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बाबा विशुराउत मेले को राजकीय दर्जा मिलने पर जश्न का माहौल

मधेपुरा के डायनेमिक डीएम मो.सोहैल (भा.प्र.से.) ने सर्वाधिक प्रसन्नता व्यक्त करते हुए मधेपुरा अबतक को बताया कि जिले के चौसा प्रखंड मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित बाबा विशुराउत मंदिर में प्रतिवर्ष 13 अप्रैल से लगनेवाले तीन दिवसीय मेला को राज्य सरकार द्वारा राजकीय दर्जा दिया जाने वाला पत्र प्राप्त हो गया है | उन्होंने इसे बड़ी उपलब्धि करार देते हुए कहा कि नीतीश सरकार के माननीय मंत्री राम नारायण मंडल, राजस्व व भूमि सुधार विभाग के विशेष सचिव प्रवीण कुमार झा द्वारा हस्ताक्षरित अधिसूचना ज्ञापांक- 898(8)-01 नवंबर, 2017 के तहत इस मेले को राजकीय मेला अधिसूचित करते हुए बिहार राज्य मेला प्राधिकार के प्रबंधन में दे दिया गया है |

बता दें कि मधेपुरा जिला अंतर्गत चौसा प्रखंड के पचरासी बथान में गोपालक लोक देवता के रूप में बाबा विशुराउत की पूजा-अर्चना नियम व निष्ठा के साथ शुरू दुग्धाभिषेक द्वारा की जाती रही है | पचरासी बथान स्थित उनकी समाधि पर प्रत्येक सोमवार और शुक्रवार को विशेष श्रृंगार पूजा होती है | साथ ही बाबा विशुराउत की समाधि पर इतनी मात्रा में श्रद्धालुओं द्वारा दूध चढ़ाया जाता है कि आस-पास में दूध की नदी बहने लगती है | यूँ तो विशु बाबा की महिमा अपरंपार है और विशेषता यह है कि चाहे जितनी भी दूरी से श्रद्धालुगण कच्चा दूध लेकर आते हैं- वह दूध ना तो फटता है और ना खराब होता है |

Devotees offering Raw Milk at Baba Vishuraut Temple.
Devotees offering Raw Milk at Baba Vishuraut Temple.

यह भी जानिए कि बाबा विशु के नाम से चौसा में एक महाविद्यालय की स्थापना स्थानीय श्रद्धालुओं द्वारा की गई है तथा कोसी नदी पर विशाल सेतु भी बना है | आलमनगर विधानसभा क्षेत्र के श्रमशील जनता एवं वर्तमान विधायक सह राजस्व भूमि सुधार सहित कई विभागों के मंत्री रह चुके नरेन्द्र नारायण यादव के आसपास आज जश्न का माहौल है क्योंकि यहाँ के लोग वर्षो से बाबा विशुराउत मेला को राजकीय दर्जा देने की मांग कर रहे थे | आज बिहार सरकार द्वारा एक ओर जहाँ विशुराउत मेला को और वहीं दूसरी ओर आस्था का महापर्व छठ पूजा के दौरान आयोजित होने वाले ‘देव मेला’ को भी राजकीय दर्जा दिये जाने पर संपूर्ण बिहार में ही हर्ष व्याप्त है |

Md.Sohail (IAS), Madhepura
Md.Sohail (IAS), Madhepura .

चलते-चलते यह भी बता दें कि बाबा विशुराउत की समाधि पर बिहार के अनेक विधायक, मंत्री, सांसद एवं कई मुख्यमंत्री व राष्ट्रीय स्तर के नेतागण का आना-जाना लगा ही रहता है जिन्हें आज बेहद खुशी होती होगी | साथ ही आकाश से निरखते हुए शुभाशीष अर्पित कर रहे होंगे यहाँ के प्रथम विधायक तनुक लाल मंडल, विद्याकर कवि एवं वीरेंद्र प्रसाद सिंह आदि भी………| इलाके के पशुपालकों में उत्साह व उमंग को देखकर स्थानीय बुद्धिजीवियों- सूर्यकुमार पटवे, डॉ.अंबिका प्रसाद गुप्ता, रघुनंदन यादव, मुर्शीद आलम, बैजनाथ साह, निवास चन्द, मुन्ना यादव, जीवन शर्मा, सुबोध सिंह……… आदि ने इस मेला को राजकीय मेला घोषित किये जाने पर ईश्वर से यही कहा कि अब मेला के साथ इस इलाके में भी विकास का नया आयाम खुलेगा |

मधेपुरा अबतक द्वारा जब सिंहेश्वर टेंपल ट्रस्ट के सदस्य सुप्रसिद्ध समाजसेवी-शिक्षाविद डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी से टिप्पणी करने को कहा गया तो डॉ.मधेपुरी ने कहा कि बिहार में सोनपुर के बाद एक महीने तक चलने वाला सिंहेश्वर मेला को जल्द ही राजकीय दर्जा मिलेगा क्योंकि इसे नीतीश सरकार द्वारा “महोत्सव” की स्वीकृति तो दे ही दी गई है…… अब डीएम मो.सोहैल द्वारा राजकीय दर्जा देने हेतु लिखे गए पत्रादि के प्रयास को शीघ्रातिशीघ्र सफलता मिलेगी ही मिलेगी……. तब सिंहेश्वर के श्रद्धालु जमकर जश्न मनायेंगे |

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सामा-चकेवा भाई-बहन के अतिरिक्त पक्षियों से भी जुड़ा त्योहार है

छठ पर्व संपन्न होने के साथ ही मिथिला-कोसी का यह लोकपर्व सामा-चकेवा शुरू हो जाता है | मिथिलांचल में यह पर्व उत्सव के रूप में मनाया जाता है | 8 दिनों का यह त्योहार भाई-बहन के बीच के अटूट प्रेम को दर्शाता है जिसका वर्णन पुराणों में भी मिलता है | सामा-चकेवा से जुड़ी लोकगीत- “चुगला करे चुगली बिलैया करे म्याऊं……….. गाम के अधिकारी हमर बड़का भैया हो……. कई दिनों तक घर-आंगन में गूंजते रहते हैं | ज्ञातव्य हो कि मिथिलांचल में मवेशियों का त्योहार तो मनाया ही जाता है, पक्षियों के लिए भी त्योहार है जिसे ‘सामा-चकेवा’ के नाम से जाना जाता है |

बता दें कि लोक कथाओं के अनुसार ‘सामा’ कृष्ण की पुत्री थी | कुछ चुगलों द्वारा आरोप लगाने के कारण मथुरा के राजा भगवान कृष्ण ने क्रोधित होकर उसे मनुष्य से पक्षी बन जाने की सजा सुना दी | परंतु अपने भाई सांभ की भक्ति के कारण, ‘चकेवा’ के त्याग के साथ-साथ अटूट एवं निश्छल प्रेम होने के कारण ‘सामा’ पुनः पक्षी से मनुष्य के रूप में आ जाती है | तब से सामा-चकेवा पर्व मनाने वाली लड़कियां कार्तिक पूर्णिमा की रात में चुगला के मुंह में आग लगाकर जलाती है और विसर्जित करती है | ग्रामीण इलाके में आज भी यह पर्व उत्साह पूर्वक मनाया जाता है | महापर्व छठ की समाप्ति के साथ ही बहनें अपने भाइयों की सलामती के लिए कार्तिक पूर्णिमा तक प्रत्येक दिन इस खेल का आयोजन करती हैं |

Sama Chakeva celebration in Mithila.
Sama Chakeva celebration in Mithila.

यह भी बता दें कि भाई-बहन के बीच का प्रेम व त्याग लोकगीतों के माध्यम से भैयादूज से शुरु होकर कार्तिक पूर्णिमा की देर रात तक में संपन्न होता है | पूर्णिमा की रात को महिलाएं सहेलियों की टोली बनाकर सामा से सजे डाले को कंधे या सिर पर ले-लेकर गीत गाते हुए सामा खेलती है | चकेवा व चुगला सहित मिट्टी की बनाई गई विभिन्न पक्षियों की मूर्तियों को डाले में सजाकर निकट के तालाब में या जोते हुए खेतों में विसर्जित कर आती हैं |

जानकारों के अनुसार सामा-चकेवा के बाद कोसी-मिथिलांचल में आते हैं प्रवासी पक्षीगण- जिन्हें यहाँ के लोग अधंगा….. लालसर…… सुर्खाब…… नकटा….. हसुआ आदि नामों से जानते हैं | मिथिलांचल में मेहमानों की तरह इन पंक्षियों का स्वागत होना चाहिए, परंतु ऐसा होता नहीं………| लोगों द्वारा लगातार इनके शिकार होने के चलते इन पक्षियों की तादाद में सर्वाधिक कमी आती जा रही है |

चलते-चलते बता दें कि जहाँ पहले महिलाएं अपने हाथों से मिट्टी के सामा-चकेवा एवं विभिन्न पक्षियों की मूर्तियां बनाती थी और विभिन्न रंगों से सजाती थी वहीं अब बाजार में बिक रहे रंग-बिरंगे मिट्टी से बनी हुई रेडीमेड ‘सामा-चकेवा’ आदि खरीद लाती हैं | संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार की मानसिकता में सर्वाधिक वृद्धि होने के कारण आये दिनों लोग इस पर्व से दूर होते जा रहे हैं |

फिर भी मिथिलांचल की कुछ बेटियाँ आज कार्तिक पूर्णिमा के दिन सामा खेलने अपने ससुरालों से मायके अवश्य आयेंगी और नम आँखों से भावपूर्ण समदाउन गीतों के बीच अपने-अपने भाइयों को खुद से ठेकुआ, मुढ़ी, भुसवा……  खिलायेंगी……. परंपरा जीवित रहेगी, तभी ‘प्रेम’ अमर रहेगा !

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मधेपुरा में महाकवि विद्यापति की जयन्ती मनी

कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन संस्थान के अंबिका सभागार में वरिष्ठ साहित्यकार-इतिहासकार हरिशंकर श्रीवास्तव शलभ की अध्यक्षता में मैथिल कोकिल महाकवि विद्यापति की भावभीनी जयन्ती मनाई गई, जिसमें टी.पी.कॉलेज के मैथिली विभागाध्यक्ष एवं हिन्दी-मैथिली में “लोक जीवन में संस्कार गीतक महत्व” के रचनाकार डॉ.अमोल राय द्वारा- भक्ति, सौंदर्य एवं प्रेम के महान गायक विद्यापति पर मनभावन आलेख का पाठ किया गया |

इस अवसर पर जहाँ तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के पूर्व प्रतिकुलपति डॉ.के.के.मंडल ने डॉ.अमोल राय के आलेख की भरपूर प्रशंसा की तथा आशीर्वचन देते हुए कहा कि उनकी इस रचना पर BHU में शोधकार्य की भूमिका तैयार हो रही है….. वहीं सम्मेलन के सचिव डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी ने बीएनएमयू के सी.सी.डी.सी. रह चुके डॉ.अमोल राय को अंगवस्त्रम-पाग-बुके आदि से सम्मानित करते हुए महाकवि विद्यापति की शिवभक्ति पर कई मार्मिक प्रसंगों की चर्चाएं की | चर्चा को बढ़ाते हुए विदुषी डॉ.शांति यादव ने डॉ.राय के आलेख पाठ की विस्तृत चर्चा एवं सराहना करते हुए कहा कि महाकवि विद्यापति का यश अंतर्राष्ट्रीय सीमा को पार कर चुका है | इनके गीत बिहार, बंगाल, उड़ीसा………. आदि में ही नहीं बल्कि नेपाल, फीजी, मॉरिशस……. आदि देशों में रहनेवाले भारतीय मूल के लोग नित्यप्रति गाया करते हैं | इसी कड़ी में डॉ.विनय कुमार चौधरी, प्रो.शचीन्द्र महतो, प्रो.मणिभूषण, त्रिवेणीगंज से आये सुरेन्द्र भारती आदि ने भी अपने-अपने विचार व्यक्त किये |

Kaushiki Kshetra Hindi Sahitya Sammelan Sachiv Dr.Madhepuri felicitating Dr.Amol Rai with Angbastram-Bouquet-Paag at Ambika Sahitya Sabhagar, Madhepura.
Kaushiki Kshetra Hindi Sahitya Sammelan Sachiv Dr.Madhepuri felicitating Dr.Amol Rai with Angbastram-Bouquet-Paag at Ambika Sahitya Sabhagar, Madhepura.

अध्यक्षीय उद्बोधन में साहित्यकार शलभ ने कहा कि विद्यापति आदिकाल और वीरगाथा काल के प्रतिनिधि कवि थे | उन्होंने संस्कृत, अबहट और हिंदी साहित्य के आदिकाल पर वृहद प्रकाश डालते हुए कहा कि विद्यापति ने जहाँ आदिकाल के लिए ‘कीर्तिलता’, ‘कीर्तिपताका’ की रचना की वहीं भक्तिकाल के लिए ‘पदावली’ के अनेक भक्ति गीतों की, जहाँ उन्होंने रीतिकाल के लिए राधाकृष्ण के प्रेम-श्रृंगार के पद रचे वहीं आधुनिक काल के लिए उनकी सारी रचनाएं समीचीन हैं | कवि शलभ ने यहाँ तक कह डाला कि विद्यापति में संपूर्ण मिथिला की सांस्कृतिक विरासत सन्निहित है, जीवित है…….|

आयोजन के दूसरे सत्र में सुकवि तारानन्दन तरुण एवं गजलकार वसंत की स्मृति में कविगोष्ठी का सफल संचालन किया डॉ.विनय कुमार चौधरी ने और अपनी एक-एक प्रतिनिधि कविता का पाठ किया- डॉ.शांति यादव, सुरेन्द्र भारती (त्रिवेणीगंज), सम्मेलन के सचिव डॉ.मधेपुरी, अभिनंदन मंडल, आशीष मिश्रा, राकेश कुमार ‘द्विजराज’, संतोष सिन्हा, राजू भैया, मणिभूषण वर्मा, डॉ.आलोक कुमार, दशरथ प्रसाद सिंह ‘कुलिश’, डॉ.अरुण कुमार, सियाराम यादव ‘मयंक’, उल्लास मुखर्जी…….. आदि | सुधि श्रोता के रूप में भोला प्रसाद सिन्हा, बलभद्र यादव, प्राण मोहन, शिवजी साह, पारोजी, रघुनाथ प्रसाद यादव, तारा शरण……… आदि अंत तक रहे |

कार्यक्रम की सफलता के लिए तुलसी पब्लिक स्कूल के निदेशक एवं सम्मेलन के उपसचिव श्यामल कुमार ‘सुमित्र’ सहित उपस्थित विद्वान एवं साहित्यनुरागियों को सचिव डॉ.मधेपुरी द्वारा धन्यवाद ज्ञापित कर अध्यक्ष के निदेशानुसार समारोह की समाप्ति की घोषणा की गई |

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छठ महापर्व स्वच्छ एवं सुगंधमय बना देता है सम्पूर्ण बिहार को……..!

आस्था एवं विश्वास के इस महापर्व छठ में उत्साह व उमंग की ऊंचाई इतनी होती है कि श्रद्धापूर्ण माहौल में सम्पूर्ण बिहार स्वच्छ एवं सुगंधमय बन जाता है | नदी से लेकर नाले तक एवं पोखर से लेकर पनघट तक की सफाई हो जाती है |

बता दें कि चार दिवसीय इस महापर्व में जहाँ उगते सूरज से पहले ढलते सूरज को ही नमन किया जाता है, उसी तर्ज पर प्रशासन द्वारा भी दिल्ली-मुंबई-हरियाणा….. से गाँवों तक आने के लिए (पद्मश्री संतोष यादव (मुंगेर) , गीतकार राजशेखर (मधेपुरा) सहित अन्य आम लोगों  व  मजदूरों के वास्ते) विशेष ट्रेन की व्यवस्था जिस तरह छठ से पूर्व की गई थी उसी तरह उन्हें छठ के बाद पुनः कार्यस्थल तक पहूँचाने के लिए और अधिक सुविधाओं के साथ व्यस्था की जा रही है | भारतीय रेल के समस्तीपुर मंडल के सीनियर डीसीएम वीरेन्द्र कुमार के निर्देश पर छठ पर्व के बाद लौट रहे रेल यात्रियों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सहरसा स्टेशन पर अतिरिक्त चार टिकट काउंटर खोलने के संबंध में पत्र भी जारी कर दिया गया है और तदनुरूप डीसीआई रमण झा टिकट काउंटर चालू करवाने में जुट गये हैं |

यह भी बता दें कि मुख्यमंत्री-आपदा प्रबंधन मंत्री से लेकर जिला प्रशासन की चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था के बावजूद राज्य में कुल 63 लोगों की मौत छठ पर्व के दौरान डूबने से हुई जिसमें मधेपुरा से एक के डूबने की पुष्टि की गई है, जबकि जिले में 192 घाटों पर डीएम मो.सोहैल, एसपी विकास कुमार और एसडीएम संजय कुमार निराला की टीम एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड, मोटरबोट व गोताखोरों सहित अन्य सतर्कताओं के साथ तैनात दिखे | डीएम मो.सोहैल ने तो यहां तक हिदायत दे डाली थी कि अभिभावक अपने बच्चों के पाँकेट में पूरा पता लिखकर ‘कागज’ डाल दें ताकि भीड़ में खो जाने पर उसे उनके परिजनों को आसानी से हस्तगत करा दिये जायेंगे |

यह भी जानिए कि कर्मकांड की जटिलता से मुक्त………..  इस महापर्व छठ में समानता की सर्वाधिक विशालता नजर आती है- ना आडंबर, ना पैसे, ना स्टेटस………. और ना पूजा कराने के वास्ते पंडित-पुरोहित की जरूरत | मरिक जाति द्वारा तैयार सभी के सूप में वही अल्हुआ, सुथनी, मूली, गाजर, हल्दी-अदरक-ईख……..  नारियल-बद्दी-जायफल आदि | सभी अपने-अपने माथे पर दउरा उठाते हैं | घाट पर सभी व्रती होते हैं चाहे अपने निजी आवासीय परिसर वाले निर्मित घाटों पर वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का परिवार हो या पूर्व मुख्यमंत्री लालू-राबड़ी का या फिर मधेपुरा के समाजसेवी-साहित्यकार डॉ.मधेपुरी का ही परिवार क्यों ना हो | ऊर्जा के अनंत स्रोतवाले सूर्यदेव के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना ही तो छठ महापर्व का सार है, जो हमारे अस्तित्व को कायम रखने में सहायक है |

बिहारी समाज देश से लेकर विदेश तक में जहाँ भी होते हैं- छठ की थाली में एकता का दीप जलाने के वास्ते ट्रेन या प्लेन से घर आने की कोशिश में जुटे रहते हैं………|

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छठ के अर्घ्य के मूल में हैं भगवान श्रीकृष्ण

आस्था का महापर्व है छठ। इस छठ से न जाने कितनी ही कथाएं जुड़ी हुई हैं। सच तो यह है कि कोई पर्व ‘महापर्व’ बनता ही तब है जब उससे हमारी, आपकी, गांव की, शहर की, पुराण की, इतिहास की अनगिनत स्मृतियां-अनुभूतियां कथाओं के रूप में जुड़ जाएं। आपको सुखद आश्चर्य होगा कि महापर्व छठ की एक कथा भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी हुई है और उस कथा का विशेष महत्व है क्योंकि वो हमारा परिचय उस बिन्दु से कराती है जहां सूर्य को अर्घ्य देने की पवित्र परिपाटी का उद्गम है। चलिए, आपको ले चलें बिहार के नालंदा जिला स्थित बड़गांव जहां स्वयं श्रीकृष्ण पधारे थे और जिनकी प्रेरणा से यहां भगवान सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा शुरू हुई थी।

बड़गांव वैदिक काल से ही सूर्योपासना का प्रमुख केन्द्र रहा है। यहां का सूर्यमंदिर दुनिया के 12 अर्कों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि यहां छठ करने पर हर मुराद पूरी होती है। तत्कालीन मगध में छठ की महिमा इतनी उत्कर्ष पर थी कि युद्ध के लिए राजगीर आए भगवान कृष्ण ने भी बड़गांव पहुंच कर भगवान सूर्य की अराधना की थी। इसकी चर्चा सूर्य पुराण में भी है। आज भी हजारों श्रद्धालु चैत और कार्तिक माह में यहां छठ का व्रत करने आते हैं।

बहरहाल, यहां से आगे चलते हैं। ऐसी मान्यता है कि महर्षि दुर्वासा एक बार श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका गए थे। उस समय भगवान कृष्ण रुक्मिणी के साथ विहार कर रहे थे। उसी दौरान किसी बात पर श्रीकृष्ण के पौत्र राजा साम्ब को हंसी आ गई। महर्षि दुर्वासा ने उनकी हंसी को अपना उपहास समझ लिया और उन्हें कुष्ठ होने का श्राप दे दिया। श्रीकृष्ण ने इस कष्टदायी श्राप से मुक्ति के लिए अपने पौत्र को सूर्य की अराधना करने को कहा। तब राजा साम्ब ने 49 दिनों तक बर्राक (वर्तमान बड़गांव) में रहकर भगवान सूर्य की उपासना की। कहते हैं उन्होंने वहां स्थित एक गड्ढ़े के जल का सेवन किया और उसी से सूर्य को अर्घ्य दिया, जिससे वे रोग व श्राप से मुक्त हो सके। आगे चलकर राजा साम्ब ने अपने पितामह श्रीकृष्ण की आज्ञा से उस गड्ढे वाले स्थान की खुदाई करके तालाब का निर्माण कराया। इसमें स्नान करके आज भी कुष्ठ जैसे असाध्य रोग से लोगों को मुक्ति मिलती है।

आपको बता दें कि कालांतर में तालाब की खुदाई के दौरान भगवान सूर्य, कल्प विष्णु, लक्ष्मी, सरस्वती, आदित्य माता, जिन्हें छठी मैया भी कहते है, सहित नवग्रह देवता की प्रतिमाएं इस स्थान से निकलीं। तालाब के पास ही एक सूर्यमंदिर भी था, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसकी स्थापना अपने पितामह के कहने पर राजा साम्ब ने ही कराई थी। आगे चलकर 1934 के भूकंप में यह मंदिर ध्वस्त हो गया। बाद में ग्रामीणों ने तालाब से कुछ दूर पर मंदिर का निर्माण कर सभी प्रतिमाओं को स्थापित किया।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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सूर्योपासना का चार दिवसीय महाछठ पर्व शुरू………..!

मधेपुरा सहित जिले के सभी प्रखंडों के मुख्यालय से लेकर सुदूर गाँवों तक सभी समुदाय के लोग सप्ताह भर से इस लोक आस्था के छठ महापर्व को लेकर जहाँ जोर-शोर से घर से घाट तक की सफाई व सजावट करने में लगे नजर आते रहे वहीं प्रदेश के मंत्री-मुख्यमंत्री से लेकर जिला प्रशासन के आलाधिकारी डीएम मो.सोहैल, एसपी विकास कुमार, एसडीएम संजय कुमार निराला की पूरी टीम विधि व्यवस्था से लेकर आपात स्थिति से निपटने तक के लिए नदी में गोताखोरों तथा तटों पर दमकल सहित एंबुलेंसों तक की व्यवस्था में जुटे रहे | इस बार घाटों पर सादे लिवास में पुलिस तैनात की जा रही है विस्फोटक पदार्थों पर भी नजर रखी जा रही है |

बता दें कि जहाँ नदी में खतरे के निशान को चिन्हित कर रस्सी से घेरा जा रहा है वहीं प्रत्येक घाट पर रोशनी की पर्याप्त व्यवस्था की जा रही है | यहाँ तक कि एंटी सबोटेज चेकिंग भी सुनिश्चित की गई है |

यह भी बता दें कि प्रशासन द्वारा छठ घाटों पर यदाकदा अगलगी की घटनाओं को रोकने के लिए इस वर्ष आतिशबाजी व पटाखे छोड़ने पर रोक लगा दी गई है | साथ ही मिलावटी खाद्य पदार्थों की सघन जांच एवं विधि संगत कार्रवाई करने हेतु निदेश भी दिया गया है |

छठ को लेकर सदर अस्पताल प्रशासन भी मुस्तैद है | सिविल सर्जन डॉ.गदाधर पांडे द्वारा अस्पताल में चौबीसो घंटे इमरजेंसी वार्ड को तैनात रहने का आदेश जारी कर दिया गया है | जीवन रक्षक दवाइयाँ भी उपलब्ध करा ली गई है | प्रखंड स्तर पर भी चाक-चौबंद व्यवस्था पूरी कर ली गई है | थानाध्यक्षों द्वारा शांति समिति की बैठकें की जा चुकी हैं | यहाँ तक कि सभी ग्राम पंचायतों के ग्राम-कचहरी के न्याय सचिव, पंचायत सचिव तथा राजस्व कर्मचारियों को निर्देशित किया गया है कि सभी कर्मचारी अपने-अपने पंचायत में छठ की शाम और सुबह में घाटों पर तैनात रहेंगे ताकि व्रतियों को कोई कठिनाई न हो | यदि कोई कमी नजर आये तो उसकी सूचना वरीय पदाधिकारी को तुरंत दें | शराबी या जुआरी कहीं भी नजर आये तो अविलम्ब उच्चाधिकारी को सूचित करें | डीएम मो.सोहैल ने कहा कि इस महाव्रत के दरमियान किसी भी कर्मचारी की लापरवाही कतई बर्दाश्त नहीं की जायेगी |

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मधेपुरा में चित्रगुप्त पूजा उल्लास पूर्वक मनाया गया

न केवल मधेपुरा जिला मुख्यालय के लक्ष्मीपुर मुहल्ला के सामुदायिक चित्रगुप्त भवन में बल्कि बिहारीगंज, बभनगामा, गमैल……. सिंहेश्वर सहित अन्य जगहों पर भी विभिन्न लिपियों के आविष्कारक भगवान चित्रगुप्त की पूजा-अर्चना सर्वाधिक श्रद्धाभाव से उन बच्चों एवं बड़ों द्वारा कलम और दावात रखकर मन्नतें माँगते हुए की गई जिनकी आजीविका का माध्यम मूलरूप से उनकी कलम ही होती है |

बता दें कि अंग्रेजी एवं हिन्दी साहित्य के कलमजीवी विद्वानद्वय वयोवृद्ध राय बसंत कुमार सिन्हा एवं हरिशंकर श्रीवास्तव शलभ ने आनेवाली पीढ़ी को यह जानकारी दी-

“दीपावली के पाँच दिवसीय त्योहार का आखिरी दिन ‘यम द्वितीया’ के नाम से प्रचलित है | इस दिन भाई-बहन के प्रेम का पर्व ‘भैया दूज’ मनाने के साथ-साथ कलमजीवी कायस्थ समाज के लोग ब्रह्माजी के पुत्र भगवान चित्रगुप्त की प्रतिमा के समक्ष कलम-दावात रखकर उनकी पूजा करते हैं, मन्नतें मांगते हैं…..|”

मौके पर उपस्थित मधेपुरा के जांबाज एसपी विकास कुमार, डॉ.के.एन.दास, डॉ.अरविंद श्रीवास्तव सहित वार्ड पार्षद अशोक सिन्हा…… आदि ने विचार व्यक्त करते हुए इस बात की पुष्टि की-

“धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में भीष्म पितामह ने भी चित्रगुप्त भगवान की पूजा की थी, जिससे प्रसन्न होकर चित्रगुप्त ने भीष्म पितामह को ‘इच्छामृत्यु’ का वरदान दिया था…….|”

Madhepura Hindustan Bureau Chief Shri Saroj Kumar giving the award of excellence to Miss Anushka and Kajal from Shashi Sarojini Saharsa in Kathak and Jat-Jatin Dance respectively.
Madhepura Hindustan Bureau Chief Shri Saroj Kumar giving the award of excellence to Miss Anushka and Kajal from Shashi Sarojini Saharsa in Kathak and Jat-Jatin Dance respectively.

यह भी जानिए कि चित्रगुप्त पूजनोत्सव के मौके पर मधेपुरा चित्रांश समिति के बैनर तले सुकवि सूरज की सरस्वती वंदना के साथ अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में पधारे झारखंड से सुशील साहिल, सुपौल से अरविंद ठाकुर, सहरसा से स्वाति शाकंभरी, भागलपुर से फ़ैज़ रहमान फ़ैज़, रामनाथ शोधार्थी, समीर परिमल, अंजनी कुमार सुमन, रामावतार राही, संतोष सिन्हा आदि…… एवं बंदन ब्रदर्स द्वारा स्थापित शशि सरोजनी सांस्कृतिक रंगमंच के प्रभावी कलाकार द्वय काजल एवं अनुष्का ने देर रात तक दर्शकों की तालियां बटोरी |

अंत में कवि-शायर एवं शशि सरोजिनी के कलाकार द्वय को पूर्व मुख्य पार्षद डॉ.विशाल कुमार बबलू, उपाध्यक्ष अशोक यदुवंशी, पूर्व पार्षद ध्यानी यादव, गोपाल श्रीवास्तव, आशा श्रीवास्तव, लाला भूपेन्द्र, जनार्दन लाल दास, के.के.सिन्हा, प्रदीप श्रीवास्तव, निर्भय सिन्हा, नरेश सिन्हा……. आदि की उपस्थिति में संस्था की ओर से सम्मानित कर सहभोज सम्पन्नोपरांत सादर विदा किया गया |

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एल्सटॉम कंपनी ने लिया मधेपुरा के छह गाँवों को गोद

मधेपुरा विद्युत रेल इंजन कारखाना निर्माण में जुटा है फ्रांस की कंपनी एल्सटॉम | पहला रेल इंजन बनना चालू होने के साथ एल्सटॉम द्वारा आस-पास के 6 गाँवों- तुनियाही (उत्तरी-दक्षिणी), लक्ष्मीरामपुर (उत्तरी-दक्षिणी) एवं गणेश स्थान (वार्ड न० – 13 और 14) को गोद लिया गया है |

बता दें कि प्रोजेक्ट पदाधिकारी ऋषिकेष रंजन द्वारा मधेपुरा अबतक को यह जानकारी दी गई कि जहाँ इन गाँवों में नियमितरुप से 6 मोबाइल विकास केंद्रों में फिलहाल स्कूल नहीं जाने वाले 14 वर्ष से कम उम्र के 110 बच्चों को एल्सटॉम की ओर से NGO- प्रज्ञा’ द्वारा नियमित रूप से पढ़ाया जाता है वहीं डॉ.एम.के.झा के निर्देशन में पांच सदस्यों वाली मेडिकल टीम द्वारा गोद लिए गये गाँवों में नियमित रुप से जा-जाकर जरूरतमंद सभी मरीजों की मुफ्त जाँच की जाती है और मुफ्त दवा भी उपलब्ध कराई जाती है |

एल्सटॉम कंपनी के वरीय पदाधिकारी के.के.भार्गव ने भी बताया कि आने वाले दिनों में सामाजिक सरोकार के तहत कई और अन्य विकास के काम किए जायेंगे | तत्काल इन गाँवों के बेरोजगार युवाओं एवं महिलाओं को कंप्यूटर प्रशिक्षण दिया जा रहा है तथा सरकारी नौकरियों में निकलने वाली वैकेंसी के बारे में भी इन्हें जानकारी दी जा रही है | कंपनी इन्हें Job दिलाने की दिशा में हर संभव प्रयास करेगी |

इस अवसर पर मधेपुरा के शिक्षाविद-समाजसेवी डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी ने मधेपुरा विद्युत रेल इंजन फैक्ट्री सहित एल्सटॉम कंपनी के पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों को दीपावली एवं छठ पूजा की शुभकामनाएं देते हुए यही कहा कि ‘एल्सटॉम’ एवं ‘प्रज्ञा’ द्वारा आस-पास के गोद लिए गये इन गाँवों से अशिक्षा और बेरोजगारी को दूर करने की जो मुहिम चलायी जा रही है वह निश्चिय ही ग्रासरूट पर किये जाने वाले कार्य हैं- जिनसे गाँवों का विकास होगा, क्योंकि अभी भी तो हमारा गाँव गरीब ही है | गाँधी-लोहिया-जयप्रकाश एवं भूपेन्द्र-भीम-कर्पूरी….. का भारत तो मूलरूप से गाँवों में ही बसता है |

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धनतेरस: धन ही नहीं, स्वास्थ्य का भी पर्व

धनतेरस, एक अनोखा पर्व जो न केवल दीपावली आने की पूर्व सूचना देता है बल्कि समृद्दि के लिए स्वास्थ्य का महत्व भी रेखांकित करता है। आम धारणा के अनुसार धन का पर्व दीपावली है, जो सही नहीं है। दीपावली तो धन के साथ-साथ अन्य सिद्धियों का दिन भी है। धन का दिन तो असल में धनतेरस है। साथ ही यह दिन औषधि और स्वास्थ्य के स्वामी धन्वंतरि का भी दिन है, जो इस बात का संदेश देता है कि धन का भोग करने के लिए लक्ष्मी की कृपा जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरत उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की होती है। बता दें कि आर्युवेद, जिसकी रचना ब्रह्मा ने की थी, को प्रकाश में लाने का श्रेय भी धन्वंतरि को ही जाता है।

धनतेरस का पर्व हर वर्ष कार्तिक के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। दीपावली की महानिशा से दो दिन पहले इसी खास दिन यक्ष-यक्षिणियों का जागरण होता है। यक्ष-यक्षिणी इस स्थूल जगत के उन सभी चमकीले तत्वों के नियंता कहे जाते हैं, जिन्हें दुनिया ‘दौलत’, ‘सम्पत्ति’, ‘वैभव’, ‘ऐश्वर्य’ जैसे नामों से जानती है। जानना दिलचस्प होगा कि कुबेर को यक्ष और लक्ष्मी को यक्षिणी का रूप माना जाता है। कुबेर और लक्ष्मी यक्ष-यक्षिणी के रूप में हमारे जीवन की उस ऊर्जा को नियंत्रित करते हैं, जिससे हमारी जीवन-शैली निर्धारित और नियंत्रित होती है।

‘धनतेरस’ में ‘धन’ शब्द को धन-संपत्ति और धन्वंतरि दोनों से ही जोड़कर देखा जाता है। भगवान धन्वंतरि को हिन्दू धर्म में देव वैद्य का पद हासिल है। कुछ ग्रंथों में इन्हें विष्णु का अवतार भी माना गया है। मान्यता है कि समुद्र-मंथन के दौरान धन्वंतरि चांदी के कलश और शंख के साथ प्रकट हुए थे। इसी कारण धनतेरस के दिन शंख और चांदी का कोई पात्र, बर्तन या सिक्का खरीदना शुभ माना जाता है। सामर्थ्य के अनुसार कुछ लोग चांदी की जगह सोना तो कुछ लोग पीतल या स्टील की चीज खरीदते हैं, लेकिन ये रस्म लोग निभाते जरूर हैं। दीपावली के लिए इसी दिन लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा और पूजन सामग्री खरीदना भी शुभ माना गया है।

तंत्र शास्त्र में इस दिन लक्ष्मी, गणपति, विष्णु और धन्वंतरि के साथ कुबेर की साधना की जाती है। धनतेरस की रात्रि में कुबेर यंत्र, कनकधारा यंत्र, श्री यंत्र तथा लक्ष्मी स्वरूप श्री दक्षिणावर्ती शंख के पूजन को अचूक माना गया है। इस दिन अपने मस्तिष्क को स्वर्ण समझकर ध्यानस्थ होने से धन अर्जित करने की आन्तरिक क्षमता सक्रिय होती है, जो सही मायने में समृद्धि का कारक बनती है।

एक बात और, ‘धनतेरस’ में ‘धन’ से जुड़े ‘तेरस’ शब्द को लेकर एक बड़ी महत्वपूर्ण मान्यता यह है कि इस दिन खरीदे गए धन, विशेषकर सोना या चांदी, में तेरह गुना वृद्धि हो जाती है। ईश्वर करे आपके धन में भी तेरह गुना की वृद्धि हो और हर धनतेरस को हो। ‘मधेपुरा अबतक’ की ओर से इस दिन की ढेर सारी शुभकामनाएं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

 

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मधेपुरा में भारतरत्न डॉ.कलाम की 87वीं जयन्ती मनी

मधेपुरा के तुलसी पब्लिक स्कूल में गाँधीयन मिसाइल मैन कहलाने वाले भारतरत्न डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम की 87वीं जयन्ती समारोहपूर्वक मनाई गई | यह समारोह सर्वाधिक उत्साह, उमंग एवं सादगी के साथ शिक्षकों एवं छात्रों की उपस्थिति में मनाया गया |

सर्वप्रथम डॉ.कलाम की तस्वीर पर उद्घाटनकर्ता समाजसेवी डॉ.भूपेन्द्र नारायण मधेपुरी, मुख्य अतिथि श्यामल कुमार सुमित्र सहित शिक्षकों एवं छात्र-छात्राओं ने पुष्पांजलि की | फिर डॉ.कलाम के जीवनवृत्त पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए डॉ.मधेपुरी ने संबोधन के अंत में बच्चों से यही कहा-

“जो कुछ करने का संकल्प लो उसे जुनून एवं आत्मविश्वास के साथ पूरा करो | आत्मविश्वास तुम्हारे जीवन में अद्भुत चमत्कार ला सकता है……… केवल उसे अपने मन-प्राणों में निरंतर उतारने की कोशिश में लगे रहो |”

Dr.Madhepuri with kids and teachers with full of Spirit during the Missileman Dr.APJ Abdul Kalam's 87th Happy Birthday celebration at Tulsi Public School Madhepura.
Dr.Madhepuri with kids and teachers with full of Spirit during the Missileman Dr.APJ Abdul Kalam’s 87th Happy Birthday celebration at Tulsi Public School Madhepura.

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रुप में तुलसी पब्लिक स्कूल के निदेशक श्यामल कुमार सुमित्र ने कहा कि डॉ.कलाम दुनिया के पहले ऐसे राष्ट्रपति थे जिन्होंने राष्ट्रपति भवन में हो रहे अपने शपथ-ग्रहण समारोह में देश के सौ स्कूली बच्चे-बच्चियों को आमंत्रित किया था |

बता दें कि समारोह की अध्यक्षता कर रहे प्राचार्य डॉ.हरिनंदन प्रसाद यादव ने अपने संबोधन में डॉ.कलाम के अनुशासन प्रियता की चर्चा करते हुए स्कूल में उपस्थिति एवं अनुशासन को लेकर सर्वश्रेष्ठ छात्र के रूप में वर्ग-2 के मनदीप कुमार एवं छात्रा समूह में वर्ग 5 की आस्था कुमारी के नाम की घोषणा की | इन दोनों को उद्घाटनकर्ता डॉ.मधेपुरी के हाथों मोंमेंटो देकर पुरस्कृत किया गया |

यह भी जानिए कि “डॉ.कलाम के व्यक्तित्व एवं कृतित्व” विषय पर भाषण प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया था | शिक्षक द्वय वरुण कुमार वर्मा एवं नरेश कुमार के संरक्षण में लगभग एक दर्जन छात्र-छात्राओं यथा आस्था प्रिया, लक्ष्मी, निधि, छवि, आर्यन, प्रियांशु, अभिनव, नीरज…….. आदि ने हिन्दी व अंग्रेजी में भाषण दिया और तालियाँ भी बटोरी | पुरस्कार स्वरूप मिठाइयाँ व चाकलेट्स  का वितरण किया गया | समारोह को सफल बनाने में विभीषण कुमार, मनीषा कुमारी, माधुरी यादव, आशुतोष कुमार, आदित्य आदि की भूमिका महत्वपूर्ण रही | अंत में वरुण कुमार वर्मा द्वारा धन्यवाद ज्ञापन और अध्यक्ष के निर्देशानुसार कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा की गयी |

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