तब और अब के चुनावी युद्ध में उम्मीदवारों के व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर- डॉ.मधेपुरी

आजादी के बाद का चुनावी युद्ध महाभारत जैसे धर्म युद्ध की तरह हुआ करता था, बल्कि कभी-कभी तो उससे भी बेहतर प्रदर्शन नजर आ जाता।

प्रखर समाजवादी नेता भूपेन्द्र नारायण मंडल के करीबी रहे डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी बताते हैं कि मधेपुरा संसदीय क्षेत्र में तबके सोशलिस्ट और कांग्रेस पार्टी के दो प्रखर उम्मीदवारों के बीच चुनावी संघर्ष शीर्ष पर था। समाजवादी उम्मीदवार भूपेन्द्र नारायण मंडल एक पुरानी जीप से किसी टोले के मतदाताओं से मिलकर मुख्य सड़क पर आते हैं कि दूसरी ओर से कांग्रेसी उम्मीदवार ललित नारायण मिश्र काफिले के साथ आ रहे होते हैं। देखते ही वे गाड़ी से उतरकर भूपेन्द्र बाबू के पास जा….. यही पूछते कि भाई साहब ! स्वस्थ है ना !!

जवाब में वे ललित बाबू से टोले की ओर इशारा करते हुए यही कहते-

 “ललित ! कुछ लोग तोहर शिकायत कैयलक जे ललित बाबू अखैन तक नय आयल छै….  वोकरा सबहक शिकायत तोरा जल्दी दूर करैक चाहि….. अखने चैल जा…।”

परंतु, आजादी के सातवें दशक आते-आते लगभग सभी चुनावी योद्धाओं की वाणी, व्यवहार व आचरण की चर्चाएं किसी भी रूप में करने, सुनने व सुनाने योग्य नहीं रहा। उन्हें ना किसी की उम्र का लिहाज है और ना शब्दों के चयन एवं उसके व्यवहार का ख्याल। उन्हें यह मालूम भी नहीं कि व्यवहार ही उनकी पहचान है।

अंत में डॉ.मधेपुरी बताते हैं कि जब समाज में शिक्षित लोगों की संख्या कम थी, उस समय ना तो बूथ पर बक्से लूटे जाते थे और ना पुलिस, बीएसएफ या सीआरपीएफ की भारी संख्या में प्रदर्शन या फ्लैग मार्च की जरूरत होती थी। आज जब शिक्षितों की संख्या बढ़ी है तो हम अपने-अपने व्यवहारों एवं संस्कारों से शिक्षा को बदनाम करने से बाज नहीं आ रहे हैं।

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