूंढ़ रहे पप्पू का हल
लोकतांत्रिक जनता दल बनाकर नए सिरे से अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे शरद यादव परेशान हैं इन दिनों। उनकी परेशानी की वजह है मधेपुरा लोकसभा सीट जहां से वे चुनाव लड़ना चाहते हैं। दरअसल यहां एक म्यान में दो तलवार की स्थिति आन पड़ी है उनके सामने और ये दूसरी तलवार हैं मधेपुरा के वर्तमान सांसद पप्पू यादव। महागठबंधन का उम्मीदवार बनकर शरद एनडीए से लोहा लें उससे पहले उन्हें पप्पू का हल ढूँढ़ना पड़ रहा है। प्रश्न उठता है कि पप्पू उनके लिए सीट छोड़ें क्यों? वे तो स्वयं इस जुगत में हैं कि किसी तरह महागठबंधन में उनकी इंट्री हो जाए। राजनीति के माहिर खिलाड़ी शरद जानते हैं कि अगर वे एनडीए के विरुद्ध महागठबंधन के उम्मीदवार बन जाएं और पप्पू भी वहां से खड़े हो जाएं तो मुकाबला त्रिकोणीय होगा और ऐसे में एनडीए को रोकना असंभव-सा होगा क्योंकि पप्पू यादव का भी वोट बैंक कमोबेश वही है जो आरजेडी या महागठबंधन का है।
इन सारी परिस्थितियों के बीच शरद यादव इस कोशिश में हैं कि लालू प्रसाद यादव की रजामंदी से पप्पू यादव को मधेपुरा से हटाकर सुपौल या झंझारपुर से चुनाव लड़वाया जाय। बता दें कि सुपौल से पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन कांग्रेस की मौजूदा सांसद हैं। लिहाजा, इस बात की संभावना नगण्य है कि पप्पू सुपौल से लड़ें। ऐसे में झंझारपुर उनका नया ठिकाना हो सकता है। ये सभी संसदीय क्षेत्र यादव बहुल हैं और दोनों यादव नेता इसका लाभ लेना चाहते हैं। हालांकि आरजेडी सुप्रीमो ने अभी तक कुछ स्पष्ट नहीं किया है।
गौरतलब है कि पप्पू यादव पूर्णिया से तीन बार सांसद रह चुके हैं और उनके लिए पूर्णिया एक बेहतर विकल्प हो सकता था लेकिन सूत्रों के मुताबिक पप्पू स्वयं वहां से चुनाव लड़ना नहीं चाहते। इसके पीछे उनकी कुछ राजनीतिक मजबूरियां बताई जा रही हैं। चलते-चलते यह भी बता दें कि साल भर पहले लालू परिवार के खिलाफ आग उगलने वाले पप्पू इन दिनों लालू के गुण गाने में लगे हैं। इसे आरजेडी खेमे से उनकी बढ़ती नजदीकी के रूप में देखा जा रहा है और यह बात भी शरद को परेशान कर रही है।
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अब बेटियों के नाम ही लगने लगे हैं सभी घरों पर नेम प्लेटें
मध्य प्रदेश का एक जिला है – बैतूल। इस जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर है एक गांव – खंडारा। वह खंडारा गांव बापू के सपनों को साकार करने में लगा है जहाँ हर घर पर न केवल नाम पट्टिकायें लगी हैं बल्कि इन पट्टिकाओं यानी नेम प्लेटों पर घर की बेटियों का नाम आज की तारीख में शोभायमान हो रहा है।
बता दें कि खंडारा गांव से शुरू हुई यह मुहिम अब जिले के हर गांव और शहर में फैल चुकी है। बड़ी संख्या में वहां के लोग अपने-अपने घरों के ऊपर नेम प्लेटों पर अपनी बेटियों का नाम लिखा रहे हैं। यह भी जानिए कि खंडारा गांव निवासी अनिल यादव ने सर्वप्रथम इस मुहिम की शुरुआत की थी।
यह भी बता दें कि स्वयंसेवी अनिल यादव ने “डिजिटल इंडिया विद लाडो” अभियान के तहत लोगों को बेटियों के नाम नेमप्लेट लगाने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू किया था। अनिल ने मधेपुरा अबतक से बताया कि कुछ लोगों को वे बेटियों के नाम वाले नेम प्लेटें अपनी ओर से बनवाकर भी दिये थे। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि वर्तमान में खंडारा गांव के 200 घरों में से 155 घरों में बेटियां हैं। इन सभी घरों की पहचान अब बेटियों के नाम की पट्टिकाए लगाई जा चुकी हैं। इन घरों की पहचान अब बेटियों के नाम से होती है। अन्य गांव व शहरों की तरह घर के मुखिया के नाम से नेम प्लेट नहीं होती है।
अनिल यादव का यह प्रयास न केवल समाज में एक सकारात्मक बदलाव लाया है बल्कि खंडारा गांव की तो पहचान ही अब बेटियों के नाम से हो गई है। जिला मुख्यालय बैतूल शहर के अखिलेश ठाकुर ने भी जहां एक ओर अपने मकान पर अब अपने नामवाले यानी नेमप्लेट को हटाकर बेटियाँ द्वय लहक व लक्ष्मी के नाम से पट्टीका लगा रखी है वहीं दूसरी और राजेश चौकीकर भी अपने नाम वाले नेमप्लेट चंद रोज कबल हटाकर अपनी बेटियाँ वैष्णवी व समीक्षा के नाम कर दी है।
चलते-चलते यह भी बता दें कि इस अभियान से प्रभावित होकर स्थानीय विधायक ने एक महती जनसभा को संबोधित करते हुए एक सरकारी भवन का नाम भी वहाँ की प्रतिभाशाली बेटी के नाम पर रखने की घोषणा कर दी है।
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अंतर्राष्ट्रीय साइंस सिटी पटना के सैदपुर में दिखेंगे आर्यभट्ट से लेकर कलाम तक के विजन
तीन विदेशी एजेंसियों द्वारा बिहार की राजधानी पटना के सैदपुर में बनाई जा रही है- अंतर्राष्ट्रीय साइंस सिटी। ई.मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस साइंस सेंटर में आर्यभट्ट से लेकर कलाम तक के ‘विजन’ दिखेंगे।
यह भी बता दें कि अलग-अलग थीम पर बनाई जा रही पांच दीर्घाएं वर्ष 2020 तक बनकर तैयार हो जाएंगी। इस साइंस सिटी सैदपुर में बिहार में ही जन्मे महान गणितज्ञ आर्यभट्ट से लेकर गांधीयन मिसाइल मैन व भारतरत्न डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम के विजन को प्रदर्शित करने हेतु विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा लगभग 400 करोड़ रुपए की लागत से इस प्रोजेक्ट को पूरा करने का संशोधित लक्ष्य रखा गया है। डॉ.कलाम के करीबी रह चुके फिजिक्स के यूनिवर्सिटी प्रोफेसर डॉ.भूपेन्द्र नारायण मधेपुरी ने कहा कि इस प्रोजेक्ट के पूरा होने से बिहार को अंतरराष्ट्रीय विज्ञान जगत में अच्छी-खासी ऊंचाई प्राप्त होगी।
यह भी जानिए कि 20 एकड़ से भी अधिक भूमि पर तैयार किए जा रहे इस प्रोजेक्ट को नीतीश सरकार ने डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम का नाम दिया है। इस डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम अंतर्राष्ट्रीय साइंस सिटी में पांच महत्वपूर्ण थीम होंगे- (1) बेसिक साइंस जिसमें रोचक तरीके से साइंस को समझाने की कोशिश होगी। (2) दूसरा थीम ‘बॉडी एंड माइंड’ पर आधारित होगा जिसमें नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ.ए.कैराॅल की पुस्तक “Man The Unknown” की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की जाएगी……। (3) तीसरा थीम होगा- ‘स्पेस एण्ड स्ट्रोनोमी’ जिसमें ग्रहों एवं उपग्रहों के साथ-साथ सेटेलाइट व मिसाइल आदि की विस्तृत जानकारी दी जाएगी (4) चौथा थीम होगा ‘एक्सपेरिमेंटल लर्निंग’ जिन्हें सीख-सीख कर युवाओं के अंदर क्रिएटिविटी पैदा होगी…. और (5) पाँचवाँ थीम होगा “बी ए साइंटिस्ट”
चलते-चलते यह भी बता दें कि साइंस सिटी में लगाए जाने वाले एक्जीबिट्स यानी प्रदर्शन हेतु चयनकर्ताओं की कमेटी के विशेषज्ञ हैं- इसरो के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक पद्मश्री मानस बिहारी वर्मा, एनसीएसएम के DG एएस मानेकर एवं रिटायर्ड डीजी आइ.के.मुखर्जी, टीआईएफआर के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ.विजय ए सिंह, कोलकाता विश्वविद्यालय के प्रो.तुषारकांत घोष, कोलकाता साइंस सिटी के डायरेक्टर एडी चौधरी, आईआई टी कानपुर के पर्यावरणविद प्रोफेसर डॉ.विनोद तारे आदि।
यह भी याद कर ले की साइंस सिटी के प्रोजेक्ट मैनेजमेंट का काम 3 विदेशी कंपनियां संभाल रखी हैं- (1) सिंगापुर की फ्लाइंग एलीफेंट (2) कनाडा की जीएसएम कंपनी और (3) यूके की कंपनी ब्लीड्स। और हाँ ! विशेषज्ञ समिति द्वारा किए जा रहे प्रयास इस मायने में सर्वाधिक सराहनीय है कि भारतीय इतिहास में हुए तमाम बड़े वैज्ञानिकों की तकनीक एवं खोजों को इस अंतरराष्ट्रीय साइंस सिटी में जगह दी जाये।

























