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… इसीलिए छठ ‘महापर्व’ है..!

समय के साथ सब कुछ बदलता है। आपके तौर-तरीके ही नहीं, त्योहार तक बदल जाते हैं। तकनीक ने हमें बाहर जितना विस्तार दिया, भीतर उसी अनुपात में सिमटते गए हम और इस ‘संकुचन’ को बड़ी बेशर्मी से ‘आधुनिकता’ का नाम दिया हमने। आयातित बोली, आयातित शिक्षा, आयातित परिधान, आयातित संगीत, आयातित नृत्य, आयातित साहित्य, आयातित सिनेमा, आयातित उपकरण… इस आधुनिकता में सब कुछ आयातित था। आयात-आधारित इस आधुनिकता में हम विचारधारा भी आयात करने लगे और अब तो त्योहार आयात करने में भी संकोच नहीं होता हमें। इसे हम समय के साथ बदलना कहने लगे हैं।

इस ‘आधुनिकता’ की होड़ में गांव बड़ी तेजी से शहरों में खोते जा रहे हैं। डिब्बाबंद दूध, ‘डेलिवर’ किए गए फास्ट फूड और बोतलबंद पानी पर बड़ी हुई पीढ़ी ‘ईएमआई’ चुकाना भले सीख ले, मिट्टी का ‘कर्ज’ चुकाने के संस्कार से वो कोसों दूर रहेगी। हम गौर से देखें, जड़ तक जाकर पड़ताल करें तो पाएंगे कि हमारे सारे व्रत और त्योहार हमारी मिट्टी से जुड़े हैं। हम आजीवन अपनी मिट्टी से जो लेते हैं दरअसल व्रत रखकर और त्योहार मनाकर उसी का आभार जताते हैं हम। पर लानत है हम पर कि अब हम अपनी मिट्टी तक में ‘मिलावट’ करने लगे हैं। इसी का परिणाम है कि होली, दीपावाली जैसे त्योहारों का बड़ी तेजी से ‘शहरीकरण’ होने लगा है। या यूँ कहें कि अब इन त्योहारों को हम ‘आधुनिक’ तरीके से मनाने लगे हैं।

आधुनिकता की इस चकाचौंध में भी अगर हमारी आँखें पूरी तरह चुंधिया नहीं गई हैं तो इसका बहुत बड़ा श्रेय छठ को जाता है। अपनी जड़ों से कटकर महानगरों के आसमान में उड़ना सीख गए बच्चे होली-दीपावली चाहे जहाँ मना लें पर छठ के लिए वे अपने ‘घोंसले’ को लौट आते हैं। उन बच्चों के बच्चे जान पाते हैं कि ‘टू बेडरूम फ्लैट’ से बाहर की दुनिया कितनी बड़ी होती है और दो इकाईयों के साथ रहने से बने परिवार और कई परिवारों के जुड़ने से बने परिवार में क्या फर्क होता है। वे समझ पाते हैं कि ‘डिस्कवरी’ पर नदियों को देखना और उसे छूकर महसूसना कितना अलग होता है। वे जान पाते हैं कि क्या होता है सूप, कैसा होता है दौउरा, कौन बनाते हैं इन चीजों को और समाज के कितने अभिन्न अंग हैं वे। छठ ही बताता है उन्हें डाभ, चकोतरा (टाब नींबू), सिंघाड़ा, अल्हुआ और सुथनी जैसे फलों का अस्तित्व।

छठ धर्म से ज्यादा समाज का, सामूहिकता का और समानता का त्योहार है। समाजवाद का सबसे जीवंत दृश्य आपको छठ घाट पर दिखेगा। मालिक और मजदूर दोनों एक समान सिर पर प्रसाद का दौउरा ढोते मिलेंगे आपको। सबके सूप का मोल-महत्व एक समान होगा। कोई आडम्बर नहीं। किसी को भी पुरोहित की ‘मध्यस्थता’ नहीं चाहिए होती। बस आस्था होनी चाहिए, आपकी पूजा सीधे छठी मईया तक पहुँच जाती है। हिन्दू-मुसलमान के बीच खड़ी ‘दीवार’ भी इस आस्था के आगे सिर झुकाती है। ऐसा कोई बाज़ार नहीं जिसमें छठ की पूजन सामग्री बेचने वालों में मुस्लिम समाज के लोग ना हों। उनकी श्रद्धा और उत्साह में रत्ती भर भी कमी निकाल कर दिखा दें आप। और तो और आप शिद्दत से ढूँढेंगे तो कुछ घाट ऐसे भी होंगे जहाँ अर्ध्य देतीं मुस्लिम माताएं और बहनें भी दिख जाएंगी आपको।

अगर छठ ना हो तो आज के युग में ‘डूबते सूरज’ को प्रणाम करना हम सीख ही नहीं पाएंगे। बेटियों को कोख में ही मार देने वाले कभी नहीं जान पाएंगे कि किसी पर्व में बेटियों की भी मन्नत मांगी जाती है। हिन्दू समाज का ये सम्भवत: एकमात्र पर्व है जिसमें अराधना के लिए किसी ‘मूर्ति’ की जरूरत नहीं पड़ती। व्रत करने वाली हर नारी छठी मईया का रूप होती है और उम्र में आपसे छोटी ही क्यों ना हों उनके पैर छूकर ही प्रसाद ग्रहण करना होता है आपको। नारी-सशक्तिकरण के किसी नारे में इतनी ताकत हो तो बताएं।

कोई पर्व एक साथ इतनी विलक्षण खूबियों को अपने में नहीं समा सकता, इसीलिए छठ ‘महापर्व’ है। हमारी आस्था का, हमारे संस्कार का, हमारी पवित्रता का, हमारे विस्तार का ‘महापर्व’। मिट्टी के सोंधेपन से सने छठ के गीत सुनकर जब तक आपके रोम-रोम झंकृत होते रहेंगे तब तक समझिए अपनी जड़ से जुड़े हैं आप और तथाकथित ‘आधुनिकता’ की कैसी भी आंधी क्यों ना हो बहुत मजबूती से टिके हैं आप।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या मीसा उपमुख्यमंत्री, तेजप्रताप कैबिनेट मंत्री और तेजस्वी होंगे राजद के कार्यकारी अध्यक्ष..?

बिहार चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं। “महागठबंधन या एनडीए” का सस्पेंस खत्म हो चुका है। महागठबंधन के जीतने पर नीतीश का मुख्यमंत्री होना तय था और अब तो उनके शपथ-ग्रहण का दिन और समय भी निश्चित हो चुका है। 20 नवम्बर को दोपहर दो बजे नीतीश पाँचवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। अब सबकी निगाहें इस बात पर लगी हैं कि नीतीश के ठीक बाद शपथ लेने कौन जाएगा यानि कौन होगा बिहार का उपमुख्यमंत्री..? ये सवाल कितना मुश्किल है, कोई जाकर लालू से पूछे… जिन्हें यह ‘यक्षप्रश्न’ सुलझाना है।

बिहार में इस वक्त केवल यही चर्चा है कि लालू किसे और किस वजह से चुनेंगे..? मजे की बात तो यह है कि लोग इसी सवाल के जवाब में दूसरे बड़े सवाल का जवाब भी ढूँढ़ लेते हैं कि कौन होगा लालू का उत्तराधिकारी..? यानि लोग ये मानकर चल रहे हैं कि जो उपमुख्यमंत्री होगा, वही लालू का उत्तराधिकारी भी होगा। लेकिन देखा जाय तो दूसरा सवाल पहले सवाल से भी ज्यादा कठिन है और मौजूदा हालात में अधिक सम्भावना इसी बात की है कि लालू उपमुख्यमंत्री और उत्तराधिकारी दो अलग लोगों को बनाएं और वे दोनों उन्हीं के परिवार से हों।

लालू की पार्टी में पुराने और वफादार लोग कई हैं लेकिन उनमें खुद को उपमुख्यमंत्री पद का ‘दावेदार’ कहने की स्थिति में कोई भी नहीं। महागठबंधन की इतनी बड़ी जीत और उस जीत में लालू की बड़ी भूमिका के बाद तो हरगिज नहीं। हालांकि इस पद के लिए पार्टी से एक नाम की खूब चर्चा है और वो नाम अब्दुल बारी सिद्दीकी का है। सिद्दीकी वरिष्ठ हैं, लालू के विश्वासपात्र हैं और उनके ‘माय’ समीकरण को पूरा भी करते हैं। लेकिन लालू उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाने की ‘उदारता’ दिखा पाएंगे इसकी उम्मीद कम है। हाँ, ‘भरपाई’ के लिए लालू उन्हें विधान सभा का अध्यक्ष जरूर बनवा सकते हैं। उदय नारायण चौधरी के चुनाव हार जाने के बाद जेडीयू को भी इसमें विशेष कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

अब सवाल उठता है कि सिद्दीकी नहीं तो कौन..? सिद्दीकी के अलावे उपमुख्यमंत्री के तौर पर तीन और नाम चर्चा में हैं और वे तीनों लालू के परिवार से हैं। राघोपुर से विधायक बने तेजस्वी, महुआ से चुने गए तेजप्रताप और राजनीति में पहले से ‘सक्रिय’ लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती। रही बात उत्तराधिकारी की तो ये तय है कि वो उनके परिवार से होगा और उनका बेटा होगा। पप्पू यादव द्वारा उठाए गए ‘उत्तराधिकार’ के मुद्दे पर लालू यह पहले ही साफ कर चुके हैं।

उपमुख्यमंत्री पद के लिए मीसा का नाम आना ‘अकारण’ नहीं है। मीसा को इस पद पर बिठाकर लालू के एक पंथ कई काज हो जाएंगे। पहला कि ये कुर्सी उनके परिवार में आ जाएगी, दूसरा उनके दोनों बेटों के बीच अघोषित पर सम्भावित ‘टकराव’ टल जाएगा और तीसरा महिलाओं में एक बड़ा संदेश दिया जा सकेगा जिन्होंने जी खोलकर महागठबंधन को वोट दिया है। लालू ये बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि महिलाओं ने नीतीश को देखकर वोट दिया है। मीसा को आगे कर वो राजद की पैठ भी महिलाओं में बना सकते हैं और उनसे चिपका ‘जंगलराज’ का दाग भी बहुत हद तक धुल सकता है। हालांकि मीसा अभी किसी सदन की सदस्य नहीं हैं लेकिन विधान परिषद् जाते उन्हें कितनी देर लगेगी भला।

रही बात तेजप्रताप और तेजस्वी की तो यह स्पष्ट हो चुका है कि तेजस्वी में लालू और उनकी पार्टी दोनों ही सम्भावना देख रहे हैं। चुनाव के दौरान राघोपुर में तेजस्वी के लिए वोट मांगने के क्रम में लालू ने इसका संकेत भी दे दिया है। तेजस्वी राजद के युवा चेहरे के तौर पर उभरे हैं और तेजप्रताप की तुलना में राजनीतिक रूप से अधिक ‘परिपक्व’ भी दिखते हैं। अगर तेजस्वी लालू के एकमात्र बेटे होते तो उनका उपमुख्यमंत्री और उत्तराधिकारी दोनों होना तय होता। लेकिन तेजप्रताप ना केवल उनसे बड़े हैं और उन्हीं की तरह बाकायदा चुनाव जीतकर आए हैं बल्कि माँ राबड़ी के चहेते भी हैं। लालू के नजदीकी लोग अच्छी तरह जानते हैं कि लालू का ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ छोटे बेटे तेजस्वी के लिए है तो राबड़ी का बड़े बेटे तेजप्रताप के लिए। दोनों भाईयों के बीच लालू के सालों साधु और सुभाष वाली ‘प्रतिद्वंद्विता’ टालने के लिए भी मीसा को आगे किया जा सकता है।

ऊपर के विश्लेषण के बाद जरा देखें कि लालू के पास मीसा, तेजप्रताप और तेजस्वी को लेकर कौन-कौन से विकल्प हैं..? पहला, मीसा को उपमुख्यमंत्री बनाया जाय और तेजप्रताप-तेजस्वी दोनों को कैबिनेट में जगह दी जाय। इस पर शायद नीतीश आपत्ति करें। दूसरा, तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री बनाया जाय और तेजप्रताप को कैबिनेट में लिया जाय। इस पर तेजप्रताप और मीसा दोनों ‘रूठ’ जाएंगे। तीसरा, मीसा को उपमुख्यमंत्री बनाया जाय, तेजप्रताप को कैबिनेट में भेजा जाय और पार्टी की बागडोर तेजस्वी के हाथ में सौंपी जाय उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर। यानि उत्तराधिकार तेजस्वी को मिले, उपमुख्यमंत्री का पद भाई-बहनों में सबसे बड़ी मीसा को और तेजप्रताप भी असंतुष्ट ना रहे।

ये भी सम्भव है कि मीसा-तेजप्रताप-तेजस्वी की भूमिका आपस में बदल जाय लेकिन इतना तय है कि लालू और राबड़ी ना तो इन तीनों में से किसी को किनारे कर सकते हैं और ना ही तीनों को एक साथ सरकार या संगठन में जगह दे सकते हैं। ऐसे में किन्हीं दो को सरकार में और एक को पार्टी में बड़ा यानि ‘नेक्स्ट टू लालू’ का पद देकर ‘परिवार’ की समस्या हल की जा सकती है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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20 नवम्बर को गाँधी मैदान में, पाँचवीं बार मुख्यमंत्री की शपथ लेंगे नीतीश कुमार

सर्वप्रथम नीतीश मंत्रिपरिषद की बैठक होती है | फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सरकारी आवास 7, सर्कुलर रोड में आयोजित जद(यू) विधान मंडल दल की बैठक होती है जिसमें 16वीं विधान सभा के जदयू के 71 विधायकों एवं 26 विधान पार्षदों की मौजूदगी में सर्वसम्मति से नीतीश कुमार को नेता चुना जाता है |

आगे जब नीतीश कुमार को महागठबंधन का नेता चुना जाता है तब राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद एवं नीतीश कुमार दोनों एक ही कार में बठकर राज्यपाल रामनाथ कोविंद से मिलकर इस्तीफा देने, 15वीं विधानसभा भंग करने एवं 16वीं विधानसभा के लिए नया मंत्रिमंडल बनाने का दावा पेश करने हेतु राजभवन की ओर कूच करते हैं | काफिले के आगे-आगे प्रमुख नेता होते हैं- जदयू के राष्ट्रीय अद्यक्ष शरद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, कांग्रेस नेता सी.पी.जोशी, जदयू अद्यक्ष वशिस्ठ नारायण सिंह, राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.त्यागी आदि |

नयी सरकार गठन हेतु राज्यपाल द्वारा 20 नवम्बर की तिथि निर्धारित की जाती है | तब तक के लिए केयर टेकर मुख्यमंत्री का दायित्व नीतीश कुमार को सौंपा जाता है | और जानिये, जहाँ नीतीश कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि कोई जीत के गुमान में न रहें, निष्ठापूर्वक काम करें | वहीं लालू प्रसाद ने कहा कि सरकार चलाने की अधिक जिम्मेवारी राजद पर है | और अन्त में महागठबंधन के सूत्रधार राष्ट्रीय नेता शरद यादव ने कहा कि महागठबंधन के तीनों घटक दलों को सदा एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए |

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मधेपुरा को दिया मोदी सरकार ने 20 हजार करोड़ का दीपावली उपहार……..!

लालू प्रसाद के रेल मंत्रित्व काल के दरमियान 2007 में ही रेल मंत्रालय द्वारा मधेपुरा में रेल विधुत इंजन कारखाना निर्माण हेतु श्रीपुर चकला गाँव के निकट तीन सौ एकड़ जमीन अधिग्रहण की गई लेकिन उनके रेल मंत्री से हटते ही कारखाना निर्माण की गति धीमी पड़ गई | विलम्ब का कारण रेलवे द्वारा राशि के अभाव का रोना ही सामने आता रहा |

बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने मधेपुरा और मढोरा को दिया दीपावली का बम्पर उपहार ! मधेपुरा को रेल विधुत इंजन कारखाना निर्माण हेतु 20 हजार करोड़ और मढोरा (छपरा) को डीजल इंजन कारखाना निर्माण हेतु 15 हजार करोड़ |

यह भी जानें कि मधेपुरा का रेल विधुत इंजन कारखाना बनाएगी फ़्रांस की ट्रांसपोर्ट कंपनी आल्सटाम और मढोरा का रेल डीजल इंजन कारखाना बनायेगा- जेनरल इलेक्ट्रिक कंपनी ऑफ अमेरिका |

फिलहाल इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ की अब तक की सर्वाधिक बड़ी सफलता मानी जा रही है |

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गाँधी मैदान में 20 नवम्बर को नीतीश सरकार का होगा शपथ-ग्रहण

बिहार विधानसभा चुनाव-2015 में भारी बहुमत मिलने के बाद पटना के गाँधी मैदान में महागठबंधन की सरकार शपथ लेगी जिसमें पाँचवीं बार मुख्यमंत्री बनेंगे नीतीश कुमार | शपथ-ग्रहण समारोह में मुख्यरूप से जो राजनेतागण उपस्थित होंगे उनमें प्रमुख हैं- जदयू अद्यक्ष शरद यादव, राजद अद्यक्ष लालू प्रसाद, कांग्रेस अद्यक्ष सोनिया गाँधी, उपाध्यक्ष राहुल गाँधी सहित दिल्ली के सी.एम.अरविन्द केजरीवाल, वेस्ट बंगाल से ममता बनर्जी, असम के सी.एम.तरुण गोगई, उडीसा के सी.एम.नवीन पटनायक एवं आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू आदि |

मधेपुरा अबतक द्वारा जब समाजसेवी एवं जदयू के वरिष्ठ नेता डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी से नीतीश सरकार के शपथ-ग्रहण समारोह में सम्मिलित होने हेतु पटना जाने तथा मधेपुरा जिला से जीते हुए महागठबंधन के विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल किये जाने के बाबत पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मुझे यह सूट नहीं करता है क्योंकि 2010 के 27 नवम्बर को पटना गाँधी मैदान के शपथ-ग्रहण समारोह से लौटते ही मुझे दो बार वॉयपास सर्जरी से गुजरना पड़ा था | मैं मधेपुरा अबतक के माध्यम से ही सभी राजनेताओं को शुभकामनाएं अर्पित करता हूँ | साथ ही इस जिले से तीन मंत्रियों द्वारा शपथ लेने की कामना करता हूँ | वे तीन होंगे- श्री नरेन्द्र नारायण यादव जद(यू), तीन बार विधायक बनने वाले जद(यू) के दलित कोटा से प्रो.रमेश ऋषिदेव एवं सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाले राजद से दो बार विधायक बनने वाले प्रो.चन्द्रशेखर |

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मधेपुरा के जयपालपट्टी चौक के रौशन कुमार हुए पुरस्कृत

यदि समाज में रहनेवाला हर एक सचेतन व्यक्ति अपने इर्द-गिर्द बसने या रहनेवाले किसी भी धर्म या सम्प्रदाय के कम-से-कम एक भी व्यक्ति को साक्षर करने या फिर सत्य एवं शुचिता के पथ से भटक रहे एक भी युवा को सुधारने में किसी भी रूप में अपना कुछ भी न्योछावर करता है या लोकहित में महज एक दीप जलाकर उसे अँधेरे से मुक्ति दिलाता है- तो उसकी चर्चा अवश्य होनी चाहिए |

ऐसे ही सचेतन व्यक्तियों में एक है- साहुगढ़ गाँव के सिहपुर टोले का भूतपूर्व सैनिक- दिलीप यादव | वही दिलीप जो बी.एस.एफ.का जवान बनकर कश्मीर से कन्याकुमारी और राजस्थान से बंगाल की खाड़ी तक सीमा-सुरक्षा के साथ-साथ नक्सलियों से टकराता रहा और बहादुरी का पुरस्कार पाता रहा |

सेवानिवृति के बाद वह सैनिक  Madhepura  के बी.पी.मंडल पथ (जयपालपट्टी चौक) पर जब विगत दीपावली के दिन “श्री राधा कृष्ण स्वीट्स कार्नर” का श्री गणेश करता है तो कुछ लोग उन्हें यह कहकर डराते हैं कि यहाँ की आवोहवा आपको ना तो टिकने देगा……ना जीने देगा |  लेकिन वह सैनिक डरने के बजाय आवोहवा को बदलने की सोचने लगता है | और धीरे-धीरे वह हवा में यह मेसेज देने लगता है कि दुकान के वार्षिकोत्सव के दिन जयपालपट्टी चौक के इर्द-गिर्द रहने वाले शांत-सुशील….एवं व्यवहारकुशल युवा को पुरस्कृत किया जाएगा | इस आशय का अच्छा असर देखा गया |

और आज पुन: दीपावली के दिन इसी जयपालपट्टी चौक के एक युवा रौशन कुमार, जो फोटोस्टेट आदि ठीक-ठाक करता है और चलाता भी है, के कुशल व्यवहार एवं सहयोगी विचार को एक वर्ष से आंकते रहने के बाद वही सैनिक  Madhepura  के प्रखर समाजसेवी व साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी के हाथों रौशन कुमार को पुरस्कृत कराकर सर्वाधिक प्रसन्नता का अनुभव कर रहा है | इस सादे पुरस्कार वितरण समारोह में मुख्यरूप से सम्मिलित हुए हैं- जिला कांग्रेस आई. के अद्यक्ष सत्येन्द्र कुमार सिंह, प्रवीण कुमार उर्फ पारो जी, वार्ड पार्षद ध्यानी यादव, डॉ.कामेश्वर कुमार, प्रो.चन्द्रशेखर प्रसाद, फर्जी हास्य कवि डॉ.अरुण कुमार आदि |

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मधेपुरा के डॉ.असीम प्रकाश कलकत्ता में हुए सम्मानित …..!

शहर की चमचमाती रोशनी में ही केवल प्रतिभा नहीं चमकती बल्कि गाँवों की गलियों के अंधेरे में भी प्रतिभा अपनी रोशनी बिखेरती है | तभी तो मुरलीगंज प्रखंड के जीतापुर गांव से सटे द्वारिका टोला के आदर्श दंपति श्रीमती अनिता-डॉ.जयप्रकाश के घर जन्मे डॉ. असीम प्रकाश कोलकाता में आयोजित दो दिवसीय (31Oct – 1Nov) ऑल इंडिया एशोसिएशन ऑफ़ ग्रस्ट्रालॉजी– 2015 के कांन्फ्रेंस में आमंत्रित किये गये |

डॉ.असीम प्रकाश ने Madhepura अबतक को बताया कि इस दो दिवसीय गेस्टोकान सम्मलेन में देश-विदेश से लगभग 500 डॉक्टर भाग लेने आये थे जिसमें गेस्ट्रोइनटेसटाइन एंड लीवर डिजीज पर विस्तार से चर्चाएँ हुईं | एम.बी.बी.एस एवं एम.डी. की डिग्री के अतिरिक्त रूस और अमेरिका से डिग्रीयाँ प्राप्त करनेवाले डॉ.असीम भला किससे पीछे रहने वाले थे | कानफ्रेंस के एकेडेमिक सेशन में हेपेटाइटिस पर सर्वोत्कृष्ट व्याख्यान देने के उपलक्ष्य में डॉ.प्रकाश को प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया | इस धरती पुत्र डॉ.असीम के इस सम्मान से Madhepura  ही नहीं सम्पूर्ण बिहार सम्मानित एवं गौरवान्वित हुआ है |

मॉडर्न एप्रोच टू हेपेटाइटिस बी पर विचार व्यक्त करते हुए ख्यातिप्राप्त डॉ.विजय प्रकाश के सहयोगी डॉ.असीम प्रकाश ने कहा- यह बीमारी एड्स से भी अधिक खतरनाक है | इसके भयावह फैलाव का अंदाजा तो इसी से लगाया जा सकता है कि हर बीस लोगों में से एक इसी बीमारी की चपेट में है | उन्होंने कहा कि इस बीमारी का लम्बा इलाज है जिसे पूर्णत: ठीक होने में लगभग पाँच साल तक लग सकता है |

अन्त में अपनी नवविवाहिता डॉक्टर धर्मपत्नी डॉ.नेहा की उपस्थिति में डॉ.असीम प्रकाश ने मधेपुरा ( Madhepura ) अबतक से कहा कि लोग इस बीमारी के बारे में अभी भी अनभिज्ञ हैं | लोगों को पूरी तरह सजग करने की जरुरत है | जागरूक करने के बाबत उन्होंने लोगों से इस बीमारी के मूल कारणों को यूँ गिनाया- गलत निडिल का प्रयोग, संक्रमित ब्लड चढ़ाना एवं असुरक्षित प्रसव के साथ-साथ संक्रमित लोगों से यौन सम्बन्ध बनाना आदि | डॉ.असीम प्रकाश ने पुरुष से अधिक महिलाओं पर इस बीमारी के खतरे की चर्चा की और यह भी कहा कि अब छोटे-छोटे शहरों में भी इस बीमारी का फैलाव तेजी से होने लगा है |

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महागठबंधन की बड़ी जीत और भाजपा की बड़ी हार के पाँच बड़े कारण

इधर बिहार में महागठबंधन की महाजीत का महाजश्न हो रहा है, उधर भयभीत भाजपा में भूचाल आया हुआ है। महागठबंधन की जीत और भाजपा की हार के कारण ढूँढ़े जा रहे हैं। हर चुनाव में हारने वाली पार्टी अपने हारने और अपने प्रतिद्वंद्वी के जीतने का कारण ढूँढ़ती है और ढूँढ़ना चाहिए भी। इसीलिए भाजपा के ऐसा करने में कुछ नया नहीं है। नया इस बात में है कि सारे कारण बीच चुनाव में दिख गए थे लेकिन भाजपा देख नहीं पाई। गांव-गली की गंवई जनता ने जो देख लिया उसे भाजपा के ‘हाईटेक’ रणनीतिकार देखने से चूक गए। वे भूल गए कि लाख संचार-क्रांति हो जाए तब भी चुनाव के मैदान में आपका हाथ ‘माउस’ से ज्यादा जनता की नब्ज पर होना चाहिए। तो चलिए कारणों की ‘भीड़’ से निकाल कर पाँच बड़े कारणों को देखें।

  1. ‘विकास’ में ‘सामाजिक न्याय’ का तड़का

वर्षों की दूरी और तमाम मतभेदों को किनारे कर जिस दिन नीतीश और लालू एक साथ आए उसी दिन उन्होंने आधी लड़ाई जीत ली थी। वक्त की नजाकत देख जेपी के दोनों शिष्यों ने ना केवल कांग्रेस से हाथ मिलाया बल्कि अंत तक निभाया। समूचा एनडीए पूरे चुनाव में महागठबंधन को ‘महास्वार्थबंधन’, ‘महालठबंधन’ और ना जाने क्या-क्या कहता रहा लेकिन जनता की नज़र में ये परफेक्ट कम्बिनेशन साबित हुआ। जिसमें एक ओर नीतीश की ‘विकासपुरुष’ की निर्विवाद छवि थी तो दूसरी ओर लालू के ‘सामाजिक न्याय’ का मजबूत आधार। नीतीश और लालू के एक साथ आने से इस सामाजिक न्याय को 25 साल पहले वाली ‘धार’ मिल गई। ये केवल ‘माय’ तक सीमित नहीं रहा।

यही नहीं, मात्र 41 सीटों पर लड़ रही कांग्रेस ने भी महागठबंधन में बड़ी भूमिका निभाई जिसे नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के साथ आने से ना केवल उसके राष्ट्रीय ‘कैनवास’ का सांकेतिक जुड़ाव महागठबंधन से हुआ बल्कि अगड़ी जातियों में भी थोड़ी-बहुत सेंधमारी करने में महागठबंधन को सफलता मिली।

  1. नीतीश का ‘चेहरा’ और तगड़ा टीमवर्क

नेताओं की बड़ी फौज के बावजूद मुख्यमंत्री पद के लिए एक अदद चेहरा ना ढूँढ़ पाना एनडीए की बड़ी कमजोरी साबित हुई। इस मामले में भाजपा का रवैया जरूरत से ज्यादा ‘डिफेंसिव’ रहा। उधर नीतीश कुमार का तपा-तपाया, हर तरह से आजमाया और सर्वमान्य ‘चेहरा’ था। नीतीश को नेता मानने और हर मंच से उन्हें अपना मुख्यमंत्री बताने में लालू ने सचमुच बड़े भाई जैसी ‘उदारता’ दिखाई। सोनिया और राहुल ने भी अपने भाषणों में नीतीश के नाम और काम को आगे रखा। टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव-प्रचार और पाँचों चरणों के मतदान तक कहीं भी महागठबंधन के टीमवर्क में कमी नहीं दिखी। जबकि एनडीए में ‘टीमवर्क’ नाम की चीज थी ही नहीं। टिकट में हिस्सेदारी को लेकर शुरू हुए पासवान, मांझी और कुशवाहा के आपसी मतभेद और खींचातानी ने अंतत: भाजपा की लुटिया डुबो दी।

सच तो ये है कि अपने साथियों को भाजपा ने उनकी ‘औकात’ से ज्यादा सीटें दीं। इससे उसकी अन्दरूनी कमजोरी दिखी। यही नहीं, आम जनता ने ये समझने में भी देर नहीं की कि पप्पू यादव भाजपा के द्वारा ‘स्पांसर्ड’ हैं, मुलायम सिंह के अचानक मुलायम पड़ने के पीछे स्पष्ट ‘डील’ है और ओवैसी का बिहार में अचानक कूद पड़ना भी ‘अकारण’ नहीं है।

  1. मोदी का ‘बड़े’ मंच से ‘छोटा’ व्यवहार

नरेन्द्र मोदी ने अपनी पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने से प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने तक और उसके बाद अपनी एक के बाद एक विदेश यात्राओं से दुनिया भर में जो सुर्खियां और तालियां बटोरीं और अपने कद में इजाफा किया उसे एकदम से दांव पर लगाने बिहार आ गए। वो नीतीश को हर मंच से अहंकारी कहते रहे लेकिन असल में अहंकार उनके बॉडी लैंग्वेज में था जिसे बिहार की जनता बहुत गहरे जाकर देख रही थी। उनके हाव-भाव से स्पष्ट दिख रहा था कि जिस नीतीश ने कभी प्रधानमंत्री पद के लिए मुझे चुनौती दी थी उसे मैं मुख्यमंत्री भी नहीं रहने दूंगा। उन्होंने बिहार चुनाव को इस कदर ‘पर्सनलाइज’ कर दिया कि भाजपा और एनडीए की जगह केवल वही दिख रहे थे। ये सचमुच दिखने की ‘अति’ थी। एक प्रधानमंत्री का और उसमें भी उनके कद के प्रधानमंत्री का एक राज्य के चुनाव लिए 26 रैलियां करना मन में कई तरह के सवाल खड़े करता है।

खैर, बात रैलियों तक रहती तो एक बात थी। रैलियों में उनका भाषण वो नहीं था जिसके लिए वो जाने जाते हैं। भाषण की भाषा और शैली तो हरगिज शोभा देने वाली नहीं थी। सबसे पहले उन्होंने नीतीश का ‘डीएनए’ खराब होने की बात कहकर और मुसीबत मोल लेने की शुरुआत कर दी। इसके बाद उन्होंने सवा लाख करोड़ का पैकेज दिया लेकिन जिस तरह से बोली लगा कर दिया उसने उनका और उस पैकेज दोनों का वजन कम कर दिया। इसी तरह राजद को बार-बार “रोजाना जंगलराज का डर” और जदयू को “जनता का दमन और उत्पीड़न” कहकर उन्होंने ‘हल्कापन’ दिखाया और अंतत: जनता का एक बड़ा ‘अस्वीकार’ उन्हें झेलना पड़ा। लोक -‘तांत्रिक’ वाली बात भी लोगों को हजम नहीं हुई। और हाँ, इन सबके बरक्स नीतीश ने अपने ‘संयम’ और ‘शालीनता’ से बिहार और बिहार के बाहर भी लोगों के दिल और दिमाग में जगह बनाई।

  1. आरक्षण, बीफ और पाकिस्तान में पटाखे

ऊपर के तीन कारण ही भाजपा की हार के लिए कम नहीं थे। जो कसर रही वो बीच चुनाव में मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा वाले बयान, गिरिराज सिंह जैसे नेताओं का बेवजह ‘बीफ’ को मुद्दा बनाने और अंत में अमित शाह के “महागठबंधन के जीतने पर पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे” वाले बयान ने पूरी कर दी। इन नकारात्मक मुद्दों को बिहार की परिपक्व जनता ने खारिज कर पूरे देश में एक बड़ा मैसेज दिया। नीतीश और लालू ने इन मुद्दों से हवा को अपने पक्ष में करने में कोई चूक नहीं की। एनडीए जहाँ इन अनर्गल मुद्दों पर आक्रामक होने का ‘स्वांग’ करने में उलझा रहा वहीं महागठबंधन इन सबका जवाब देने के साथ-साथ ‘नीतीश के सात निश्चय’ को भी जनता के बीच पहुँचाने में सफल रहा। एनडीए की लाख कोशिशों के बावजूद लोगों के मन में ‘जंगलराज’ का डर तो नहीं बैठा लेकिन लालू वोटरों में ये डर बिठाने में कामयाब रहे कि बीजेपी को सत्ता दोगे तो आरक्षण छिन जाएगा।

  1. अगड़ों की ‘आग’ से पिछड़ों का पिघलना

भाजपा ने बड़ी रणनीति के तहत रामविलास पासवान, जीतनराम मांझी, उपेन्द्र कुशवाहा, रामकृपाल यादव, भूपेन्द्र यादव, मुकेश सहनी जैसे प्रतीकों को खड़ा किया। उसे उम्मीद थी कि ऐसा कर वो दलित-महादलित और पिछड़े-अतिपिछड़े वोटों में बड़ी सेंधमारी कर पाएगी। और तो और प्रधानमंत्री को पहले पिछड़ा और फिर अतिपिछड़ा बताने की कोशिश भी की गई। लेकिन इन तमाम कोशिशों पर भाजपा के ‘अगड़े’ नेताओं का नीतीश-लालू के खिलाफ उग्र से उग्रतर होते जाना और ‘अपशब्दों’ का धड़ल्ले से प्रयोग करना भारी पड़ गया। अगड़ों ने आग क्या उगली, पिछड़े पिघलकर महागठबंधन से जा मिले।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लालू एवं नीतीश कुमार को बधाइयों का ताँता ……!!

बिहार में अगले पाँच साल ! केवल और केवल नीतीश कुमार !! ऐसी अदभुत जीत के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित महागठबंधन के सभी विजेताओं को डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी की कोटि-कोटि हार्दिक बधाई !

इस नतीजे का सही अर्थ बिहार के अन्दर और बाहर के लोगों की समझ में यही आया है कि ये सिर्फ और सिर्फ विकास,सुशासन और साम्प्रदायिक सदभाव की जीत है – केवल कहने के लिए है कि भाजपा का अहंकार ही उसे खा गया |

यह सार्वभौमिक सत्य है कि यदि कोई राजनेता सृजन के कार्यों में ध्यानमग्न होकर उसकी गहराइयों में पूर्णरूपेण उतरने लगता है तो उस विशेष कालावधि के लिए उसकी सारी ऊर्जा जनहित की योजनाओं को धरती पर उतारने में समाहित होने लगती है और वही राजनेता अहंकारमुक्त होने लगता है |

राजनीति के फिसलन भरे रास्ते पर बिना फिसले चलते रहना उतना ही कठिन है जितना तेज धारवाली नंगी तलवार पर नंगे पैर चलना कठिन है | फिरभी वैसे कठिन रास्ते पर चलकर “ बिहार के स्वाभिमान” और “ माय समीकरण” के उत्साह को चर्मोत्कर्ष पर पहुँचाकर बिहार वासियों के दिल को जीतने के लिए राजनेता द्वय नीतीश-लालू सहित पूरी टीम को हार्दिक बधाई |

नीतीश जी ! आप बिहार की राजनीति को अगले पाँच वर्षो तक नित्य नया संस्कार देते रहेंगे ताकि किसी अपनों को भी छठे वर्ष यह कहने का कोई अवसर ना मिले कि ‘आप’ को भी अहंकार छू गया बल्कि बिहार की सुशासनप्रिय तथा सांप्रदायिक सदभाव में विश्वास करने वाली विकासोन्मुखी जनता सहित राष्ट्रीय पार्टियों के अध्यक्ष – शरद यादव, लालू प्रसाद, सोनिया गाँधी….. यहाँ तक कि मुलायम सिंह यादव भी सम्मिलित रूप से यही कहने लगे…. और कहते रहे कि –

इस चन्द्रगुप्त की गद्दी पर
बैठो नीतीश तुम बार-बार !
इस बिहार की लोकभूमि पर
आना नीतीश तुम बार-बार !!

– डॉ.मधेपुरी की कलम से……

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मोदी-शाह की करारी हार, नीतीश-लालू का हुआ बिहार

बिहार में लालू-नीतीश की जोड़ी मोदी और शाह पर बहुत भारी पड़ी। चुनाव में ना मोदी का भाषण काम आया, ना शाह का मैनेजमेंट। प्रधानमंत्री ने चुनाव को “केन्द्र बनाम बिहार” बनाया, पूरे कैबिनेट को प्रचार में झोंका, अपने कद तक को दांव पर लगा दिया लेकिन हाथ कुछ ना आया। एनडीए को जैसी हार और महागठबंधन को जैसी जीत मिली उससे तमाम सर्वे और एग्जिट पोल धाराशायी हो गए।

बिहार चुनाव में महागठबंधन अत्यन्त भव्य और ऐतिहासिक जीत दर्ज करने जा रही है। उसे 243 में से 178 सीटें मिलने जा रही है। एनडीए महज 59 सीटों पर सिमटती दिख रही है। 80 सीटों के साथ राजद सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है और इस तरह अपने राजनीतिक जीवन की निर्णायक लड़ाई लालू प्रसाद यादव ने बड़े शान से जीती है। ‘चेहरा’ और ‘सेहरा’ नीतीश कुमार का रहा लेकिन ‘मैन ऑफ द मैच’ लालू रहे, इसमें कोई दो राय नहीं।

भाजपा और उसके तमाम सहयोगी दलों ने पूरे चुनाव में नीतीश पर सबसे अधिक तंज इस बात के लिए कसा कि उन्होंने लालू और कांग्रेस (खासकर लालू) के साथ गठबंधन किया। नीतीश के घोर समर्थक भी दबी जुबान से कहते रहे कि लालू के साथ खड़ा होना उनकी राजनीतिक सेहत के लिए ठीक नहीं। उन्हें अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ना चाहिए था। लेकिन बिहार की जनता ने जिस तरह अपने मत से महागठबंधन को निहाल किया है उससे तमाम आलोचक बस बगलें झाँक रहे हैं।

लालू, नीतीश और कांग्रेस ने टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव-प्रचार तक बहुत समझदारी से काम लिया। एनडीए एक ओर मोदी के ‘आभामंडल’ से उपजे अतिआत्मविश्वास का शिकार हुआ तो दूसरी ओर सहयोगी दलों की खींचातानी में उलझा रहा। उधर महागठबंधन ने एक-एक कदम बड़ी सावधानी से रखा और लगातार ‘टीमवर्क’ किया। जेडीयू ने अपनी वो सीटें उदारता से कुर्बान कीं जिन पर राजद और कांग्रेस भाजपा से ज्यादा बेहतर लोहा ले सकती थीं। इसका लाभ सामने है। आज भले ही जेडीयू की अपनी सीटें कम हो गई हों लेकिन नीतीश की मुहर महागठबंधन की सारी 179 सीटों पर लगी हुई है।

2010 में जेडीयू की 115, राजद की 22 और कांग्रेस की 4 सीटें थीं। इस बार जेडीयू को 71, राजद को 80 और कांग्रेस को 27 सीटें मिल रही हैं। लालू-नीतीश का साथ पाकर मुरझायी कांग्रेस में एक बार फिर जान आ गई। एनडीए की बात करें तो भाजपा और उसके तमाम सहयोगी दल मिलकर भी अकेले लालू या अकेले नीतीश से पीछे हैं। भाजपा को छोड़ दें तो पासवान, मांझी और कुशवाहा की सीटें मिलाकर भी कल तक ‘बेचारी’ कही जाने वाली कांग्रेस तक से चौथाई से भी कम रह गई है। पिछली बार नीतीश के साथ भाजपा को 91 सीटें मिली थीं। इस बार उसका खाता 53 पर बन्द हो रहा है। लोजपा को 3, रालोसपा को 2 और हम को महज 1 सीट मिल रही हैं। पिछली बार भी लोजपा को 3 ही सीटें मिली थीं। हम और रालोसपा तब अस्तित्व में नहीं थीं। अन्य के खाते में 6 सीटें जाती दिख रही हैं। पूरा परिणाम आने पर ये सीटें हो सकता है और कम रह जाएं।

कोसी की बात करें तो यहाँ की 13 में से 12 सीटों पर महागठबंधन का कब्जा होने जा रहा है। आलगनगर से नरेन्द्र नारायण यादव, सुपौल से बिजेन्द्र प्रसाद यादव, सिमरी बख्तियारपुर से दिनेश चन्द्र यादव जीत का परचम फहरा रहे हैं। एनडीए की ओर से बस नीरज कुमार बबलू (छातापुर) ही मैदान में टिक पाए हैं। कोसी या सीमांचल में पप्पू फैक्टर की चर्चा पूरे चुनाव के दौरान रही। दावा तो पप्पू पूरे बिहार पर कर रहे थे। लेकिन उनके तमाम उम्मीदवार महागठबंधन के झोंके में उड़ गए। ज्यादातर सीटों पर उनके उम्मीदवार हजार का आंकड़ा छूने को भी तरस गए। महागठबंधन का साथ बीच राह में छोड़ने वाले मुलायम भी पूरे परिदृश्य से जैसे अदृश्य हो गए।

कुल मिलाकर ये कि बिहार ने केन्द्र के लिए भले ही नरेन्द्र मोदी को चुना हो लेकिन बिहार के लिए उसका ऐतबार अभी भी नीतीश कुमार पर है। ‘विकासपुरुष’ के काम को लोगों ने सम्मान दिया। ये साफ हो गया कि मतदान में महिलाओं की लम्बी कतार नीतीश के लिए थी। महादलितों ने भी मांझी से अधिक नीतीश को तरजीह दी। कमोबेश सभी जातियों के वोट महागठबंधन को मिले। मुस्लिम पूरी तरह उसके पक्ष में एकजुट रहे।

पूरे चुनाव में नीतीश ने जो शालीनता बरती उससे उनका कद राष्ट्रीय स्तर पर और बढ़ा है। लालू ने भी अपना खोया आत्मविश्वास इस चुनाव से हासिल किया है। कांग्रेस को भविष्य की राजनीति का सूत्र मिल गया। एनडीए के लिए अब बंगाल और उत्तर प्रदेश की डगर बहुत मुश्किल हो गई। मोदी और उनकी ‘अति आक्रामक’ टीम को अब समझना पड़ेगा कि सभाओं में भीड़ जुटना और भीड़ का वोट में तब्दील होना अलग-अलग बात है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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