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किस तरह बीत रहे हैं – मतदान और मतगणना के बीच के साठ घंटे…….!!

विधान सभा चुनाव 2015 के प्रचार के 15 दिन देखते ही देखते बीत गये और ऐसा लगा जैसे पलक झपकते आ गया मतदान का दिन, 5 नवम्बर | अब मतदान और मतगणना (8 नवम्बर) के बीच के लगभग 60 घंटे का समय तो 15 दिनों से भी अधिक लम्बा लगने लगा है | सभी जानते हैं कि सुख के दिन तो चुटकी बजाते ही बीत जाते हैं लेकिन संकट की रात तो पहाड़ जैसा लगता है | काटे नहीं कटता है | ना जल्दी सवेरा होता है और ना तेजी से अँधेरा भागता है |

नामांकन का दिन ! सबके लिए खुशियों का दिन होता है | सभी प्रत्याशी और उनके साथी साफ़-सफ़ेद कलपदार कुरते-पैजामे में | लम्बी-लम्बी कतारों में अपने सहयोगियों के साथ | गले में लाल-पीले विजय का माला डाले | आगे-पीछे गाड़ियों की कतार …….!

परन्तु मतदान के बाद चेहरे पर हवा-हवाई | बढ़ी हुई दाढ़ी | मोचड़ा हुआ कुरता-पायजामा | कुछ तो अकेले, कुछ दो-चार समर्थकों से घिरे हुए | केवल वे जिन्हें टी.वी. चैनलों के अधिकांश एग्जिट पोलों में जीतने की उम्मीद जताई जाती है वही केवल फ्रेश नजर आते हैं | जिनके लिए एक या दो एग्जिट पोलों में ही बढ़त की बात कही जाती है वो कुलदेवी या कुलदेवताओं को मन ही मन चढ़ावा चढाने की शपथ खाते हैं | हर राउंड में ना सही दो-चार राउंड में भी आगे होने के लिए भगवान् से मनाते हैं |

एक ओर तो कुछ बड़े नाम वाले नेता जीत-हार के बाबत बड़ी-बड़ी बातें कह जाते हैं | सुनिये, वे अपने समर्थकों से क्या कहते हैं- बेफिक्र होकर 8 नवम्बर तक करें इंतजार- जीतेगा बिहार ! आएगा बहार !!…. बनेगी अपनी सरकार !!!

वहीं दूसरी ओर दीपावली को लेकर सजने लगा है बाजार ! जो जीतेंगे, होंगे उनके घर धनतेरस का उपहार ! हो चुनाव या दीवाली का त्योहार- आधी आबादी अब पुरुषों को देगी पछाड़ ! इ.वी.एम. मशीन की सुरक्षा के लिए चौकन्ना है चारो तरफ पहरेदार ! बज्रगृह केंद्र पर खड़े हैं विधानसभा वार ! पूरा सील किया गया है प्रवेश द्वार !

और अंत में जिले के चारों विधानसभाओं के कुल 60 प्रत्याशियों की किस्मत हो गयी है इ.वी.एम. में कैद और सील हो गया है वज्रगृह सहित सभी द्वार | नवम्बर 8 के 12 बजे बाद ही सभी जान पायेंगे कि कौन हुए उनके जनप्रतिनिधि और कौन होंगे भाग्यवान वे चार ……|

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बिहार में ‘कमल’ की बहार हो… पर नीतीशे कुमार हो..!

हेडलाईन पढ़कर जरूर चौंके होंगे आप। ये हेडलाईन जेडीयू के चुनाव-गीत “बिहार में बहार हो, फिर से नीतीशे कुमार हो” में ‘थोड़े’ पर ‘बहुत बड़े’ परिवर्तन के बाद बनी है। अगर कहा जाय कि रिकॉर्ड 60 प्रतिशत मतदान के साथ सम्पन्न हुए बिहार चुनाव के पाँचवें और अन्तिम चरण के उपरान्त तमाम न्यूज़ चैनलों पर दिखाए गए एग्जिट पोल का यही ‘वास्तविक’ निचोड़ है, तो गलत ना होगा। 2010 की तरह जेडीयू और भाजपा ने इस बार भी साथ चुनाव लड़ा होता तो 8 नवंबर को निकलकर आनेवाली तस्वीर बहुत कुछ वैसी ही दिखती जैसी हेडलाईन के साथ दी गई तस्वीर दिख रही है। जी हाँ, यही वो तस्वीर है जो बिहार की जनता देखना चाहती थी। केन्द्र में नरेन्द्र मोदी और बिहार में नीतीश कुमार। दोनों साथ-साथ। वहाँ भी और यहाँ भी।

बिहार की जनता का ‘द्वंद्व’ एग्जिट पोल से जैसे झाँक रहा है। हालाँकि सारे एग्जिट पोल का औसत निकाल कर देखें तो पलड़ा महागठबंधन का भारी है लेकिन अन्तिम समय में कौन बाजी मार ले जाएगा, कहना मुश्किल है। भोली-भाली जनता अब ‘चतुर’ हो गई है। उसने पूरी ‘पिक्चर’ को कुछ इस तरह निर्देशित किया है कि ‘सस्पेंस’ आखिरी दृश्य में ही खुलेगा। और वो ‘सस्पेंस’ उसके… केवल उसके मन का होगा… सारे नेता चाहे जो शोर मचाते रहें। बहरहाल, चलिए देखें कि एग्जिट पोल कह क्या रहे हैं।

एबीपी न्यूज़/नीलसन के अनुसार महागठबंधन को 130, एनडीएको 108 और अन्य को 5 सीटें मिल रही हैं। यानि स्पष्ट तौर पर महागठबंधन की सरकार बन रही है। एक और प्रमुख चैनल इंडिया टीवी/सी-वोटर्स ने महागठबंधन को 112-131, एनडीए को 101-121 और अन्य को 6-14 सीटें दी हैं। यानि सरकार महागठबंधन की बन रही है। न्यूज़ नेशन का आकलन भी कुछ ऐसा ही है। उसने अपने एग्जिट पोल में महागठबंधन को 125, एनडीए को 114 और अन्य को 4 सीटें दी हैं। न्यूज़ एक्स/सीएनएक्स ने महागठबंधन की जीत और बड़े फासले से होने की बात कही है। इस एग्जिट पोल में महागठबंधन को 130 से 140 सीटें मिल रही हैं, जबकि एनडीए के खाते में 90 से 100 सीटें ही जा रही हैं। अन्य को 7 सीटें मिल सकती हैं। टाइम्स नाउ/सी-वोटर के मुताबिक भी नीतीश की अगुआई वाला महागठबंधन आगे है। इस एग्जिट पोल में महागठबंधन को 112 से 132 सीटें मिलने का अनुमान है, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को 101 से 121 सीटें मिल सकती हैं और अन्य के खाते में 6 से 14 सीटें जाने की बात कही गई है।

एबीपी न्यूज़, इंडिया टीवी, न्यूज़ नेशन, न्यूज़ एक्स और टाइम्स नाउ – इन पाँच चैनलों के मुताबिक महागठबंधन की सरकार बन रही है। इसके बरक्स एक और तस्वीर है जो न्यूज़ 24/टूडेज चाणक्या के एग्जिट पोल से निकल कर आई है। इस एग्जिट पोल के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इसमें एनडीए को 155, महागठबंधन को 83 और अन्य को 5 सीटें दी गई हैं। यानि पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा के नेतृत्व में सरकार। बता दें कि दिल्ली चुनाव में ‘आप’ को दो तिहाई बहुमत की भविष्यवाणी भी न्यूज़ 24/चाणक्या ने ही की थी और वो सच साबित हुई थी।

अब एक नज़र आज तक पर दिखाए गए इंडिया टुडे/सिसरो के एग्जिट पोल पर डालें। इसमें एनडीए को 113 से 127, महागठबंधन को 111 से 123 और अन्य को 4-8 सीटें दी गई हैं। वोटों के प्रतिशत की बात करें तो इस एग्जिट पोल में एनडीए को 41, महागठबंधन को 40 और अन्य को 19 प्रतिशत वोट मिल रहे हैं। कहने का मतलब ये कि कड़े मुकाबले में एनडीए थोड़ा आगे है।

इस तरह इन सात चैनलों के एग्जिट पोल में पाँच के अनुसार महागठबंधन की सरकार बन रही है और दो के अनुसार भाजपा की अगुआई में नई सरकार बनने जा रही है। इन सभी एग्जिट पोल का औसत निकालें तो महागठबंधन को 119, एनडीए को 117 और अन्य को 7 सीटें मिलती हैं। यानि मुकाबला सचमुच काँटे का है। ये भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि कई सीटों पर वोटों का अन्तर बहुत कम होने की सम्भावना है। इस कारण भी ‘सस्पेंस’ अंत तक बना रहेगा।

8 नवंबर को चाहे जो हो, कम-से-कम एग्जिट पोल में तो महागठबंधन ने एनडीए को पटखनी दे ही दी है। अभी जितने सर्वे में महागठबंधन को आगे बताया गया है, सितम्बर-अक्टूबर के लगभग उतने ही प्री-पोल सर्वे में एनडीए की बढ़त थी।

चलिए, हमने सारे एग्जिट पोल को जान लिया। सीटों का जोड़-घटाव, गुणा-भाग कर लिया। लेकिन क्या इन सारे एग्जिट पोल में केवल सीटों का आंकड़ा ही देखा जाना चाहिए..? क्या इन सारे एग्जिट पोल से बिहार की जनता का ‘द्वंद्व’ नहीं झाँक रहा है..? क्या ये नहीं लग रहा कि बिहार भले ही नरेन्द्र मोदी में ‘सम्भावना’ देख रहा है लेकिन नीतीश कुमार में उसकी ‘आस्था’ अभी भी है। क्या ऊपर दी गई तस्वीर ही वो सच्चाई नहीं है जिसे दरअसल बिहार की जनता देखना चाहती थी..? अगर 2010 की तरह जेडीयू और भाजपा ने चुनाव साथ लड़ा होता तो शायद किसी एग्जिट पोल की जरूरत ही ना पड़ती। परिणाम सबको पता होता। खैर छोड़िए… चलिए 8 नवंबर का इंतजार करते हैं और देखते हैं कि होता क्या है..? समय बड़ा बलवान होता है, वो कब क्या कराएगा, कौन जानता है..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पाँचवें चरण में ‘माय’ की माया… किसके हिस्से में धूप, किसे मिलेगी छाया..?

बिहार चुनाव का आज पाँचवां और अंतिम चरण है। मतदान केन्द्रों पर लम्बी कतारें लगी हैं। शाम के 5 बजते ही न्यूज चैनलों पर एक्जिट पोल, विश्लेषण और मंथन का दौर शुरू हो जाएगा। नेता हों, कार्यकर्ता हों या आम जनता – सबकी निगाहें 8 नवंबर पर टिक जाएंगी। राजनीति के गलियारों में सम्भावनाओं और समीकरणों को लेकर गहमागहमी शुरू हो जाएगी। नई सरकार किसकी होगी, उस सरकार में कौन-कौन से चेहरे होंगे, किसका कद बुलंदियों पर होगा और कौन अपनी खोई साख को रोएगा – अब बातें इसी पर होंगी। फिलहाल एक नज़र पाँचवें चरण की खास बातों पर डालें।

पाँचवें चरण में नौ जिलों की 57 सीटों पर मतदान हो रहा है। सीमांचल और मिथिलांचल के ये नौ जिले हैं – मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा ( Madhepura ) , सहरसा और दरभंगा। 57 सीटों के लिए 58 महिलाओं सहित कुल 827 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनके भाग्य का फैसला एक करोड़ 55 लाख 36 हजार 660 मतदाता करेंगे। मतदान केन्द्रों की कुल संख्या 14061 है जिनमें 5518 ‘क्रिटिकल’ और 276 नक्सल प्रभावित केन्द्र हैं।

इस चरण में बिहार कैबिनेट के कई मंत्रियों की साख दांव पर लगी है। बिजेन्द्र प्रसाद यादव (सुपौल), नरेन्द्र नारायण यादव (आलमनगर), लेसी सिंह (धमदाहा), बीमा भारती (रूपौली), नौशाद आलम (ठाकुरगंज) और दुलालचंद गोस्वामी (बलरामपुर) की किस्मत आज ईवीएम में बंद हो जाएगी। इस चरण के अन्य दिग्गज उम्मीदवारों में बिहार विधान सभा में विपक्ष के नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी (अलीनगर), पूर्व मंत्री एवं जगन्नाथ मिश्र के बेटे नीतीश मिश्रा (झंझारपुर), एआईसीसी के सचिव शकील अहमद खान (कदवा), बिहार भाजपा के मुख्य प्रवक्ता विनोद नारायण झा (बेनीपट्टी), पूर्व सांसद एवं जदयू के उम्मीदवार दिनेश चन्द्र यादव (सिमरी बख्तियारपुर), पूर्व मंत्री एवं इस बार भाजपा के उम्मीदवार रवीन्द्र चरण यादव (बिहारीगंज), लालू यादव के बेहद खास भोला यादव (बहादुरपुर) एवं एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान (कोचाधामन) प्रमुख हैं।

2010 में इस चरण की 57 सीटों में 24 जेडीयू, 20 भाजपा, 8 राजद और 5 कांग्रेस के खाते में गई थीं। बदले समीकरणों के तहत इस बार एनडीए की ओर से भाजपा के 38, लोजपा के 11, रोलोसपा के 5 और ‘हम’ के 3 उम्मीदवार मैदान में हैं। महागठबंधन की ओर से जेडीयू के 25, राजद के 21 और कांग्रेस के 11 उम्मीदवार खड़े हैं। इन दोनों गठबंधनों के अतिरिक्त पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी के 40 और ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के 6 उम्मीदवार भी मैदान में हैं।

बिहार में बहुचर्चित ‘माय’ समीकरण के लिहाज से पाँचवां चरण खासा महत्वपूर्ण है। इस ‘माय’ समीकरण को लालू ने और लालू को ‘माय’ समीकरण ने एक अलग पहचान दी और इस बार इस समीकरण के चलने की जरूरत लालू (और उनके महागठबंधन के लिए) हर बार से ज्यादा है । अगर पप्पू और ओवेसी कई सीटों पर मुकाबले को तिकोना ना बना रहे होते तो लालू-नीतीश के महागठबंधन के लिए यह सबसे ‘सुरक्षित’ चरण था। उदाहरण के तौर पर मधेपुरा ( Madhepura )सीट को लें। ‘माय’ समीकरण को ध्यान में रख शायद ही इससे अनकूल कोई सीट महागठबंधन के लिए हो। लेकिन पप्पू के उम्मीदवार के भरोसे भाजपा इस सीट पर भी खुद को मुकाबले में ले आई है।

पाँचवें चरण में पप्पू यादव और असदउद्दीन ओवैसी (खासकर पप्पू यादव) अगर बड़े ‘वोटकटवा’ साबित नहीं हुए तो महागठबंधन के लिए विशेष चिन्ता की बात नहीं। लेकिन एनडीए ने महागठबंधन के ‘गढ़’ में सेंधमारी कर दी है, इससे हरगिज इनकार नहीं किया जा सकता। हाँ, ये सेंधमारी कितनी बड़ी है ये हम 8 नवंबर को जान पाएंगे। इसी ‘सेंधमारी’ पर सीमांचल, मिथिलांचल और ‘माय’ समीकरण की राजनीतिक दिशा तय होगी और कदाचित् बिहार की राजनीतिक दिशा भी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मधेपुरा एस.पी. आशीष की माँ मुद्रिका देवी नहीं रहीं

अगले क्षण क्या होगा कोई नहीं जानता | कोई सोचा नहीं होगा कि अपने आई.पी.एस. बेटे आशीष की शादी कराये बिना और बहु को शुभाशीष दिए बिना ही माँ मुद्रिका अचानक आँखें बन्द कर लेगी…. और किसे पता होगा कि 5 नवम्बर को अपने मताधिकार का प्रयोग किये बिना ही वह माँ अपने बच्चों को छोड़कर दुनिया को अलविदा कह देगी….. जो जहाँ सुना चल दिया मधेपुरा एस.पी. निवास की ओर | ताँता लगा रहा श्रधांजलि देने वालों की |

श्रधांजलि देने के क्रम में शहर के अतिसंवेदनशील समाजसेवी-साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी ने अपने हिस्से की संवेदना व्यक्त करते हुए एस.पी.आशीष कुमार से संवाददाता देवेन्द्र कुमार एवं स्थानीय डॉ.परवेज अख्तर की उपस्थिति में बस यही कहा-

आम लोगों पर जब आपदा या विपदा आती है तो आप जैसे पदाधिकारी उन पीड़ितों को सांत्वना देते हैं, परन्तु आज आपको ही इस चीज की जरुरत हो गई है | मैं आपसे यही कहूँगा- माँ माँ होती है | माँ का कोई विकल्प नहीं होता है | इसकी भरपाई कभी नहीं और कोई नहीं कर सकता | यूँ माँ को परिभाषित नहीं किया जा सकता है फिर भी किसी ने इतना ही कह पाया है – “ God can’t be everywhere, so he created Mother.”

अन्त में डॉ.मधेपुरी ने शायर डॉ.शमशाद की दो पंक्तियाँ एस.पी.आशीष को कह सुनाया-

पीकर कौन आया है यहाँ आबेहयात !
बनी है ये दुनिया एक रोज जाने के लिए !!

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मतदाता जागरूकता के लिए ‘हिन्दुस्तान’ ने निकाला ‘केंडल मार्च’

पाँचवें और अंतिम चरण में मिथिलांचल, कोसी अंचल और सीमांचल के कुल 57 विधान सभाओं के लिए 5 नवम्बर को प्रातः 7 से शाम 5 तक मतदान करेंगे मतदातागण |

अधिक से अधिक अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए एक तरफ महेंद्र सिंह धोनी-शायना नेहवाल…. द्वारा प्रचार तो दूसरी तरफ एवरेस्ट विजेता पदमश्री संतोष यादव…. मतदाता जागरूकता के लिए गाँव-गाँव जाती रही है | तभी तो आज पुरुषों से अधिक जागरूक होकर महिलाएँ मतदान में भाग लेने लगी हैं |

Celebrities spreading awareness for 100% voting in 5th Phase Poll.
Celebrities spreading awareness for 100% voting in 5th Phase Poll.

उसी कड़ी में मतदाताओं को जागरूक करने के लिए अंतिम दौर में स्थानीय हिन्दुस्तान दैनिक समाचार की ओर से ‘केंडल मार्च’ का आयोजन तब किया गया जब मंगलवार की शाम में चुनावी शोर थम गया | हिन्दुस्तान के बैनर तले कर्पूरी चौक से सुभाष चौक तक समाजसेवी-साहित्यकार डॉ. भूपेन्द्र मधेपुरी, डॉ. शांति यादव, आई.एम.ए. के पूर्व एवं वर्तमान अध्यक्ष डॉ.अरुण कुमार मंडल एवं डॉ.मिथिलेश कुमार, सीनेट सदस्य डॉ. नरेश कुमार, अधिवक्ता अजय सहाय वर्मा, डेंटल सर्जन डॉ.निशांत नीरव, समिधा ग्रुप के संदीप सहित प्राइवेट स्कूल एशोसिएशन के जिलाध्यक्ष किशोर कुमार, अमरेन्द्र कुमार सिन्हा आदि अगणित सचेतन लोग मौजूद देखे गये |

हिन्दुस्तान व्यूरो चीफ अमिताभ, मनीष सहाय वर्मा, संवाददाता सुभाष सुमन, देवेन्द्र कुमार, संजय परमार, बंटी सिंह, विभाकर सिंह, दिलखुश, तूरबसु के साथ-साथ सुशील, कुंदन, राहुल-अनिल-पंकज, रविशंकर-कन्हैयाजी एवं ललन कुमार आदि इस लोकतंत्र के महापर्व में शत प्रतिशत मतदान सुनिश्चित कराने के लिए ‘हिन्दुस्तान केंडल मार्च’ में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया |

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लालू ने अटल को ‘अच्छा’ कह ‘प्रणाम’ किया और ‘साम्प्रदायिक’ मोदी को कहा ‘घटिया’

महागठबंधन के नेता और राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव मधेपुरा विधान सभा क्षेत्र के महागठबंधन के प्रत्याशी प्रो. चन्द्रशेखर के प्रचार के लिए स्थानीय शिवनंदन प्रसाद मंडल उच्च विद्यालय परिसर में 12.55 बजे अपराह्न में मंच पर आए और अपने 20 मिनट के भाषण में पाँच बार नरेन्द्र मोदी का नाम लेते हुए कहा कि आज तक ऐसा ‘घटिया’ प्रधानमंत्री नहीं देखा। वहीं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को बहुत अच्छा कहते हुए उन्होंने मंच से ही प्रणाम निवेदित किया। अपने भाषण में मोदी को ‘साम्पदायिक’ कहने के साथ-साथ लालू ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को एक बार फिर ‘नरभक्षी’ कहा और संघ प्रमुख मोहन भागवत की ‘धुनाई’ में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।

उपस्थित युवाओं एवं मतदाताओं से लालू ने अपने खास अंदाज में (और आवाज मोटी कर) कहा कि नरेन्द्र मोदी के सामने कोई झूठ बोलने और ‘जुमला’ पढ़ने में टिक नहीं सकता। उन्होंने मोदी की नकल भी उतारी और लोगों से पूछा कि क्या विदेश से काला धन आया..? क्या एक-एक आदमी के खाते में पन्द्रह-पन्द्रह लाख रुपये आए..? लालू ने चुटकी लेते हुए कहा कि यह सुनकर तो हम भी हिसाब करने लगे और जोड़ कर देखा तो परिवार में ‘एक करोड़ पचहत्तर लाख’ का हिस्सा पड़ा।

इसी तरह हँसाते हुए लालू ने लोगों से महागठबंधन को ‘हरपेट’ कर वोट देने की अपील की और विश्वास दिलाया कि ‘नरेन्दर’ मोदी को दिल्ली से भी भगा देंगे। और हाँ, लालू ने पूरे भाषण के दौरान दो बार कहा कि नीतीश महागठबंधन के नेता हैं और हमारे मुख्यमंत्री वही बनेंगे।

उधर मधेपुरा में डेरा डाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आलमनगर, बिहारीगंज, धमदाहा आदि विधान सभा क्षेत्रों में चुनावी सभाएं कीं। वो अपने भाषणों में सरकार बनने पर महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण देने पर जोर देते हैं और याद दिलाते हैं कि पंचायत चुनाव में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर ‘शुरुआत’ हमने ही की थी। नीतीश कहते हैं कि मेरी घोषणाएं स्थायी होती हैं… प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरह ‘हवा-हवाई’ नहीं।

जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव भी मधेपुरा सहित कोसी के विभिन्न क्षेत्रों में ताबड़तोड़ सभाएं कर रहे हैं। वो अपनी सभाओं में कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने देश में ‘अघोषित इमरजेंसी’ का माहौल पैदा कर दिया है। यही कारण है कि सम्पूर्ण देश के कवि, लेखक, इतिहासकार, वैज्ञानिक और कलाकार अपने-अपने सम्मान को वापस कर रहे हैं। शरद साम्प्रदायिक ताकतों को कमजोर करने तथा नीतीश कुमार के विकास के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में सहयोग करने की अपील करते हैं।

कुल मिलाकर यही कि मोदी ने मधेपुरा में रैली कर वहाँ के माहौल पर जो असर डाला है उसे बेअसर करने में ये तीनों कोई कसर नहीं छोड़ रहे। अब जनता क्या करती है, जनता जाने।

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‘मंडल’ के मधेपुरा में ‘मोदी’ का मतलब

भारतीय राजनीति के ‘मंडल युग’ का जनक मधेपुरा… महागठबंधन का ‘गढ़’ माना जाने वाला मधेपुराआज साक्षी बना मोदी की झलक पाने को बेताब अपार जनसमूह का। जी हाँ, आज प्रधानमंत्री मोदी ने मधेपुरा में एक बड़ी रैली की। उनके साथ थे पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन तथा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व ‘हम’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी। रैली भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के नए परिसर में थी जहाँ प्रधानमंत्री दिन के 1.30 बजे आए। पूरा मधेपुरा  आज मोदीमय दिखा। ये सही है कि भीड़ से वोट को नहीं आंका जा सकता लेकिन जनमानस पर उनका क्या असर है, ये बताने के लिए मधेपुरा की आज की आबोहवा काफी थी।

गुजरात का ‘शेर’ आज नीतीश-लालू-शरद के ‘गढ़’ में गरज रहा था। उन्होंने कहा कि 25 साल से यहाँ बड़े भाई और छोटे भाई की सरकार थी लेकिन वे बिहार से पलायन को नहीं रोक सके। जनता इस बार इसका हिसाब ले। मोदी ने कहा कि जब बिहार में भाजपा सरकार में साथ थी तब राज्य में 17 हजार 500 करोड़ का निवेश हुआ लेकिन भाजपा के हटते ही यह घटकर महज छह हजार करोड़ रह गया।

प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री नीतीश को निशाने पर लेते हुए कहा कि पिछली बार उन्होंने कहा था कि अगर बिजली नहीं पहुँचाऊंगा तो वोट मांगने नहीं आऊँगा लेकिन अपना वादा पूरा किए बिना वो वोट मांगने आ गए। उन्होंने कहा कि इस बार अगर बिहार में एनडीए की सरकार आई तो उन चार हजार गाँवों में बिजली पहुँचाने का काम पूरा किया जाएगा जहाँ नीतीश सरकार बिजली नहीं पहुँचा सकी।

नरेन्द्र मोदी ने इस इलाके की समस्या को ‘पानी’ और ‘जवानी’ से जोड़ा। उन्होंने कहा कि यहाँ ‘पानी’ और ‘जवानी’ दोनों को बर्बाद किया जा रहा है। मोदी ने कहा कि बिहार में कोशी के पानी का उपयोग मछलीपालन के लिए किया जाय तो मछली का आयात कम होगा और लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार भी मिलेगा। बिहार में संसाधन होते हुए भी उसका उपयोग नहीं किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने खास अंदाज में “पढ़ाई, कमाई और दवाई” के लिए अपनी प्रतिबद्धता जताई और लोगों से बढ़-चढ़कर चुनाव में हिस्सा लेने को कहा। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार के लोग 8 नवंबर को दिवाली मनाएंगे और पूरा देश 11 नवंबर को दिवाली मनाएगा।

स्पष्ट है कि 8 नवंबर को दिवाली मनाने से मोदी का मतलब एनडीए की सरकार बनने से है। मोदी के मन से बिहार में दिवाली मनती है या नहीं, ये तो आने वाला समय बताएगा लेकिन जो धरती ‘स्वभाव’ और ‘संस्कार’ से समाजवादियों की रही है, जिस इलाके में कल तक भाजपा की कोई पैठ नहीं थी, जहाँ जातिगत समीकरण भी एनडीए के लिए बहुत अनुकूल नहीं वहाँ मोदी का आना और लोगों का उनके लिए उमड़ जाना बड़ी बात है। आज की रैली से मोदी नीतीश-लालू-शरद की त्रिमूर्ति के लिए एक बड़ी चुनौती छोड़ गए हैं। ये चुनौती मधेपुरा ( Madhepura ) की चार या कोशी की तेरह सीटों से ज्यादा इस बात की है कि अब ‘मंडल’ के इलाके में भी ‘कमंडल’ अपनी मौजूदगी का एहसास कराने लगा है।

 मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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एवरेस्ट विजेता संतोष यादव वोटर जागरूकता के लिए मधेपुरा में

निर्वाचन आयोग द्वारा वोटरों को जागरूक करने के लिए हरियाणा की बेटी एवं बिहार की बहु पदमश्री संतोष यादव को ब्रांड एम्बेसेडर बनाकर बिहार भेजा गया है | आज समस्त भारत उसे बेटी मानकर भरपूर सम्मान दे रहा है | विश्व के किसी भी कोने में वह परिचय का मोहताज नहीं | यही कारण है कि वैसे पर्वतारोही व पर्यावरणविद संतोष यादव को चुनाव आयोग द्वारा आइकॉन बनाया गया है |

मधेपुरा जिला प्रशासन द्वारा संतोष यादव का कार्यक्रम बालम-गढ़िया मध्य विद्यालय परिसर में शत प्रतिशत मतदाता जागरूकता के निमित्त शुक्रवार को आयोजित किया गया था | इस अवसर पर उनसे मिलने एवं उनका स्वागत करने के लिए उनके पूर्व परिचित स्थानीय समाजसेवी व साहित्यकार डॉ. भूपेन्द्र मधेपुरी कार्यक्रम की सफलता के लिए घंटो पूर्व से वहाँ सक्रिय देखे गये |

सभा स्थल पर आते ही उपस्थित ग्रामीण वोटरों, नर-नारियों एवं बालक-बालिकाओं के बीच जा-जाकर, गले से गला मिला-मिलाकर बिना किसी झिझक के नाच-नाचकर उन्होंने ऐसी समा बांध दी कि सारा माहौल ऊर्जावान हो गया | सभी चेहरे प्रकाशमान दिखने लगे | सभी आत्मविश्वास से भर गये | ऐसा लगने लगा जैसे इस धरती के वोटरों को प्यास बुझाने के लिए जिला पदाधिकारी मो. सोहैल ने प्रशासन की ओर से डी.डी.सी. मिथिलेश कुमार, बी.डी.ओ. दिवाकर कुमार, सी.डी.पी.ओ. दर्शना कुमारी ( बिहारीगंज ) के साथ पुलिस के सुरक्षा बलों को सेलिब्रिटी संतोष यादव के इस वोटर जागरूकता कार्यक्रम में सहयोग के लिए भेजा था |

पदमश्री संतोष यादव ने वोटरों को जागरूक करने के क्रम में अपने एवरेस्ट विजय की कहानी सुनाते हुए इस बात की चर्चा की कि एवरेस्ट की चढ़ाई ने उसे जीने का सलीका सिखा दिया तथा बिना किसी भय के कदमों को आगे बढानें का रास्ता दिखा दिया | उन्होंने मतदाताओं से कहा कि आप भी बिना किसी भय एवं प्रलोभन के अपना वोट डालें और लोकतंत्र को मजबूत बनावें | लगे हाथ बालक-बालिकाओं से उन्होंने कहा कि वोट के दिन आप अपने लाचार-बीमार माता-पिता, दादा-दादी और नाना-नानी को भी बूथ तक ले जाने में मदद करें और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में भरपूर सहयोग ! सौ फीसदी वोट डालने से ही मजबूत बनेगा लोकतंत्र !

सभा के आरंभ में प्रशासन की ओर से डी.डी.सी. एवं अन्य पदाधिकारीगण द्वारा बुके देकर तथा डॉ. मधेपुरी द्वारा पुष्प-गुच्छ से साथ अपनी पुस्तक भेंटकर पदमश्री संतोष यादव का स्वागत किया गया | संतोष यादव को उसी दिन पटना से हवाई मार्ग द्वारा दिल्ली पहुचना अत्यावश्यक हो गया | इस कारण चंद मिनटों के लिए डॉ. मधेपुरी के ‘ वृन्दावन ’ निवास पर पारिवारिक सदस्यों से मिलकर , सिंहेश्वर में बाबा भोलेनाथ की पूजा अर्चना करने के बाद उन्हें पटना होते हुए दिल्ली पहुचने में कोई व्यवधान नहीं हुआ जिसे वे देवाधिदेव महादेव की कृपा मानती हैं |

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तीसरे चरण में नज़रें भाजपा के ‘हाल’ और लालू के दोनों ‘लाल’ पर

बिहार चुनाव के पाँच चरणों में सर्वाधिक ‘महत्वपूर्ण’ (और कदाचित् निर्णायक भी) तीसरा चरण कल सम्पन्न हुआ। मतदान का प्रतिशत 53.32 रहा जिससे कोई स्पष्ट संकेत या रुझान नहीं मिलता और इस तरह 8 नवंबर का ‘रहस्य’ और गहरा गया है। बहरहाल, इस चरण के ‘महत्व’ पर बात करने से पहले कुछ तथ्यों पर निगाह डाल लें।

तीसरे चरण में छह जिलों की 50 सीटों के लिए वोट डाले गए। इन छह जिलों में राजधानी पटना भी शामिल है। पटना के अलावे शेष पाँच जिले भोजपुर, बक्सर, नालंदा, सारण और वैशाली हैं। 2010 के चुनाव में इन छह जिलों में मतदान का प्रतिशत 50.08 था। पिछले दो चरणों की तरह इस चरण में भी बाजी महिला मतदाताओं के नाम रही। 52.05 प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले लगभग 54 प्रतिशत महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इन छह जिलों में 53.62 प्रतिशत मतदान के साथ बक्सर सबसे आगे रहा, जबकि 51.82 प्रतिशत मतदान के साथ पटना सबसे पीछे।

तीसरे चरण में उम्मीदवारों की कुल संख्या 808 थी जिनमें 737 पुरुष और 71 महिला उम्मीदवार शामिल हैं। मतदाताओं की कुल संख्या एक करोड़ 45 लाख 18 हजार सात सौ पाँच और मतदान केन्द्रों की संख्या 13,648 थी। जिन 50 सीटों पर कल मतदान हुआ उनमें से 2010 में 23 सीटें जेडीयू, 19 सीटें भाजपा और 8 सीटें राजद ने जीती थीं। इस बार महागठबंधन की ओर से राजद 25, जेडीयू 18 और कांग्रेस सात सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि एनडीए की तरफ से भाजपा के 34, लोजपा के 10, हम के चार और रोसोसपा के दो उम्मीदवार मैदान में हैं।

अब बात इस पर करें कि ये चरण महत्वपूर्ण और बहुत हद तक ‘निर्णायक’ भी क्यों है। इसके कई कारण स्पष्ट तौर पर दिखते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों व समीक्षकों की मानें तो पहले दो चरणों में एनडीए का प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा है। अगर इस चरण में भी मतदान उसके पक्ष में नहीं हुआ तो आगे के दो चरणों में उसकी राह और कठिन हो जाएगी। खास कर पाँचवें चरण में जिसमें सीमांचल का इलाका है और मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में हैं। कहने की जरूरत नहीं कि मुस्लिम मतदाताओं का स्पष्ट झुकाव महागठबंधन की ओर है।

इस चरण के महत्वपूर्ण होने का दूसरा बड़ा कारण लालू के दोनों ‘लाल’ का चुनाव मैदान में होना है। तेजप्रताप महुआ से और तेजस्वी राघोपुर से भाग्य आजमा रहे हैं। तेजप्रताप का मुकाबला हम के रवीन्द्र राय से है तो तेजस्वी के सामने पिछले चुनाव में उनकी माँ राबड़ी को हराने वाले सतीश कुमार हैं। सतीश तब जेडीयू के उम्मीदवार थे और इस बार भाजपा की ओर से चुनाव लड़ रहे हैं। ये दोनों सीटें ना केवल लालू बल्कि उनकी पार्टी के लिए भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है।

भाजपा के दिग्गज नेता और विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष नंदकिशोर यादव (पटना साहिब), विधान सभा उपाध्यक्ष अमरेन्द्र प्रताप सिंह (आरा), विधान सभा में भाजपा के मुख्य सचेतक अरुण कुमार सिन्हा (कुम्हरार), भाजपा के वरिष्ठ नेता सीपी ठाकुर के सुपुत्र विवेक ठाकुर (ब्रह्मपुर) और नीतीश कुमार के मुखर समर्थक से मुखर विरोधी बने ज्ञानेन्द्र सिंह ज्ञानू (बाढ़) के भाग्य का फैसला भी इसी चरण में होना है। जेडीयू के मंत्रियों श्याम रजक (फुलवारीशरीफ) और श्रवण कुमार (नालंदा) और जेल में बंद पूर्व जदयू विधायक और इस बार निर्दलीय प्रत्याशी बाहुबली अनंत सिंह (मोकामा) का चुनाव भी इसी चरण में है।

तीसरे चरण की राजनीतिक अहमियत इस कारण भी है कि नालंदा नीतीश कुमार का गृहक्षेत्र है, सारण लालू प्रसाद यादव का और हाजीपुर रामविलास पासवान का। इस तरह इन तीनों कद्दावर नेताओं का कद भी अन्य चरणों की तुलना में इस चरण में कहीं ना कहीं दांव पर अधिक लगा हुआ है।

कल सम्पन्न हुए तीसरे चरण के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि बिहार की जनता सारे दलों को ‘भरमा’ कर रखने में पूरी तरह सफल रही है। पहले जनता नहीं जान पाती थी कि चुनाव के बाद नेता क्या करेंगे और आज कोई भी नेता यह कहने की स्थिति में नहीं है कि जनता क्या करने जा रही है। यह अपने आप में एक बड़ा परिवर्तन है। इस चरण के मतदान में 2010 की तुलना में तीन प्रतिशत का इजाफा जरूर हुआ है और इस इजाफे पर महागठबंधन और एनडीए दोनों अपनी-अपनी मुहर भी लगा रहे हैं पर सच यही है कि ‘जश्न’ मनाने की स्थिति में कोई खेमा नहीं है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लालू ‘शैतान’, शाह ‘नरभक्षी’, मोदी ‘ब्रह्मपिशाच’… ये किस ‘नरक’ में आ गए हम..?

बिहार चुनाव की ताजा ख़बर। प्रधानमंत्री मोदी ‘ब्रह्मपिशाच’ तो थे ही अब ‘गली के गुंडे’ भी हो गए हैं और इस उपाधि से उन्हें नवाजा ‘शैतान’ लालू की ‘बेचारी’ बेटी मीसा ने जिसे बकौल मोदी उसके पिता पिछले चुनाव में ‘सेट’ नहीं कर पाए थे। कैसा लगा पढ़कर..? हंसी आई, क्रोध हुआ, शर्मिंदगी महसूस की आपने या फिर गालियां निकलीं आपके श्रीमुख से..? चाहे जैसा लगा हो आपको, यही ‘सच’ और यही ‘हासिल’ है बिहार चुनाव का। सिर्फ बिहार को ही बदनाम क्यों करें, कमोबेश हर राज्य का और इस तरह पूरे देश का यही हाल है। ‘अपशब्दों’ के लिए ‘प्राथमिकियां’ दर्ज होना और चुनाव आयोग का ‘संज्ञान’ लेना अब आम बात हो चली है।

लालू ‘चाराचोर’, नीतीश ‘अहंकारी’, अमित शाह ‘मोटे’ और नरेन्द्र मोदी ‘जुमलेबाज’ तो थे ही लेकिन ज्यों-ज्यों चुनाव आगे बढ़ा लालू ‘शैतान’, नीतीश ‘खराब डीएनए वाले’, अमित शाह ‘नरभक्षी’ और नरेन्द्र मोदी ‘ब्रह्मपिशाच’ हो गए। हाय री राजनीति..! गिरावट की भी कोई हद होती है कि नहीं..? राजनीति में आलोचना की जगह है, व्यंग्य की जगह है, कटाक्ष की जगह है लेकिन क्या अब इन शब्दों के लिए भी जगह बनानी होगी..? स्वस्थ लोकतंत्र में विरोध तो होना ही चाहिए, थोड़ी-बहुत तल्खियां भी बर्दाश्त की जा सकती हैं लेकिन क्या इन अपशब्दों की वकालत किसी तरह भी की जा सकती है..?

यहाँ चार नेताओं को मिली ‘उपाधियों’ की ही चर्चा की गई है। इनमें दो महागठबंधन के तो शेष दो एनडीए के सबसे बड़े चेहरे हैं। इसका ये मतलब कतई नहीं कि बाकी बचे ‘बेदाग’ हैं। सच तो यह है कि हमाम में सब नंगे हैं और इस कदर नंगे हैं कि उनका बस चले तो एक-दूसरे की चमड़ियां उतारकर ओढ़ लेने से भी परहेज ना करें। बहरहाल, बिहार चुनाव में ऐसे शब्दों और उपाधियों का पूरा ‘कोश’ तैयार हो रहा है और इसमें नई इंट्री हुई है ‘गली के गुंडे’ की जिसका प्रयोग किसी और के लिए नहीं प्रधानमंत्री मोदी के लिए किया गया है और वो भी लालू की बड़ी बेटी मीसा के द्वारा।

पूरा वाक्या कुछ यों है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी एक चुनावी रैली में कह दिया कि लालू प्रसाद ने पिछली बार ‘बेचारी’ बेटी को ‘सेट’ करने की कोशिश की थी और अब अपने बेटों को ‘सेट’ करने की कोशिश में पूरे बिहार को ‘अपसेट’ कर रहे हैं। इस पर मीसा ने अपने फेसबुक पेज पर पूछा कि यह ‘सेट’ करने की कोशिश क्या है..? क्या एक बाप अपनी बेटी को ‘सेट’ करने की कोशिश करता है..? मीसा ने लिखा कि किस तरह की बाजारू भाषा है ये..? वह भी एक महिला के लिए..?  देश का प्रधानमंत्री होकर एक सार्वजनिक मंच से एक महिला को ‘बेचारी’ कहने पर मीसा ने सख्त आपत्ति की और कहा कि एक तरफ आप ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ का नारा देकर स्वांग रचते हैं और दूसरी तरफ महिलाओं के लिए सरेआम अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल करते हैं। और इस तरह मोदी को ‘गली का गुंडा’ करार देते हुए मीसा कहती हैं कि जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल प्रधानमंत्री अपने भाषणों में करते हैं वैसा कोई सभ्य व्यक्ति नहीं कर सकता।

खैर ये तो मोदी के घोर समर्थक भी मानेंगे कि चुनावी रैलियों में उनकी भाषा और शैली वो नहीं रहती जो ‘लालकिले’ या ‘सिलिकॉन वैली’ में रहती है। मीसा के लिए कहे गए शब्द भी प्रधानमंत्री की गरिमा के अनुरूप नहीं थे। दुनिया भर में उन्होंने अपनी जो छवि बनाई उसे वो बिहार में दांव पर क्यों लगा रहे हैं, ये भी समझ से परे है। पर मीसा अपने पिता द्वारा प्रधानमंत्री को ‘ब्रह्मपिशाच’ कहे जाने पर क्या बोलेंगी..? और जब उनके पिता ‘करिया कबूतर’ और ‘एक बोतल दारू’ से ‘मोदी के भूत’ को ‘झाड़’ रहे होते हैं और ‘भूत’ फिर भी ना भागे तो ‘करिया हड़िया’ में ‘सरसों’ और ‘लाल मिर्च’ जला रहे होते हैं, तब वो चुप क्यों रहती हैं..?

बिहार में चुनाव अपने चरम पर है। दो चरण हो चुके हैं और तीसरे चरण का मतदान आज हो रहा है। चौथा और पाँचवां चरण भी आ ही जाएगा… 8 नवंबर को मतगणना होगी… और फिर अगले कुछ दिनों में चाहे जिसकी भी हो, सरकार का गठन भी हो जाएगा। जीतने वाले सीना तानकर चलेंगे और हारने वाले गरदन झुकाकर। चुनाव है तो जीत-हार भी होनी ही है, सो हो जाएगी। लेकिन क्या सारी कहानी इसी जीत-हार पर आकर खत्म हो जाती है..? नहीं… बिल्कुल नहीं। सच तो ये है कि चुनाव चाहे जो जीते, ‘मनुष्यता’ की लड़ाई दोनों ही पक्ष – महागठबंधन और एनडीए (शेष दल भी अपवाद नहीं हैं) – हार चुके हैं। मनुष्यता की लड़ाई मर्यादा और संस्कार के ‘शस्त्रों’ से लड़ी जाती है पर बिहार चुनाव में सभी दलों के नेता इन शस्त्रों का ‘संधान’ भूल चुके हैं। वे सचमुच भूल बैठे हैं कि मर्यादा खोकर, संस्कार लुटाकर आपने ‘सिंहासन’ क्या पूरा संसार भी पा लिया तो भी ‘कंगाल’ ही कहलाएंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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